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ग़ज़ल -- "दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है" ( दिनेश )

2122--1212--22

ग़ज़ल .....

ज़िन्दगी क्या है औ'र क़ज़ा क्या है
कौन जाने ये माजरा क्या है

एक जलता हुआ चराग़ हूँ मैं
मुझको मालूम है... हवा क्या है

हक़-परस्ती गुनाह था मेरा
मैं हूँ हाज़िर..बता सज़ा क्या है

दर्दे-जाँ ने भी आज पूछ लिया
ज़ब्त की तेरे इंतेहा क्या है

नाव साहिल प आके डूब गई
इसमें तूफ़ान की ख़ता क्या है

झूट लालच फ़रेब चालाकी
देख इन्सान में बचा क्या है

तेरी मरज़ी से कुछ नहीं होगा
तू दिनेश इतना सोचता क्या है

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 646

Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on February 3, 2017 at 8:52pm
आदरणीय दिनेश जी, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल पेश की है आपने। और आदरणीय समर कबीर जी की मूल्यवान प्रतिक्रिया भी आपको मिल चुकी है। सभी शेर बेहतरीन हैं, अगर आपके पांचवे शेर को यूं कहा जाए तो इसकी खूबसूरती बढ़ जाएगी-
"झूट लालच फरेब चालाकी
और इन्सान में बचा क्या है"

सादर!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 3, 2017 at 6:27pm

आदरणीय दिनेश भाईजी, चचा ग़ालिब की ज़मीन पर उम्दा ग़ज़ल कही है आपने.  बहुत बहुत बधाई. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 3, 2017 at 10:12am

आदरणीय दिनेश भाई , खूब सूरत ग़ज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2017 at 12:19pm

बहुत खूब ... हार्दिक बधाई .

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 1, 2017 at 9:07pm
वाह क्या खूबसूरत ग़ज़ल हुई..बेहतरीन
Comment by narendrasinh chauhan on February 1, 2017 at 6:17pm

खूब सुन्दर रचना 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 31, 2017 at 9:00pm
वाह आ. दिनेश भाई ग़ालिब साहब की ज़मीन पर अच्छी ग़ज़ल हुई है बहुत बहुत बधाई
Comment by Gurpreet Singh jammu on January 31, 2017 at 5:56pm
वहवाह दिनेश जी बहूत ही अच्छी ग़ज़ल कही है आपने.
Comment by दिनेश कुमार on January 31, 2017 at 6:14am
आदरणीय समर साहब। हौसला अफ़ज़ाई और सुधार के लिए तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ। नवाज़िश।
Comment by Samar kabeer on January 30, 2017 at 10:39pm
जनाब दिनेश कुमार 'दानिश' साहिब आदाब,ग़ालिब की ज़मीन में उम्दा ग़ज़ल कही आपने ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।

मतले के सानी मिसरे में 'माज़रा' को "माजरा" कर लें ।


"हक़-परस्ती गुनाह था मेरा
मैं हूँ हाज़िर..मेरी सज़ा क्या है"

इस शैर के सानी मिसरे को यूँ करें तो बहतर होगा :-

"मैं हूँ हाज़िर,बता सज़ा क्या है"

क्यूँकि एक शैर में तीन बार एक ही तरह के शब्द 'मेरा','मैं हूँ','मेरी' की तकरार अच्छी नहीं लगती ।

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