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बसंत कुमार शर्मा's Blog – September 2020 Archive (3)

कश्ती में है मगर नहीं पतवार हाथ में- गजल

 221 2121 1221  212

कश्ती में है मगर नहीं पतवार हाथ में. 

होता कहाँ किसी के ये संसार हाथ में.

कर लो भला गरीब का कुर्सी पे बैठकर,

तुमको मिला है भाग्य से अधिकार हाथ में. 

ईश्वर की चाह है तो अकेले भजन…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 19, 2020 at 6:00pm — No Comments

आजकल खुद से हमारी पट रही है - गजल

मापनी २१२२ २१२२ २१२२ 

ज़िंदगी अच्छी तरह अब कट रही है, 

आजकल खुद से हमारी पट रही है. 

 

लूट कर वो ले गई  है दिल हमारा, 

झूलती रुखसार पर जो लट रही है. 

 

हाल पूछा जो हमारा आज उसने, …

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 11, 2020 at 5:00pm — 9 Comments

अपना द्वार खुला अलबत्ता.- ग़ज़ल

मापनी २२ २२ २२ २२ 

है जिनके हाथों में सत्ता. 

उनका हर दिन बढ़ता भत्ता. 

छोड़ दिया जिसको डाली ने, 

इधर-उधर उड़ता वह पत्ता.

कीमत भारी होनी ही थी,

था पुस्तक पर…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 7, 2020 at 3:30pm — 12 Comments

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