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ठूँठ  

था हराभरा मेरा संसार

खुशियाँ लगती थी मेरे द्वार

हरी हरी मेरी शाखायें

फूल पत्ते भरकर इठलाये||

 

मेरा जीवन उनसे था और

उन सब से ही में जीता था

छांव पथिक सुस्ता लेता था

थकन अपनी बिसरा देता था||

 

समय ने ऐसा खेल दिखाया

दूर हो गयी मेरी ही छाया

छोड़ गये सब मुझको मेरे

एक एक कर देर सबेरे||

 

कद मेरा यूँ हुआ बढ़ा

रह गया आज अकेला खड़ा

रूप रंग सब माटी मिल गया

यौवन आंधी ले गयी उड़ा||

 

रह गया बनकर बस एक ठूँठ

नित जहर के पीता हूँ घूंट

काम किसी के अब ना आया

साथ किसी का मैंने ना पाया||

 

खुद की भी अब रक्षा करना

मेरे बस की बात नही

रीता हो गया जीवन मेरा

कुछ भी तो अब साथ नही|| 

सरिता पन्थी  "मौलिक व अप्रकाशित "

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 13, 2014 at 11:29am

सरिता जी

कालचक्र तो अपना काम करता हे है पर ठूंठ की अपनी उपयोगिता होती है i जब तक पिता का साया रहता है हम कितना अपने आप को सुरक्षित पाते हैं भले ही वे कितने बूढ़े हो गए हों i काया से साया का महत्त्व अधिक है i सादर i

Comment by pooja yadav on November 13, 2014 at 9:04am
Sundar kavita. .
Comment by somesh kumar on November 12, 2014 at 9:04pm

जीवन कभी भी व्यर्थ नहीं होता हमेशा एक प्रयोजन होता है ,ठूंठ पेड़ कई जीवों का आश्रयदाता बनता है और बुजुर्गों के सान्निध्य में परिवार आगे पल्लवित होता है ,सुंदर रचना हेतु आपको बधाई 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 12, 2014 at 11:57am

सुंदर भाव प्रस्तुति के लिए बधाई 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 12, 2014 at 11:37am

अच्छी अभिव्यक्ति है मा० सरिता पंथी जी ।

Comment by Neeraj Neer on November 12, 2014 at 11:35am

सुंदर भाव निदर्शन। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 12, 2014 at 10:51am

वृक्ष का बिम्ब लेकर वृद्धावस्था के एकाकीपन का अद्दभुत चित्र खींचा है रचना में बहुत बहुत बधाई आपको सरिता जी 

Comment by Shyam Narain Verma on November 12, 2014 at 10:23am

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ... सादर बधाई

Comment by khursheed khairadi on November 12, 2014 at 9:37am

आदरणीय सरिता पंथी जी ,

रह गया बनकर बस एक ठूँठ

नित जहर के पीता हूँ घूंट

काम किसी के अब ना आया

साथ किसी का मैंने ना पाया||

अच्छा बिम्ब है ,सुन्दर रचना हुई है सादर अभिनन्दन 

Comment by Hari Prakash Dubey on November 12, 2014 at 9:19am

इस अच्छी रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय सरिता पन्थी जी 

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