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सज़ा इश्क़ की बेवफ़ाई न दे (ग़ज़ल)

122 122 122 12

सज़ा इश्क़ की बेवफाई न दे
भले मौत दे पर जुदाई न दे

है मंज़ूर रहना हमें क़ैद में
वो आँखों से जबतक रिहाई न दे

ये इंसाफ़ कैसा है तेरा ख़ुदा
तू जाड़ा तो दे पर रजाई न दे

कहेगा जो सच तो कटेगी जुबां
छुपा बेगुनाही, सफाई न दे

मचा शोर कैसा शहर में, सदा
किसी को किसी की सुनाई न दे

बहुत दूर है मेरी मंज़िल अभी
सफ़र देख मेरा, बधाई न दे
===================

जयनित कुमार मेहता
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 2, 2016 at 10:06pm

जनाब जयनित कुमार साहिब ,  अच्छी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं। ..... उर्दू के हिसाब से शहर को वज़न 21 में ही बाँधा जाता है जनाब रवि साहिब दुरुस्त फरमा  रहे हैं

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 2, 2016 at 6:15pm
आप सभी OBO के सम्मानित सदस्यों,आदरणीय गुणीजनों के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ!!
सादर..!
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 2, 2016 at 4:09pm
अच्छे अश’आर हुए हैं आदरणीय जयनित जी, दाद कुबूल करें
Comment by Hari Prakash Dubey on February 2, 2016 at 2:05am

कहेगा जो सच तो कटेगी जुबां
छुपा बेगुनाही, सफाई न दे....शानदार ,हार्दिक बधाई आ.जयनित कुमार मेहता जी !

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 31, 2016 at 8:43am

kहूब ग़ज़ल ..क्या कहने वाह 

Comment by Sushil Sarna on January 29, 2016 at 9:21pm

वाह बहुत ही खूबसूरत अशआर हुए हैं आदरणीय। दिल से दाद कबूल फरमाएं और हाँ आदरणीय रवि शुक्ला जी का कथन ज्ञान की एक और सीढ़ी दर्शाती है। इस हेतु उनका भी हार्दिक आभार। 

Comment by Alok Mittal on January 29, 2016 at 5:59pm
वाह्ह बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही आपने ....बहुत बहुत बधाई आपको
Comment by MUKESH SRIVASTAVA on January 29, 2016 at 5:58pm

teesra she'r kuchh hlakaa laga mtira - but pooree gazal achhee hai badhaee bandhu

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 29, 2016 at 2:42pm
बहुत ख़ूब आदरणीय जयनित जी
Comment by Samar kabeer on January 29, 2016 at 2:41pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,बहुत अच्छी सधी हुई ग़ज़ल कही आपने,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं !
में जनाब रवि शुक्ल जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ,उनकी बात पर ग़ौर कुजियेगा !

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