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ग़ज़ल - मिश्कात अपने दिल को बनाने चली हूँ मैं

वज़्न -221 2121 1221 212

हस्ती में उसकी ख़ुद को मिलाने चली हूँ मैं
यानी कि अपने आप को पाने चली हूँ मैं

दरिया सिफ़त हूँ आब है मुझ में उसी का और
जानिब उसी की प्यास बुझाने चली हूँ मैं

रौशन चराग़ सा वो रहे मुझ में इसलिए
मिश्कात* अपने दिल को बनाने चली हूँ मैं

जिस ख़ाक से बनी हूँ फ़ना उस में ख़ुद को कर
मिट्टी वजूद अपना बचाने चली हूँ मैं

जब वो है मेरे गिर्द हवा-सा तो किस लिए
अपने क़रीब उस को बुलाने चली हूँ मैं

रहकर बदन की क़ैद में उसके विसाल को
अब रूह का परिंदा उड़ाने चली हूँ मैं

हर आरज़ू भुला के बस इक उसकी आरज़ू
इस 'आरज़ू' के नाज़ उठाने चली हूँ मैं

-©अंजुमन 'आरज़ू'
स्वरचित एवं अप्रकाशित

मिश्कात = वह बड़ा ताक़ या आला जिसमें चिराग़ रखा जाय

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 30, 2021 at 7:26pm

आदाब। बहुत बढ़िया दार्शनिक अभिव्यक्ति। हार्दिक बधाई आदरणीया अंजुमन आरज़ू जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2021 at 7:13am

आ. अंजुमन जी, अभिवादन। गजल का अच्छा प्रयास हुआ है। हार्दिक बधाई।

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 19, 2021 at 12:13pm

आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, ,ग़ज़ल तक पहुंचने और हौसला अफ़जाई करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया"

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 17, 2021 at 4:46pm

बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीया बधाई...

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 16, 2021 at 9:16pm

मोहतरम नाथ सोलंकी जी, मोहतरमा  Nilesh Shevgaonkar जी 

मोहतरम मोहतरम अमीरुद्दीन अमीर जी

ग़ज़ल तक पहुंचने और हौसला अफजाई करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया नवाज़िशें  

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 14, 2021 at 4:50pm

मुहतरमा आरज़ू साहिबा आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 14, 2021 at 8:44am

आ. आरज़ू जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई है.
ढेरों दाद स्वीकार करें 

Comment by नाथ सोनांचली on October 14, 2021 at 7:08am

आद0 Anjuman Mansury 'Arzoo' जी सादर अभिवादन

बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने। शेर दर शेर दाद कुबूल करें। सादर

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 12, 2021 at 1:21am

उस्ताद मोहतरम समर कबीर साहब आदाब, ग़ज़ल तक तशरीफ़ लाने के लिए तहे दिल से शुक्रिया, मैं सुधार की कोशिश करूंगी ।

Comment by Samar kabeer on October 11, 2021 at 7:32am

मुहतरमा अंजुमन `आरज़ू `` जी आदाब , ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है , बधाई स्वीकार करेंI 

`जिस ख़ाक से बनी हूँ फ़ना उस में ख़ुद को कर`

इस मिसरे का वाक्य विन्यास ठीक नहीं है , देखिएगा I 

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