"अबे तेरा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया ? बेगानों का साथ देकर अपनों से गद्दारी करेगा?
"वो साले बेगाने ज़रूर हैं, लेकिन दिहाड़ी भी तो डबल देते हैं."
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वाह!!! आदरणीय योगराज सर .. बहुत ही कमाल का गठन .. इंसानी फितरत का भयानक पक्ष बहुत ही शानदार ढंग से व्यक्त हुआ है ....बहुत -२ हार्दिक बधाई ..
आदरणीय सर,
इस लघुकथा का गठन देख कर दंग हूँ..
बिना किसी पात्र का नाम लिए , इतनी कसावट के साथ एक जलता हुआ सत्य प्रस्तुत किया है.. आपके इस लेखन के लिए आपको बहुत बहुत बधाई
सादर.
अति सुंदर , मानव मानसिकता के अच्छे चितेरे है आप
किसके बारे में पहले सोचें देश,पेट या धर्म?? और गद्दारी किससे हो रही है ?? ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न हैं,
आदरणीय योगराज सर, इस बेहतरीन रचना के लिये दाद कुबूल करें, कम शब्दों में आपने इस मुद्दे की वृहत व्याख्या की है
आदरणीय प्रभाकर जी ..कितनी खूबसूरती से कम शब्दों में इतनी जबरदस्त लघु कथा को पिरो दिये ...नतमस्तक हूँ...
आदरणीय प्रभाकर सर
एक सशक्त लघुकथा ....वास्तविकता को चित्रित करती हुई बहुत बहुत बधाई
वाह! बहुत खूब! बहुत ही सशक्त लघुकथा! आदरणीय मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
सादर!
आ0 प्रभाकर सर जी, वाह! वाह! बेहतरीन प्रस्तुति। एक सार्थक सोच...पैसे ने सभी को अंधा, पगला और कुण्ठापूर्ण जीवन जीने के लिए विवश कर दिया है।। बस!...पैसा चाहिए...? हृदयतल से बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें। सादर,
आदरणीय योगराजभाई जी, आज के समय में दंगा दंगा खेलने वालों की कमी नहीं है....एक और सच्चाई, जिसे हम देख कर भी अनदेखा करते हैं. यह भूल नहीं अपराध है. ..
सादर
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