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रामबली गुप्ता's Blog – July 2016 Archive (7)

गज़ल : मधु-मिलन -रामबली गुप्ता

वह्र-122 122 122 122



निशा मध्य धीरे से घूँघट उठेगा।

खिला रूप विधु का ये मन मोह लेगा।।



प्रतीक्षा हृदय जिसकी करता रहा है।

उसी रात्रि का इंदु हिय में खिलेगा।।



मुदित होंगे मन सुख के सपने सजेंगे।

अमित स्रोत सुख का उमड़ के बहेगा।।



रहा आज तक है जो अव्यक्त हिय में।

वही प्रेम-सागर तरंगें भरेगा।।



नयन बंद होंगे अधर चुप रहेंगे।

मुखर मौन ही हाल हिय का कहेगा।।



खिला पुष्प-यौवन बिखेरेगा सौरभ।

भ्रमर पी अमिय मत्त आहें… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 25, 2016 at 2:00pm — 8 Comments

चैन लुटा जब नैन मिले

मदिरा सवैया

चैन लुटा जब नैन मिले
तन औ मन की सुध भी न रही।

कोमल भाव जगे उर में
शुचि-शीतल-स्नेह-बयार बही।।

मौन रहे मुख नैनन ने
प्रिय से मन की हर बात कही।

चंद्र निहारत रैन कटें
मन की अब पीर न जाय सही।।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on July 21, 2016 at 4:30pm — 12 Comments

सावन मनभावन

घेरि-घेरि घनघोर घटा अति स्नेह-सुधा बरसाए जन में।

चमक चंचला हाय! विरही मन की तपन बढ़ाये छन में।।



भीग-भीग हिय गीत प्रीत के गाये सुख पाये सावन में।

झूम-झूम तरु राग वागश्री गाएं हरषाएं जीवन में।।



टर्र-टर्र टर्राएं दादुर अति रति भाव जगा निज मन में।

म्याव-म्याव धुन गाये, नाचे मोर मोरनी के सँग वन में।।



कुहुक-कुहुक कर गाये कोयल हृदय चुराए छिप उपवन में।

सुखमय यह सावन मनभावन अति सुख लाये हर जीवन में।।





रचना-रामबली गुप्ता

मौलिक एवं… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 19, 2016 at 9:58pm — 7 Comments

ईश-वन्दना : दोहा छंद

ईश करूं नित वंदना, रहो सदा हिय-धाम।

कलुष-भेद उर-तम मिटा, सफल करो सब काम।।1।।



सदा वास उर में करो, करुणानिधि जगदीश।

करूं जोर कर वंदना, धरो कृपा-कर शीश।।2।।



पार करो भवसिंधु से, बन तरणी-पतवार।

तुम बिन कौन सहाय अब, हे! जग-पालनहार।।3।।



हरि! हर लो हर भेद-तम, द्वेष-दंभ-दुर्भाव।

उर में नित सत-स्नेह के, भर दो निर्मल भाव।।4।।



सूर्य-चंद्र-भू-व्योम-जल, अनल--अनिल तनु-श्यान।

सिंधु-शैल-सरि सृष्टि के, कण-कण में भगवान।।5।।



कृपा-सिंधु… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 15, 2016 at 11:14am — 4 Comments

गज़ल-दिल तेरे बिन कहीं अब बहलता नही।

वह्र-212 212 212 212

दिल तेरे बिन कहीं अब बहलता नही।
दर्द सीने में है दम निकलता नही।।

दर्द दिल का बढ़ा जा रहा है बहुत।
दर्दे दिल पे कोई जोर चलता नही।।

सिसकियों से मेरी दिल पिघलते गए।
दिल तेरा ये भला क्यूँ पिघलता नही।।

टालता हूँ बहुत ख़्वाब तेरे सनम।
टालने से मगर अब ये टलता नही।।

काश! मिल जाए तेरा सहारा मुझे।
बिन सहारे ये दिल अब सँभलता नही।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on July 11, 2016 at 10:30am — 10 Comments

ज्योतिपुंज जगदीश!

*छप्पय छंद*





ज्योतिपुंज जगदीश!

रहो नित ध्यान हमारे।



कलुष-द्वेष-दुर्भाव,

हृदय-तम हर लो सारे।।



सत्य-स्नेह-सद्भाव,

समर्पण का प्रभु! वर दो।



जला ज्ञान का दीप,

प्रभा-शुचि हिय में भर दो।



दो बल पौरुष-सद्बुद्धि हरि!

फहराएं ध्वज-धर्म हम।



हर जनजीवन के त्रास हर,

करें सदा सद्कर्म हम।।





*किरीट सवैया*





संकटमोचन! राम-सखा! तुम,

बुद्धि-दया-बल-सद्गुण-सागर।



दीन-दुखी… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 7, 2016 at 8:23am — 4 Comments

गीत-ऐ! राही आगे बढ़ता जा

ऐ! राही! आगे बढ़ता जा।



पथिक सत्य के पथ का तूँ है

उच्च-शिखर पर चढ़ता जा।

ऐ! राही! पथ पर.......



संघर्षों से तूँ ना डरना।

पथ पर पग पीछे ना धरना।।

बहुत मिलेंगे क्षणिक बवंडर।

रोकेंगे तुझको पग-पग पर।।

तोड़ आँधियों का मद प्यारे!

बाधाओं से लड़ता जा।

ऐ! राही! पथ पर.......



यूँ प्रतिमान रचे ना कोई।

कठिनाई से बचे न कोई।।

करके फिर अवलोकन देखो।

युग-पुरुषों का जीवन देखो।।

पाठ सत्य-संघर्ष-विजय का,

तव-जीवन के पढ़ता… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 4, 2016 at 12:18pm — 9 Comments

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