For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Sushil Sarna's Blog (903)

दोहा पंचक. . . . ख्वाब

दोहा पंचक. . . . . ख्वाब(नुक्ते रहित सृजन )

कातिल उसकी हर अदा, कमसिन उसके ख्वाब ।

आतिश बन कर आ गया, भीगा हुआ शबाब ।।

रुक -रुक कर रुख पर गिरी, सावन की बरसात ।

छुप-छुप कर करती रही, नजर जिस्म से बात ।।

बार - बार गिरती रही, उड़ती हुई नकाब ।

प्यासी नजरों देखतीं, जैसे हसीन ख्वाब ।।

खड़ा रहा बरसात में  , भीगा एक शबाब  ।

रह - रह के होती रही, आशिक नज़र खराब ।।

भीगी बाला से हुआ, नजरों का संवाद ।

ख्वाबों से वो कर गई, इस दिल को आबाद…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 4, 2024 at 3:46pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . . . मोबाइल

दोहा सप्तक. . . . . मोबाइल

मोबाइल ने कर दिया, सचमुच बेड़ा गर्क ।

निजता पर देने लगे, युवा अनेकों तर्क । ।

मोबाइल के जाल में, उलझ गया संसार ।

सच्चा रिश्ता  अब यही , बाकी सब बेकार ।।

संवादों का बन गया, मोबाइल संसार ।

सांकेतिक रिश्ते हुए, बौना सच्चा प्यार ।।

प्यार जताने के सभी, बदल गए हालात ।

मोबाइल पर साजना , दर्शन दे साक्षात ।

मोबाइल पर कीजिए, चाहे घंटों बात ।

पत्नी की मत भूलना,पर लाना सौगात ।।

मोबाइल के भूत ने, रिश्ते किये…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 3, 2024 at 8:29pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . तूफान

दोहा पंचक. . . . . तूफान

चार कदम पर जिंदगी, बैठी थी चुपचाप ।

बारिश के संहार पर,करती बहुत विलाप ।।

रौद्र रूप बरसात का, लील गया सुख - चैन ।

रोते- रोते दिन कटा, रोते -रोते रैन ।।

कच्चे पक्के झोंपड़े , बारिश गई समेट ।

जन - जीवन तूफान के, चढ़ा वेग की भेंट ।।

मंजर वो तूफान का, कैसे करूँ बयान ।

खौफ मौत का कर गया,  आँखों को वीरान ।।

उड़ जाऐंगे होश जब, देखोगे तस्वीर ।

देख बाढ़ का  दृश्य वो , गया कलेजा चीर ।

सुशील सरना /…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 2, 2024 at 9:19pm — 4 Comments

दोहा सप्तक. . . . सावन

दोहा सप्तक . . . . सावन

सावन में  अच्छी नहीं, आपस की तकरार ।

प्यार जताने के लिए, मौसम हैं दो चार ।।

बरसे मेघा झूम कर, खूब हुई बरसात ।

बाहुबंध में बीत गई, भीगी-भीगी रात ।।

गगरी छलकी नैन की, जब बरसी बरसात।

कैसे बीती क्या कहूँ, बिन साजन  के  रात।।

थोड़े    से   जागे    हुए, थोड़े   सोये   नैन ।

हर करवट पर धड़कनें, रहती हैं बैचैन ।।

बिन साजन सूनी लगे, सावन वाली रात ।

सुधि   सागर   ऐसे   बहे, जैसे बहे प्रपात ।।

 जितनी बरसें…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 1, 2024 at 3:34pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . . नेता

दोहा सप्तक. . . . नेता

संसद में लो शोर का, शुरू हुआ नव सत्र ।

आरोपों की फैलती, बौछारें सर्वत्र ।।

अपशब्दों से गूँजता, अब संसद का सत्र ।

परिणामों से पूर्व ही, फाड़े जाते पत्र ।।

पावन मन्दिर देश का, संसद होता मित्र ।

नेता लड़ कर देश का, धूमिल करते चित्र ।।

कितने ही वादे करें, नेता चाहे आज ।

नग्न नयन के स्वप्न तो, टूटें बिन आवाज । ।

संसद में नेता करें, बात -बात पर तर्क ।

जनता की हर आस का, होता बेड़ा गर्क ।।

नेताओं के पास कब ,…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 31, 2024 at 2:19pm — No Comments

