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एक शाम खड़ा था अपने घर के बाहर तभी एक गाड़ी मेरे घर के करीब आ रुकी, मेरे पडोसी कि गाड़ी थी ,अभी कल ही उनके घर में उनकी एक घनिष्ठ रिश्तेदार जो उनके यहाँ रहकर ही अपना इलाज करा रही थीं उनका निधन हो गया था जिसकी सूचना मुझे भी मिली थी , खैर कार का दरवाज़ा खुला और वो लोग बाहर निकले अपने हालचाल को व्यवस्थित किये हुए और मुझे देख कर हलकी सी मुस्कान में मुस्कराये मैंने पूछा ," कहीं बाहर गए थे आप लोग ? "

उन्हों ने कहा ," तनाव बहुत ज्यादा हो गया था तो सोचा चलो फ़िल्म देख कर आते हैं । "

मौलिक व अप्रकाशित

नीरज

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Comment by Shubhranshu Pandey on November 20, 2013 at 9:26am

आदरणीय नीरज जी, 

कथा की शुरुआत को एक बार और जाब टेबल पर जाने की आवश्यकता है.....सुन्दर कथा..

सादर.

Comment by annapurna bajpai on November 19, 2013 at 11:15pm

बाप रे !! ऐसे लोग भी हैं । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on November 19, 2013 at 9:48pm

सुन्दर लघुकथा...............


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 19, 2013 at 8:41pm

ऐसा ??.. :-(((

अच्छी लघुकथा है. भाषा पर भी ध्यान दें ..

शुभेच्छाएँ

Comment by Meena Pathak on November 19, 2013 at 5:30pm

यही सच है आज का .......

Comment by Ravi Prabhakar on November 19, 2013 at 5:09pm

सुन्‍दर लघु कथा, अति उत्‍तम

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 19, 2013 at 3:06pm

नीरज मिश्र जी

बिलकुल  सच कहा आपने i

संवेदना अब एक फार्मेलिटी बन चुकी है i

यह कड़वी  सच्चाई है

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 19, 2013 at 12:53pm

शायद ये आजकल का परिवेश है

सुन्दर लघु कथा के लिए बधाई हो आपको

कृपया ध्यान दे...

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