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Sushil Sarna's Blog – April 2019 Archive (12)

दो क्षणिकाएं : ....

दो क्षणिकाएं : ....

नैन पाश में
सिमट गयी
वो
बनकर एक
एक भटकी सी
खुशबू
और समा गई
मेरी

अदेह देह में

..........................

जल पर पड़ी
जल
सूखने लगा
पेड़ों पर पड़ी
पेड़ सूखने लगा
जीवों पर पड़ी
तो कंठ सूखने लगा
तृप्ती की आस में
अंततः
साँझ की गोद में
तृषित ही
सो गई
धूप

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 28, 2019 at 1:58pm — 4 Comments

साहिलों पर .... (लघु रचना )

साहिलों पर .... (लघु रचना )

गुफ़्तगू
बेआवाज़ हुई
अफ़लाक से बरसात हुई
तारीकियों में शोर हुआ
सन्नाटे ने दम तोड़ा
तड़प गयी इक मौज़
बह्र-ए-सुकूत में
और
डूब गए सफ़ीने
अहसासों के
लबों के
साहिलों पर

(अफ़लाक=आसमानों )

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 27, 2019 at 5:41pm — 4 Comments

तेरे मेरे दोहे ....

तेरे मेरे दोहे ....

द्रवित हुए दृग द्वार से , अंतस के उदगार।

मौन रैन में हो गए, घायल सब स्वीकार।।

रेशे जीवन डोर के, होते बड़े महीन।

बिन श्वासों के देह ये, लगती कितनी दीन।।

दृशा दूषिका से भरी, दूषित हुए विचार।

वर्तमान में हो गए, खंडित सब संस्कार।।

लोकतंत्र में है मिला, हर जन को अधिकार।

अपने वोटों से चुने, वो अपनी सरकार।।

हर भाषण में हो रही, प्रजातंत्र की बात।

प्रजा झेलती तंत्र के ,नित्य नए…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 26, 2019 at 4:28pm — 8 Comments

जाल .... ( 4 5 0 वीं कृति)

जाल .... ( 4 5 0 वीं कृति)

बहती रहती है

एक नदी सी

मेरे हाथों की

अनगिनित अबोली रेखाओं में

मैं डाले रहता हूँ एक जाल

न जाने क्या पकड़ने के लिए

हाथ आती हैं तो बस

कुछ यातनाएँ ,दुःख और

काँच की किर्चियों सी

चुभती सच्चाईयाँ

डसते हैं जिनके स्पर्श

मेरे अंतस में बहती

जीत और हार की धाराओं को

काले अँधेरों में भी मुझे

अव्यक्त अभियक्तियों के रँग

वेदना के सुरों पर

नृत्य करते नज़र आते हैं

नदी

हाथों की…

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Added by Sushil Sarna on April 24, 2019 at 1:24pm — 5 Comments

प्रतीक्षा लौ ...

प्रतीक्षा लौ ...

जवाब उलझे रहे

सवालों में

अजीब -अजीब

ख्यालों में

प्रतीक्षा की देहरी पर

साँझ उतरने लगी

बेचैनियाँ और बढ़ने लगीं

ह्रदय व्योम में

स्मृति मेघ धड़कने लगे

नैन तटों से

प्रतीक्षा पल

अनायास बरसने लगे

सवाल

अपने गर्भ में

जवाबों को समेटे

रात की सलवटों पर

करवटें बदलते रहे

अभिव्यक्ति

कसमसाती रही

कौमुदी

खिलखिलाती रही

संग रैन के

मन शलभ के प्रश्न

बढ़ते रहे

जवाब…

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Added by Sushil Sarna on April 22, 2019 at 6:25pm — 8 Comments

अधूरी सी ज़िंदगी ....

अधूरी सी ज़िंदगी ....

कुछ

अधूरी सी रही

ज़िंदगी

कुछ प्यासी सी रही

ज़िंदगी

चलते रहे

सीने से लगाए

एक उदास भरी

ज़िंदगी

जीते रहे

मगर अनमने से

जाने कैसे

गुफ़्तगू करते

कट गयी

अधूरी सी ज़िंदगी

ढूंढते रहे

कभी अन्तस् में

कभी जिस्म पर रेंगते

स्पर्शों में

कभी उजालों में

कभी अंधेरों में

निकल गई छपाक से

जाने कहाँ

हमसे हमारी

अधूरी सी ज़िंदगी

बरसती रही…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 20, 2019 at 7:26pm — 6 Comments

वेदना ...

वेदना ...