दोहा पंचक . . . वक्त

दोहा पंचक. . . . वक्त

हर करवट में वक्त की,छिपी हुई है सीख ।

आ जाए जो वक्त तो, राजा मांगे भीख ।।

डर के रहना वक्त से, ये शूलों का ताज ।

इसकी लाठी तो सदा, होती बे-आवाज ।।

पल भर की देता नहीं, वक्त किसी को भीख ।

अन्तिम पल की वक्त में , गुम हो जाती चीख ।।

बिना वक्त मिलता नहीं, किस्मत का भी साथ ।

कभी पहुँच कर लक्ष्य पर , लौटें खाली हाथ ।।

सुख - दुख सब संसार में, रहें वक्त  आधीन  ।

काल पाश में  आदमी, लगता कितना दीन…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 29, 2024 at 1:30pm — 6 Comments

दोहा अष्टम. . . . प्रश्न

दोहा अष्टम ......प्रश्न

उत्तर   सारे   मौन   हैं,  प्रश्न   सभी   वाचाल ।

किसने जानी आज तक,भला काल की चाल ।।

यह   जीवन   तो   शून्य  का, आभासी है रूप ।

पग - पग पर संघर्ष की, फैली तीखी धूप ।।

तोड़ सको तो तोड़ दो, प्रश्नों का हर जाल ।

यह जीवन तो पूछता, हरदम नया सवाल ।।

हर मोड़ पर जिंदगी, पूछे एक सवाल ।

क्या पाने की होड़ में, जीवन दिया निकाल ।।

फिसला जाता रेत सा, जीवन जरा संभाल ।

क्या जानें किस मोड़ पर, मिले अचानक काल ।।

बहुतेरे…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 25, 2024 at 3:31pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . मेघ

दोहा पंचक. . . . . मेघ

हाथ जोड़ विनती करे, हलधर बारम्बार।

धरती की जलधर सुनो, अब तो करुण पुकार।।

अवनी से क्यों रुष्ट हो, जलधर बोलो आज ।

हलधर बैठा सोच में, कैसे उगे  अनाज ।।

अम्बर के हर मेघ में, हलधर की है आस ।

बिन जलधर कैसे मिटे, तृषित धरा की प्यास ।।

सावन में अठखेलियाँ, नभ में करे पयोद ।

धरा तरसती वृष्टि को, मेघा करते मोद ।।

श्वेत हंस की टोलियाँ, नभ में उड़े स्वछंद ।

धूप - छाँव का हो रहा, ज्योँ आपस में द्वन्द्व…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 22, 2024 at 12:50pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . . गिरगिट

दोहा पंचक. . . . . गिरगिट

बात- बात पर आदमी ,बदले रंग हजार ।

गिरगिट सोचे क्या करूँ, अब  इसका  उपचार ।।

गिरगिट माँगे ईश से, रंगों का अधिकार ।

लूट लिए इंसान ने, उसके रंग अपार ।।

गिरगिट तो संसार में, व्यर्थ हुई बदनाम ।

रंग बदलना आजकल, इंसानों का काम ।।

गिरगिट बदले रंग जब , भय का हो आभास।

मानव बदले रंग जब, छलना हो विश्वास ।।

शायद अब यह हो गया, गिरगिट को आभास ।

नहीं सुरक्षित आजकल, इंसानों में वास ।।

सुशील सरना /…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 16, 2024 at 8:30pm — 3 Comments

दोहा सप्तक .. इच्छा , कामना, चाह आदि

दोहा सप्तक : इच्छा ,कामना, चाह  आदि

मानव मन संसार में, इच्छाओं का दास ।

और -और की चाह में, निस-दिन बढ़ती प्यास ।1।

इच्छा हो जो बलवती, सध जाता हर काम ।

चर्चा  उसके नाम की, गूँजे आठों याम ।2।

व्यवधानों की लक्ष्य में, जो करते परवाह ।

क्षीण लगे उद्देश्य में, उनके मन की चाह ।3।

अन्तर्मन की कामना, छूने की आकाश ।

सम्भव है यह भी अगर, होवें नहीं हताश ।4।

परिलक्षित संसार में, होता वो परिणाम ।

इच्छा के अनुरूप…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 5, 2024 at 8:30pm — 8 Comments

