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Poonam Shukla's Blog – November 2013 Archive (5)

ग़ज़ल - जादुई बात थी सजाओं में - पूनम शुक्ला

2122. 1212. 22

जाने क्या बात है हवाओं में
मीठी मिश्री घुली सदाओं में

ऐसी वैसी नहीं ये रातें हैं
चाँदनी खोजतीं खलाओं में

शबनमी रात ने कहा कुछ है
कुछ नई बात है सबाओं में

रात का है असर अभी ऐसा
जामुनी रंग है अदाओं में

रोशनी छीन ले जो वो मेरी
ऐसी ताकत नहीं ज़फाओं में

जिन्दगी आज सोचती है ये
जादुई बात थी सजाओं में

पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on November 13, 2013 at 10:02am — 12 Comments

ग़ज़ल - कुछ नई बात है सबाओं में - पूनम शुक्ला

2122. 1212. 22

जाने क्या बात है हवाओं में
मीठी मिश्री घुली सदाओं में

ऐसी वैसी नहीं ये रातें हैं
चाँदनी खोजतीं खलाओं में

शबनमी रात ने कहा कुछ है
कुछ नई बात है सबाओं में

रात का है असर अभी ऐसा
जामुनी रंग है अदाओं में

रोशनी छीन ले जो वो मेरी
ऐसी ताकत नहीं ज़फाओं में

जिन्दगी आज सोचती है ये
जादुई बात थी सजाओं में

पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on November 12, 2013 at 9:37am — 2 Comments

ग़ज़ल - हँसती फ़िजा का जवाब देखिए - पूनम शुक्ला

2212 . 2121. 212





जीवन की ऐसी किताब देखिए

काँटों में खिलता गुलाब देखिए



रोती ज़मी आसमान रो रहा

हँसता रुदन ये जनाब देखिए



सोई सबा पर न सोई ये रज़ा

जलता हुआ आफताब देखिए



जन्नत हुई तिश्नगी है इस कदर

मालिक दिलों के हुबाब देखिए



कीमत हँसी की चुकाई भी तो क्या

हँसती फिज़ा का जवाब देखिए



आँगन मेरा रोशनी से भर गया

ऐसा मेरा माहताब देखिए



दीवानगी घेरती है इस कदर

निखरा है ऐसा शबाब… Continue

Added by Poonam Shukla on November 11, 2013 at 2:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल - समुन्दर को डगर कर दूँ - पूनम शुक्ला

1222. 1222

सबा हाजिर अगर कर दूँ
कहानी इक अमर कर दूँ

अँधेरा घेरता फिर से
सितारों को खबर कर दूँ

हवा थोड़ी तुफानी है
इसे मैं बेअसर कर दूँ

कलम की रोशनाई से
फलक रंगीं अगर कर दूँ

ख़ला की हिकमती कैसी
अगर थोड़ी सहर कर दूँ

जरा सा वक्त तुम दे दो
जहन्नुम को न घर कर दूँ

चलूँगी राह जब अपनी
समुन्दर को डगर कर दूँ

हिकमती - उपाय

पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on November 8, 2013 at 3:20pm — 17 Comments

गज़ल - राहों में दीवारें हैं - पूनम शुक्ला

2222. 222

बजती क्यों झंकारें हैं
जब सजती तलवारें हैं

मुँह पर ताले ऐसे क्यों
अब उठती ललकारें हैं

आँखों में देखो पानी
उफ इतनी मनुहारें हैं

कब बदलेगी ये झुग्गी
हाँ बदली सरकारें हैं

काँटे ही काँटे हैं बस
राहों में दीवारें हैं

बहना इतना मुश्किल क्यों
दिखती बस मझधारें हैं ।
पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on November 7, 2013 at 10:30am — 12 Comments

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