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जितना बड़ा जो झूठा है वो, उतना ही अधिक चिल्लाता है - शिज्जु शकूर

221 1222 22 221 1222 22

जितना बड़ा जो झूठा है वो, उतना ही अधिक चिल्लाता है

आवाज़ के पीछे चुपके से, रस्ते से यूँ भी भटकाता है

 

तुम बाँच रहे हो जो इतना, अज्दाद के किस्से मंचों से

उन किस्सों को सुनने वाला अब, पत्थर पे जबीं टकराता है

 

इंसान फ़कत है इक ज़र्रा, मिट जाएगा खुद इक झटके में

आकाश को छूती मीनारें, बेकार ही तू बनवाता है

 

है रंग बदलने में माहिर, हर शख़्स सियासत के अंदर

कुछ भी कहे वो लेकिन मतलब, कुछ और निकलकर आता है

 

इस लोक का तुझको क्या कोई, है ज्ञान ज़रा बतला बाबा!

अनदेखी कहानी गढ़-गढ़कर, परलोक मुझे दिखलाता है

अज्दाद - पुरखे

(मौलिक, अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on March 28, 2018 at 4:28am

आद0 शिज्जू शकूर जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने।ह्रे शैर कुछ न कुछ अपने अंदर समेटे हुए है। मतला बहुत खूबसूरत।

इस लोक का तुझको क्या कोई, है ज्ञान ज़रा बतला बाबा!

अनदेखी कहानी गढ़-गढ़कर, परलोक मुझे दिखलाता है

वाह क्या कहने। शैर दर शैर मुबारकवाद कुबूल करें।

Comment by TEJ VEER SINGH on March 26, 2018 at 8:24pm

हार्दिक बधाई आदरणीय शिज्जू शकूर जी।लाज़वाब गज़ल।

है रंग बदलने में माहिर, हर शख़्स सियासत के अंदर

कुछ भी कहे वो लेकिन मतलब, कुछ और निकलकर आता है

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 26, 2018 at 6:29pm

आ. भाई शिज्जू जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 26, 2018 at 11:02am

क्या कहने आदरणीय शानदार ग़ज़ल पढ़ने को मिली..सादर

Comment by somesh kumar on March 25, 2018 at 3:26pm

है रंग बदलने में माहिर, हर शख़्स सियासत के अंदर

कुछ भी कहे वो लेकिन मतलब, कुछ और निकलकर आता है

 

सियासत का यह शे र बेहद पसन्द आया |सारी गजल ही व्यंग्य से भरी हुई है |इस रचना पर दिली बधाई |

Comment by Samar kabeer on March 25, 2018 at 3:01pm

जनाब शिज्जु शकूर साहिब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by Ajay Tiwari on March 25, 2018 at 12:05pm

आदरणीय शिज्जू जी,

आपकी इस ग़ज़ल के बारे में एक दिलचस्प चीज ये है कि इसकी तकती 'हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़ मुखन्नक मुजाइफ़' (मफ़ऊलु  मफ़ाईलुन  फेलुन मफ़ऊलु  मफ़ाईलुन  फेलुन > 221 1222 22 221 1222 22) और 'मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुस्सकिन मुज़ाइफ़'  (फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन > 22  22 22 22 22  22  22  22)  दोनों में हो सकती है. और दोनों के हिसाब से यह ठीक है.

इसको 221 1222 22 221 1222 22 पर निभाना एक असाधारण चीज है. इसके लिए अतिरिक्त दाद!

सादर 

Comment by Ajay Tiwari on March 25, 2018 at 11:17am

आदरणीय शिज्जू जी,  उम्दा ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

 

जितना बड़ा जो झूठा है वो, उतना ही अधिक चिल्लाता है

आवाज़ के पीछे चुपके से, रस्ते से यूँ भी भटकाता है 

:)))))))))

आखिरी शेर भी बहुत अच्छा लगा .

सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 25, 2018 at 8:47am

आ. शिज्जू भाई,
कल आयोजन में आपकी कमी खली...
लेकिन   आप है कि दीपावली   खत्म होने के बाद पटाखे चला रहे हैं..
बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है ...
.

इंसान फ़कत है इक ज़र्रा, मिट जाएगा खुद इक झटके में

आकाश को छूती मीनारें, बेकार ही तू बनवाता है...इस शेर के लिए बधाई ..
सादर 

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