दोहा एकादश. . . . जरा काल

दोहा एकादश. . . . जरा काल

दृग जल हाथों पर गिरा, टूटा हर अहसास ।

काया  ढलते ही लगा, सब कुछ था आभास ।।1

जीवन पीछे रह गया, छूट गए मधुमास ।

जर्जर काया क्या हुई, टूट गई हर  आस ।।2

लार गिरी परिधान पर, शोर हुआ घनघोर ।

काया पर चलता नहीं, जरा काल में जोर ।।3

लघु शंका बस में नहीं, थर- थर काँपे हाथ ।

जरा काल में खून ही , छोड़ चला फिर साथ ।।4

अपने स्वर्णिम काल को ,मुड़-मुड़ देखें नैन ।

जीवन फिसला रेत सा, काटे कटे न रैन ।।5

सूखा रहता…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 3, 2024 at 2:00pm — No Comments

दोहे आज के. . . .

दोहे आज के .....

बिगड़े हुए समाज का, बोलो दोषी कौन ।

संस्कारों के ह्रास पर, आखिर हम क्यों मौन ।।

संस्कारों को आजकल, भला पूछता कौन ।

नंगेपन  के प्रश्न पर,  आखिर हम क्यों मौन ।।

नर -नारी के मध्य अब, नहीं शरम की रेख ।

खुलेआम अभिसार का, देख तमाशा देख ।।

सरेआम अब हो रहा, काम दृष्टि का खेल ।

युवा वर्ग में आम अब, हुआ अधर का मेल ।।

सभी तमाशा देखते, कौन करे प्रतिरोध ।

कल के बिगड़े रंग का, नहीं किसी को बोध ।।

कर में कर को थाम कर, चले…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 27, 2024 at 9:27pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . सच-झूठ

दोहे सप्तक . . . . . सच-झूठ



अभिव्यक्ति सच की लगे, जैसे नंगा तार ।

सफल वही जो झूठ का, करता है व्यापार ।।

झूठों के बाजार में, सत्य खड़ा लाचार ।

असली की साँसें घुटें, आडम्बर भरमार ।।

आकर्षक है झूठ का, चकाचौंध संसार ।

निश्चित लेकिन झूठ की, किस्मत में है हार ।।

सच के आँगन में उगी, अविश्वास की घास ।

उठा दिया है झूठ ने, सच पर से विश्वास ।।

झूठ जगाता आस को, सच लगता आभास ।

मरीचिका में झूठ की, सिर्फ प्यास ही प्यास ।।

सत्य पुष्प पर झूठ…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 18, 2024 at 9:13pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . .सागर

दोहा पंचक. . . सागर

उठते हैं जब गर्भ से, सागर के तूफान ।

मिट जाते हैं रेत में, लहरों के अरमान ।।

लहर- लहर में  रेत पर, मचलें सौ अरमान ।

मौन तटों पर प्रेम की, रह जाती पहचान ।।

छलकी आँखें देख कर, सूना सागर तीर ।

किसके  अश्कों ने  किया, खारा सागर नीर ।।

कौन बनाता है भला, सागर तीर मकान ।

अरमानों को लीलता,  इसका हर तूफान ।।

देखा पीछे पर कहाँ, जाने गए निशान ।

हर वादे को दे गया, घाव एक तूफान ।।

सुशील सरना /…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 10, 2024 at 1:00pm — 6 Comments

दोहा सप्तक ..रिश्ते

दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते

रिश्ते नकली फूल से, देते नहीं सुगंध ।

अर्थ रार में खो  गए, आपस के संबंध ।।

रिश्तों के माधुर्य में, आने लगी खटास ।

मिलने की  ओझल हुई, संबंधों में प्यास ।।

गैरों से रिश्ते बने, अपनों से हैं दूर ।

खून खून से अब हुआ, मिलने से मजबूर ।।

झूठी हैं अनुभूतियाँ , कृत्रिम हुई मिठास ।

रिश्तों को आते नहीं, अब रिश्ते ही रास ।।

आँगन में खिंचने लगी, नफरत की दीवार ।

रिश्तों की गरिमा…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 7, 2024 at 8:30pm — 6 Comments

