Added by amita tiwari on July 13, 2019 at 1:00am — 2 Comments
Added by amita tiwari on July 7, 2019 at 2:30am — 3 Comments
Added by amita tiwari on March 23, 2019 at 12:30am — 1 Comment
Added by amita tiwari on December 31, 2018 at 8:38pm — 4 Comments
जहाँ सपने थे
लोग अपने थे
वह धरती कब की छूट गयी
भीड़ थी पर ठावँ थी
धूप थी संग छावं थी
वह धरती कब की छूट गयी
जनक थे जननी थी
बसेरा था रहनी थी
वह धरती कब की छूट गयी
जो छूट गये
जो रूठ गये
वही आस पास है
यह कैसे एहसास है ?
.
मौलिक व अप्रकाशित"
Added by amita tiwari on November 25, 2018 at 8:30pm — 3 Comments
ये जो है लड़की
उसकी जो आँखे
आँखों में सपना
सपने में घर
उसका अपना घर
जिसके बाहर
वो लिख सके
यह मेरा घर है दुकान नहीं है…
ContinueAdded by amita tiwari on October 16, 2018 at 12:30am — 7 Comments
कहने को तो बहुत कुछ है हमारे पास भी
ये बात अलग है कि कहते बनता नहीं
ऐसा भी नहीं कि कहना जानते नहीं
शब्द भंडार भी है अथाह अपार
वाक्य विन्यास का सारा सार
फिर भी ऐसा कुछ है निःसन्देह
रोक लेता है जुबान को
लफ्ज़-ए - ब्यान को
ठीक वैसे ही जैसे जानकी
सतीत्व- प्रमाणिकता बनाम
विश्वास भरोसे संवारने हेतु
अग्नि -परीक्षा के लिए तत्पर
क्या क्या नहीं बोल सकती थी
पूरा मुख खोल सकती…
ContinueAdded by amita tiwari on September 16, 2018 at 2:00am — 11 Comments
जी हाँ ! युद्ध के विरुद्ध हूँ मैं-
इस लिए नहीं की नहीं देश से प्यार मुझे
अथवा की अपनों के लिए मन नहीं डोलता है
मेरी धमनियों में भी रक्त है वो भी खौलता है
अपनों की शहादत पर बहुत क्रोध जागता है
मन जोश में सीमा की और भागता है
बदले की आग जलाती है
लेकिन
एक बात यह भी समझ में आती है
कि
धरित्री जननी है रक्त नहीं पचाती
गगन जनक है रणभेरी नहीं सुहाती
और ये भी
कि इधर रमेश गिरे अथवा उधर रहमान
मरती तो दोनों और…
Added by amita tiwari on September 5, 2018 at 10:30pm — 9 Comments
विगत -गत
कल कोने में दुबके सहमे
डरे डरे कुछ लम्हे पाए
मैंने जा कर के सहलाया
झूठ सही पर जा बहलाया
कि मेरे होते न यूं डरो
परिचय दे ले बात करो
सुन कर पल ने ली अंगडाई
व्यंग बुझी सी हँसी थमाई
बोला कलंक से कलुषित हो
आत्मग्लानि से झुका हुआ था
विगत साल हूँ रुका हुआ था
उत्सुक था क्या नया करोगे
मुझे भेज जब नया…
ContinueAdded by amita tiwari on January 24, 2018 at 5:23am — 5 Comments
बहुत देर हुई …
Added by amita tiwari on February 16, 2017 at 8:30am — 3 Comments
चले भी आओ की थोड़ी सी प्रीत निभा लें
वर्ष नया मंगलमय कहने की रीत निभा लें
कहना यह भी था कि
जाते साल के इतने तो उधार बाकी हैं
कुछ मुझ पर कुछ तुम पर उपकार बाकी हैं
शुकराने की सुरमय सरगम सजा लें
वर्ष नया मंगलमय कहने की रीत निभा लें
कहना यह भी था कि
कोई वादा अभी भी अधूरा सा है
आँखों में उम्मीद का चूरा सा है
वादे की हदों की हदें ही मिटा लें
वर्ष नया मंगलमय कहने की रीत निभा लें
कहना यह भी था कि
कुछ चुभने हैं बाकी जो कसकती…
Added by amita tiwari on December 30, 2016 at 4:11am — 6 Comments
Added by amita tiwari on December 15, 2016 at 11:17pm — 2 Comments
Added by amita tiwari on December 3, 2016 at 7:18pm — 7 Comments
अभी कल की ही तो बात रही
Added by amita tiwari on November 1, 2016 at 10:00pm — 3 Comments
Added by amita tiwari on September 30, 2016 at 8:30pm — 11 Comments
तुम्हारी तरह
आज तुम्हारी बहू भी सुबह अँधेरे उठ जायेगी
ठीक तुम्हारी तरह
साफ़ सुथरे चौके को फिर से बुहारेगी
नहा धो कर साफ़ अनछूई एक्वस्त्रा हो
तुलसी को अनछेड़ जल चढ़ायेगी
ठीक तुम्हारी तरह
आज फूल द्रूब लाने को भी बेटी को नहीं कहेगी
ठाकुर जी के बर्तन भी स्वय मलेगी
ज्योती को रगड़ -रगड़ जोत सा चमकायेगी
महकते घी से लबलाबायेगी
घर के बने शुद्ध घी शक्कर में लिपटा
चिड़िया चींटी गैया को हाथ से…
Added by amita tiwari on September 27, 2016 at 9:00pm — 1 Comment
अथ से अभी तक जो जैसा मिला
सर माथे ले कर के जीते रहे
विधाता की झोली सुदामा भी हो गयी
तो बन कर के कान्हा सीते रहे
गिला है न शिकवा ज़माने से
कोई तकदीर से भी तकाज़ा नहीं
जीना कही जब ज़हर भी हुआ
तो मीरा बने प्याले पीते रहे
इन्द्रधनुष दिया कुरुक्षेत्र पाया
सत्ता से सत्ता की पायी लड़ाई
सिंहासन से चस्पा वफादारी देखी
विदुरों के तरकश तो रीते रहे
जतनों से बुनचुन जो सपना संजोया
तकिये बेचारे…
ContinueAdded by amita tiwari on September 21, 2016 at 11:30pm — 2 Comments
Added by amita tiwari on September 14, 2016 at 3:05am — 5 Comments
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