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Samar kabeer's Blog – October 2015 Archive (3)

ग़ज़ल :- ज़माना जान चुका था,हर इक ख़बर में था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



ज़माना जान चुका था,हर इक ख़बर में था

वो इक जुनून जो उस वक़्त मेरे सर में था



हर एक शख़्स खिंचा जा रहा था तेरी तरफ़

न जाने कौन सा जादू तिरी नज़र में था



कभी कभी मुझे उसकी भी याद आती है

सफ़ेद बिल्ली का बच्चा जो अपने घर में था



इसी सबब से परेशान थे मेरे दुश्मन

क़बीला सारा मेरी बात के असर में था



सुनाई देतीं भी कैसे ग़रीब की चीख़ें

तुम्हारा ध्यान तो उस वक़्त माल-ओ-ज़र में था



उड़ान भरते रहे… Continue

Added by Samar kabeer on October 25, 2015 at 10:53pm — 17 Comments

तरही ग़ज़ल नं-3 "मुसहफ़ी" की ज़मीन में

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन



बयाँ कैसे करूँ क्या उसकी अंगड़ाई का आलम था

तसव्वुर में न आए ऐसा ज़ैबाई का आलम था



बस इक नुक्ते प आकर रुक गई थी ज़िन्दगी मेरी

न वो वहशत का आलम था न दानाई का आलम था



कोई सुनता भी कैसे एक शाइर की सदा भाई

वतन में हर तरफ़ हंगामा आराई का आलम था



अँधेरे में गिरी सुई भी हम तो ढूँढ लेते थे

जवानी में तो कुछ ऐसा ही बीनाई का आलम था



ग़ज़ल कहने का मौक़ा ख़ूब हम को मिल गया यारों

नहीं था घर में कोई सिर्फ़ तन्हाई… Continue

Added by Samar kabeer on October 16, 2015 at 11:25pm — 12 Comments

ग़ज़ल :- अब तो माँ भी नहीं दुआ के लिये

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन/फ़ेलान



तोड़ क्या लाऊँ इस बला के लिये

अब तो माँ भी नहीं दुआ के लिये



रह्म शैताँ के पास मिलता नहीं

ये सिफ़त है फ़क़त ख़ुदा के लिये



जान से हाथ धोना पड़ते हैं

बस ये इनआम है वफ़ा के लिये



हक़ अदा कर दिया मुहब्बत का

क्या सज़ा देंगे इस ख़ता के लिये



सब उसे तोता चश्म कहते हैं

है वो मशहूर इस अदा के लिये



मुश्किलें मेरी दूर कर देना

कोई मुश्किल नहीं ख़ुदा के लिये



क़त्ल का मेरे फ़ैसला ये… Continue

Added by Samar kabeer on October 3, 2015 at 11:41pm — 13 Comments

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