For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Dr.Vijay Prakash Sharma's Blog – July 2014 Archive (5)

लाजवन्ती

प्रिया

कहती हो

कहाँ रही

नवेली.

अब कहाँ कजरा

चमेली का गजरा

छूई-मुई

लाजवन्ती.

सुबह का नास्ता

बच्चों का स्कूल

प्रीत गए भूल.

बनाकर टिफिन

घर से ऑफिस

ऑफिस से घर

भागदौड़.

तुम नहीं जानती

कितना सुखद लगता है

आज भी तुम्हारा रूप

किचन में

आँचल से पसीने पोंछती

तुम -अद्भुत सजती हो .

जब अपने को

सहज ही सहेजकर

ऑफिस के लिए

निकलती हो

खुदा कसम

नवेली ही लगती…

Continue

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 19, 2014 at 5:30pm — 8 Comments

सहर

बहुत रोया मैं,
पड़ोसी चाची के मर जाने पर
गाँव से शहर जाने पर
हाल के दंगे में
आग देखकर

डर जाने पर
खुद को लूटा के

घर जाने पर
आंसुओं ने साथ छोड़ दिया
नहीं रोया मैं,
माँ के मर जाने पर,
वो 

हर सहर के साथ

हॅसते देखना चाहती थी.
विजय प्रकाश शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 10, 2014 at 9:50pm — 12 Comments

सपनो का गाँव,

सपनो का गाँव,

पीपल की छावो,

नदी का वह तट ,

नहाती जहाँ झट -पट

किनारे के लोग कभी

नहीं देखते थे एकटक .

बदल गए वो भाव

बदल गया गाँव,

झूमर औ गीत गए

रिश्ते अब रीत गए

लक्ष्मी जब भाग गई

आँखों की लाज गई

अब दीदे हुए बेशर्म

गाँव का माहौल गर्म

आतंक, भूख , भय

राजनीती देती प्रश्रय

सुख गए अब खेत,

माटी बन गई रेत,

भागे सब शहर को

कौन करे अब सेत.

पसर रहा है मौन

जिम्मेवार है कौन?

विजय प्रकाश…

Continue

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 4, 2014 at 11:47pm — 15 Comments

तख़्त

तख़्त के साथ -साथ

तख्तियां बदलती हैं.

वक़्त के साथ -साथ

सख्तियां बदलती हैं.

सत्ता के साथ- साथ

चाप्लूसियां बदलती हैं.

अल्हडों के साथ-साथ

फब्तियां बदलती हैं.

धर्मों के साथ-साथ

भ्रांतियां बदलती हैं.

भोंहों के साथ-साथ

भृकुटियां बदलती हैं.

सन्दर्भों के साथ-साथ

अभिव्यक्तियाँ बदलती हैं.

सम्हालते सम्हालते

परिस्थितयां बदलती हैं.

कन्धों के साथ-साथ

अब अर्थियां बदलती है.

विजय प्रकाश शर्मा

मौलिक व…

Continue

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 2, 2014 at 12:31am — 6 Comments

कागज की नाव

मन के भावो को
कल्पना की कलम से
कोरे कागज़ पर
उतारता हूँ.
शब्दों की  आड़ में,
चिंता के झाड़ से
बचाई "संवेदना" को
संवारता हूँ,
कागज की नाव पर
सपनो के सागर में
सच की पतवार लिए
हिलकोरे खाता हूँ.
डूबना -उतराना तो
खेल है जीवन का
जाने क्या आश लिए
क्षितिज तक जाता हूँ.

विजय प्रकाश शर्मा.
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 1, 2014 at 11:00am — 14 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" सादर नमस्कार आदरणीय मंच। कुछ अन्य सुझाव: 1- सदस्यों से सहयोग राशि एकत्रित कर ओबीओ की पत्रिका…"
17 hours ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अच्छा सुझाव"
19 hours ago
Gajendra shrotriya replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रतिष्ठित मंच के सभी सम्माननीय सदस्यों को सादर प्रणाम🙏ओ बी ओ परिवार के समक्ष बनी इस विषम परिस्थिति…"
yesterday
Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
Saturday
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
Saturday
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
Saturday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
Saturday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
May 25

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service