दोहा पंचक. . . . .दम्भ

दोहा पंचक. . . . . दम्भ

हर दम्भी के दम्भ का, सूरज होता अस्त ।

रावण जैसे सूरमा, होते देखे पस्त । ।

दम्भी को मिलता नहीं, जीवन में सम्मान ।

दम्भ कुचलता जिंदगी, की असली पहचान ।।

हर दम्भी को दम्भ की, लगे सुहानी नाद ।

इसके मद में चूर वो, बन जाता सैयाद ।।

दम्भ शूल व्यक्तित्व का, इसका नहीं निदान ।

आडम्बर के खोल में, जीता वो इंसान ।।

दम्भी करता स्वयं का, सदा स्वयं अभिषेक ।

मैं- मैं को जीता सदा, अपना हरे…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 2, 2024 at 6:56pm — No Comments

दोहा सप्तक ..रिश्ते

दोहा सप्तक. . . . रिश्ते

आपस के माधुर्य को, हरते कड़वे बोल ।

मिटें जरा सी चूक से, रिश्ते सब  अनमोल ।।

शंका से रिश्ते सभी, हो जाते बीमार ।

संबंधों में बेवजह,  आती विकट दरार ।।

रिश्ता रेशम सूत सा, चटक चोट से जाय ।

कालान्तर में वेदना,  इसकी भुला न पाय ।।

बंधन रिश्तों के सभी,  आज हुए कमजोर ।

ओझल मिलने के हुए, आँखों से अब छोर ।।

रिश्तों में अब स्वार्थ का, जलता रहता दीप ।

दुर्गंधित से नीर में, खाली मुक्ता से सीप ।।

संबंधों को…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 8, 2024 at 1:42pm — 4 Comments

कुंडलिया. . .

कुंडलिया. . . 

झोला  लेकर  हाथ  में, चले  अनोखे  लाल ।
भाव  देख  बाजार  के, बिगड़े  उनके  हाल ।
बिगड़े  उनके हाल ,करें क्या  आखिर  भाई ।
महंगाई  का    काल , खा   गया   पाई- पाई ।
कठिन दौर से  त्रस्त , अनोखे दर- दर डोला ।
लौटा   लेकर  साथ , अंत  में  खाली  झोला ।

सुशील सरना /7-5-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on May 7, 2024 at 8:28pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . .मजदूर

दोहा पंचक. . . . मजदूर

वक्त  बिता कर देखिए, मजदूरों के साथ ।

गीला रहता स्वेद से , हरदम उनका माथ ।।

सभी दिवस मजदूर के, जाते एक समान ।

दिन बीते निर्माण में, शाम क्षुधा का गान ।।

याद किया मजदूर के, स्वेद बिंदु को आज ।

उसकी ही पहचान है, , विश्व धरोहर ताज ।।

स्वेद बूँद मजदूर की, श्रम का है अभिलेख ।

हाथों में उसके नहीं , सुख की कोई रेख ।।

रोज भोर मजदूर की, होती एक समान ।

उदर क्षुधा से नित्य ही, लड़ती उसकी जान…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 1, 2024 at 4:30pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . .पुष्प - अलि

दोहा पंचक. . . . पुष्प -अलि

गंध चुराने आ गए, कलियों के चितचोर ।

कली -कली से प्रेम की, अलिकुल बाँधे डोर ।।

अलिकुल की गुंजार से, सुमन हुए भयभीत ।

गंध चुराने आ गए, छलिया बन कर मीत ।।

आशिक भौंरे दिलजले, कलियों के शौकीन ।

क्षुधा मिटा कर दे गए, घाव  उन्हें संगीन ।।

पुष्प मधुप का सृष्टि में, रिश्ता बड़ा अजीब ।

दोनों के इस प्रेम को, लाती गंध करीब ।।

पुष्प दलों को भा गई, अलिकुल की गुंजार ।

मौन समर्पण कर…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 27, 2024 at 1:51pm — 2 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service