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विजय दशमी (तीन दोहे दो रोले )

तीन दोहें....
बाहर रावण फूँक कर ,मानव तू इतराय |
नष्ट करेगा कब जिसे ,उर में रहा छुपाय ||

सच्चाई की जीत हो ,झूठ का हो विनाश |
कष्ट ये तिमिर का मिटे ,मन में होय प्रकाश ||

सत स्वरूपी राम है ,दर्प रूप लंकेश |
दशहरा पर्व से मिले ,यही बड़ा सन्देश ||

दो रोलें...
दैत्यों का हो अंत ,मिटे जग का अँधेरा
संकट जो हट जाय,वहीँ बस होय सवेरा
अपना ही मिटवाय ,छुपाकर अन्दर धोखा
लंका को ज्यों ढाय,बता कर भेद अनोखा

इंसा को दे मार ,अहम् का सर्प विषैला 

मत कर ना विश्वास,बड़ा यह दंश कसैला 
सद्जन उन्नत काम ,यहाँ अक्सर कर जाते 
सच का लेकर साथ ,महा सागर तर जाते      


*****************************************

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 25, 2012 at 9:21am

सुन्दर और सार्थक दोहे-रोले के लिए बधाई स्वीकारे आदरणीया राजेश जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 25, 2012 at 9:16am

आदरणीया राजेश कुमारी जी, बहुत बढ़िया दोहे हैं 

इक रावण को फूंक के ,मानव तू इतराय |
नष्ट करेगा कब जिसे ,उर में रहा छुपाय ||...यह दोहा तो लाजवाब है, हार्दिक बधाई आपको 

Comment by रविकर on October 25, 2012 at 9:16am

रोले और दोहे तो अच्छे हैं ही-
विषय और प्रस्तुतीकरण भी बढ़िया ||
बधाई दीदी ||

Comment by seema agrawal on October 24, 2012 at 11:37pm

इक रावण को फूंक के ,मानव तू इतराय |
नष्ट करेगा कब जिसे ,उर में रहा छुपाय ||...sach kahaa 

विजयदशमी पर्व  की  हार्दिक शुभकामनायें 

Comment by UMASHANKER MISHRA on October 24, 2012 at 11:30pm

आदरणीय राजेश कुमारी जी बहुत ही

सुन्दर एवं सार्थक दोहे कहे गए हैं

सभी उत्तम कोटी के हैं| आपकी भावना

एवं आपके जज्बात को नमन करता हूँ

रोला भी बहुत अच्छे बन पड़े हैं|

इक रावण को फूंक के ,मानव तू इतराय |
नष्ट करेगा कब जिसे ,उर में रहा छुपाय ||  वाह है 

बहुत बहुत बधाई  


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 24, 2012 at 6:45pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी, दशहरा के उपलक्ष्य में अच्छी अभिव्यक्ति, शिल्प के सम्बन्ध में आदरणीय सौरभ भईया इशारा कर ही दिए है, रोला तो एक ही है, या तो गलती से एक (रोला) अंकित है अथवा दो (रोलें) :-)

इस अभिव्यक्ति पर बहुत बधाई और दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार हो |

Comment by shalini kaushik on October 24, 2012 at 4:52pm

बहुत सुन्दर व्  सार्थक  अभिव्यक्ति .आपको विजयदशमी पर्व  की  हार्दिक शुभकामनायें 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 24, 2012 at 3:46pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी, विजयादशमी के शुभ अवसर पर इससे सम्यक शुभकामना नहीं हो सकती थी.

इक रावण को फूंक के ,मानव तू इतराय
नष्ट करेगा कब जिसे ,उर में रहा छुपाय ...  

दूसरे पद को देखते हुए पहले पद में राण का जलना भौतिक क्रिया भर लगती है. बहुत सही तथ्य उभर रहा है. बहुत-बहुत बधाई. वैसे इसे ऐसे भी हम करें तो दोनों पद एक दूसरे को संतुष्ट करते दीखेंगे- बाहर रावण फूँक कर, मानव तू इतराय.. यदि उचित लगे तो अवश्य साझा करियेगा.

सच्चाई की जीत हो ,झूठ का हो विनाश
कष्ट ये तिमिर का मिटे ,मन में होय प्रकाश.. . दूसरा पद, आदरणीया, कुछ और समय मांग रहा है.

सत स्वरूपी राम है ,दर्प रूप लंकेश
दशहरा पर्व से मिले ,यही बड़ा सन्देश......      बहुत सही. अत्यंत पगा हुआ दोहा बन पड़ा है.  इस दोहे के लिये हार्दिक बधाई स्वीकार करें. 

आपका दूसरा रोला छंद कहा है, राजेश कुमारी जी ? लगता है वह पोस्ट होने से रह गया है. कृपया उसे भी पोस्ट कर दें.

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