अंतस से प्रस्फुरित हो

अधर तीर पर

ठहर गए कुछ शब्द

मौन के आवरण को

भेदने के लिए

अंतस के उजास पर

तिमिर का अट्हास

मानो वेदना का चरम हो

स्पर्शों की आँधी

निर्ग्रंथ देह पर

बिखरी अनुभूतियों के

प्रतिबिम्ब अलंकृत कर गई

रश्मियाँ अचंभित थी

निर्ग्रंथ देह पर

अनुभूतियों के

विप्रलंभ शृंगार को देखकर

क्या यही है प्रेम चरम की परिणीति

तृषा और तृप्ति के संघर्ष का अंत

नैनों तटों पर तैरती

अव्यक्त…

Added by Sushil Sarna on April 17, 2019 at 8:06pm — 6 Comments

क्षणिकाएँ :

क्षणिकाएँ :

१.

झाँक सका है कौन

जीवन सत्य के गर्भ में

निर्बाध गति

मौन यति

शाँत या अशांत

बढ़ता है सदा

अदृश्य और अज्ञात लक्ष्य की ओर

हो जाता है सम्पूर्ण

एक अपूर्णता के साथ

एक जीवन

२.

लिख गया कोई

खारी बूँदों से

रक्तिम गालों पर

विरह के

स्मृति ग्रन्थ

रह गई दृष्टि

निहारती

सूने चिन्हों से अलंकृत

अवसन्न से

प्रेम पंथ

३.

हो गई समर्पित

जिसे अपना मान

कर गया वही…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 15, 2019 at 7:59pm — 8 Comments

उम्र....

उम्र ...



गर्भ से चलती है

धरती पर पलती है

आँखों को मलती है

संग साँसों के चलती है

उम्र

जिस्म की दासी है

युग युग से प्यासी है

ख़ुशी और उदासी है

छलती ही जाती है

उम्र

मस्तानी जवानी है

अधूरी सी कहानी है

लहरों की रवानी है

रेत सी फिसल जाती है

उम्र

काल की दुपहरी है

चिताओं पर ठहरी है

ज़माने से बहरी है

धधक जाती है चुपके से

उम्र

कल तक जो चलती थी

आशाओं…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 12, 2019 at 5:16pm — 4 Comments

कुछ क्षणिकाएं :

कुछ क्षणिकाएं :

उल्फ़त की निशानी

आँख में

थिरकता

बूँद भर पानी

...........................

समाज

अंधेरों के घेरों में

सभ्यता

न साँझ में

न सवेरों में

..........................

माँ की लाश

बिलखता विश्वास

टूटा आकाश

बेटी के पास

.............................

जीवन रंग

हुए बदरंग

रिश्तों के संग

...............................

दृष्टि में विकार

बढ़ता व्यभिचार

नारी…

Added by Sushil Sarna on April 11, 2019 at 7:51pm — 2 Comments

पांच दोहे :

पांच दोहे :

माँ की पूजा जो करे, तज कर सारे काम।

उसके जीवन में सदा ,पूरन होते काम।।

जयकारों से गूँजता, है माँ का दरबार।

दरस मात्र से जीव का, होता बेड़ा पार।।



माँ के पावन नाम की, महिमा अपरम्पार।

बाल न बाँका भक्त का, कर पाता संसार।।



माँ की पूजा-अर्चना, करता जो निष्काम।

मिल जाता उस भक्त को , माँ का पावन धाम।।

चलकर नंगे पाँव जो, आता तेरे धाम।

पूरन होते जीव के, मुश्किल सारे काम।।

सुशील सरना…

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Added by Sushil Sarna on April 10, 2019 at 5:44pm — 8 Comments

शृंगार रास के दोहे : ... पागल मन की मर्ज़ियाँ

पागल मन की मर्ज़ियाँ, नैनों के उत्पात। 

स्पर्श करें गुस्ताखियाँ, सपना लगती रात।१ ।

ये आँखों की सुर्खियाँ, बिखरे-बिखरे बाल। 

अधरों की शैतानियाँ ,करें उजागर गाल।२ ।

यौवन रुत में जब करें , नैन हृदय पर वार। 

घूंघट पट में लाज के, शरमाता शृंगार।३ ।

नैन करें जब नैन से, अंतर्मन की बात। 

दो पल में सदियाँ मिटें ,रात लगे सौग़ात।४ ।

बंजारे सा मन हुआ, बंजारी सी…

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Added by Sushil Sarna on April 5, 2019 at 3:42pm — 6 Comments

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