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Sheikh Shahzad Usmani's Blog – July 2017 Archive (6)

लाठी के सहारे (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"थकना और छकना तो है ही, लेकिन रुकना नहीं है। आगे बढ़ने के लिए यह सब भी करना ही है।" अगले पड़ाव पर बैठ कर वह सोचने लगा।



"पहले अपनी अंदरूनी असली हालत और असली ताक़त पर ग़ौर करो, उसे बरकरार रखने, सुधारने या बढ़ाने की असली कोशिश करो!" अन्तर्मन की आवाज़ ने 'फिर से' उसे झकझोर दिया।



"असली हालत ही तो यह सब करा रही है न! यही असली ताक़त बरकरार रखने या बढ़ाने के लिए निहायत ज़रूरी है!" उसने स्वयं को तसल्ली दी।



"तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारी हालत तो उस तज़ुर्बेकार बूढ़े इंसान… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 27, 2017 at 8:03pm — 7 Comments

दुनिया के मर्ज़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"भाई, मैंने तो अब सोच लिया है कि अब नहीं रहना संयुक्त परिवार में!"



"अबे, तुम्हारी बीवी की ये पहली प्रेगनेंसी है। कुछ ही महीनों में डिलेवरी होगी। यही तो सही समय है सबके साथ रहने का!"



"साथ रहने में कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन हर रोज़ की टोका-टाकी और दकियानूसी से तंग आ चुका हूं। मैं नहीं चाहता कि गर्भ में पल रहे बच्चे को शुरू से ही धार्मिक चीज़ें सुनवाई जायें। रीति-रिवाज़ों की छाप उस पर पड़े!"



"क्या तुम्हारी बीवी भी!"



"कहां यार, वह तो भारतीय नारी है न।!… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 23, 2017 at 10:47am — 13 Comments

बूंद-बूंद ही भरता घड़ा (लघुकथा) ["सुख"-विषयांतर्गत -1]/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

वे दोनों अपने आप को उच्च शिक्षित, व्यवहारिक, और मानवता के पैरोकार साबित करने पर तुले हुए थे। बहस का कोई अंत नहीं था। एक-दूसरे से सहमत होना मुश्किल था। अंतिम प्रयास करते हुए उनमें से एक बोला- "मैंने सभी धार्मिक ग्रंथों के साथ ही मानव समाज से संबंधित सभी विषयों पर पर्याप्त अध्ययन और चिंतन-मनन किया है। निष्कर्षत: अब मैं मानवता के मार्ग पर चलना चाहता हूं।"



"तो क्या अब तक दानव बनकर जी रहे थे!" दूसरे ने लगभग चीखते हुए कहा।



"नहीं, ढोंगी मानवता की चादर ओढ़े हुए दानवता की ढाल लिए… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 16, 2017 at 9:00am — 6 Comments

मम्मी तो ऐसी नहीं न (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

कुसुम अपने चाचा-चाची के अपने प्रति बदले हुए रवैये से बहुत हैरान थी। वह अपनी परेशानी किसी को भले ही नहीं बता पा रही थी, लेकिन कुछ दिनों से उसके दादा जी बहुत कुछ समझ रहे थे। जब भी उन्हें समय मिलता, वे उसे कुछ न कुछ समझाने-सिखाने की कोशिश करते रहते थे। इसी क्रम में कुसुम द्वारा रोपित बीज से उगे नन्हे पौधे को गमले में से उखाड़कर उसके हाथों में सौंप कर आज उन्होंने कहा - " कुसुम बिटिया, इस नन्हें पौधे को अब धरती में यहां अपन रोपित कर देंगे और खूब खाद, पानी देकर इसकी सेवा करेंगे, तो फ़िर यह एक बड़ा पेड़… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 15, 2017 at 2:03am — 9 Comments

नई सदी का मर्द (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"देखो तो, कैसा इतरा-इतरा कर नाच रहा है!"

"हाँ, उस मोरनी को देखकर!"

"नहीं, हमें देखकर इतरा रहा है!" सारस ने अपनी टांगों को ज़मीन पर आड़े-तिरछे पटकतेे हुए हंस से कहा।



"बस कुछ ही महीने तो सुंदर दिखता है, फिर भी इंसानों के दिलों में राज करता है!" यह कहते हुए ईर्ष्यालू हँस ने नदी में गोता सा लगाया।



"हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती, यह जानते हुए भी!" हंस की बात पर सारस ने कटाक्ष किया।



"आकर्षक तो हम भी हैं, लेकिन न तो हमारा मेकअप इस तरह होता है, न ही हमें ऐसा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 9, 2017 at 10:50am — 5 Comments

ऐडजस्टमेन्ट्स (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पता नहीं क्यों ज़ुबैर के क़दम कभी पापा के बेडरूम की ओर बढ़ जाते, तो कभी उस कमरे की ओर जहां उसकी मम्मी की सभी चीज़ें कबाड़ की तरह रख दीं गईं थीं। यही तो वे वज़हें हैं जो उसे नाना-नानी के घर से वापस पापा के घर खींच लाती थीं। मंहगाई और कलह के वातावरण में न तो कोई रिश्तेदार उसे ढंग से अपने पास रख पा रहा था, न ही पापा उसे किसी होस्टल में डाल पा रहे थे। पापा को नई मम्मी के साथ ख़ुश देखकर वह ख़ुश हो भी तो कैसे? दो साल पहले उसने अपनी आंखों से देखा था पैसों के ख़र्च के मसले पर बढ़ी बहस में पापा को मम्मी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 8, 2017 at 8:00pm — 4 Comments

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