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"क्या ये खबर सही है कि एकाध दिन में दंगे शुरू होने वाले हैं ?"
"बिलकुल सही सुना भाई, खबर एकदम पक्की है." 
"तो फिर क्या प्रोग्राम बनाया ?"
"सोच रहा हूँ कि इस दफा उनकी पार्टी में शामिल हो जाऊं."

"अबे तेरा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया ? बेगानों का साथ देकर अपनों से गद्दारी करेगा? 
"वो साले बेगाने ज़रूर हैं, लेकिन दिहाड़ी भी तो डबल देते हैं."

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Comment by MAHIMA SHREE on August 27, 2013 at 11:38pm

वाह!!! आदरणीय योगराज सर .. बहुत ही कमाल का गठन .. इंसानी   फितरत  का भयानक पक्ष बहुत ही शानदार ढंग से व्यक्त हुआ है ....बहुत -२ हार्दिक बधाई ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 27, 2013 at 9:31pm

आदरणीय सर,

इस लघुकथा का गठन देख कर दंग हूँ..

बिना किसी पात्र का नाम लिए , इतनी कसावट के साथ एक जलता हुआ सत्य प्रस्तुत किया है.. आपके इस लेखन के लिए आपको बहुत बहुत बधाई 

सादर.

Comment by विजय मिश्र on August 27, 2013 at 5:11pm
पैसा जब से जिंदगी जीने का पैमाना बना है ,इंसान का अन्दाज बदल गया है . कोई कपड़े उतारने को आतुर है तो कोई खून बहाने को .पैसे का दम इंसानियत को बहुत कारगुजारी से बेदम किये जा रहा है .वाह रे पैसा !
Comment by aman kumar on August 27, 2013 at 4:45pm

अति सुंदर , मानव मानसिकता के अच्छे चितेरे है आप 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 27, 2013 at 1:08pm

किसके बारे में पहले सोचें देश,पेट या धर्म?? और गद्दारी किससे हो रही है ?? ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न हैं,
आदरणीय योगराज सर, इस बेहतरीन रचना के लिये दाद कुबूल करें, कम शब्दों में आपने इस मुद्दे की वृहत व्याख्या की है

Comment by Vasundhara pandey on August 27, 2013 at 8:07am

आदरणीय प्रभाकर जी ..कितनी खूबसूरती से कम शब्दों में इतनी जबरदस्त लघु कथा को पिरो दिये ...नतमस्तक हूँ...

Comment by vandana on August 27, 2013 at 7:30am

आदरणीय प्रभाकर सर

एक सशक्त लघुकथा ....वास्तविकता को चित्रित करती हुई बहुत बहुत बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on August 26, 2013 at 9:59pm

वाह! बहुत खूब! बहुत ही सशक्त लघुकथा! आदरणीय मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
सादर!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 26, 2013 at 8:54pm

आ0 प्रभाकर सर जी,  वाह! वाह!  बेहतरीन प्रस्तुति। एक सार्थक सोच...पैसे ने सभी को अंधा, पगला और कुण्ठापूर्ण जीवन जीने के लिए विवश कर दिया है।। बस!...पैसा चाहिए...?  हृदयतल से बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by Shubhranshu Pandey on August 26, 2013 at 8:19pm

आदरणीय योगराजभाई जी, आज के समय में दंगा दंगा खेलने वालों की कमी नहीं है....एक और सच्चाई, जिसे हम देख कर भी अनदेखा करते हैं. यह भूल नहीं अपराध है. ..

सादर

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