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ग़ज़ल : कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

बह्र : 2122 1122 1122 22

कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

आओ बैठो यहाँ पे हश्र हमारा देखो

कैसे हिन्दू को किया दफ़्न वहाँ लोगों ने

एक मुस्लिम को यहाँ कैसे जलाया देखो

जिस तरह लूटा था दिल्ली को कभी नादिर ने

उसने लूटा है मेरे दिल का ख़ज़ाना देखो

आदमी वो नहीं होता जो दिखा करता है

जो नहीं दिखता हो जैसा उसे वैसा देखो

नूर से जल के, फ़लक से कोई साज़िश करके

चाँद को कैसे सितारों ने निकाला देखो

इक जहन्नम के सिवा और भला है भी क्या

मैं कहूँगा न किसी से कि ये दुनिया देखो

लोग जितना ही सुधरने को हमें कहते थे

हमने उतना ही यहाँ ख़ुद को बिगाड़ा देखो

मैंने भी छोड़ दिया ख़ुद को तो अब दुख कैसा

तुमने चाहा ही यही था मुझे तन्हा देखो

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:45am

आदरणीय रवि जी, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और इस्लाह का बहुत-बहुत शुक्रिया. आपकी सलाह अनुसार शेर को दुरुस्त करने का प्रयास करता हूँ. हार्दिक आभार. सादर. 

Comment by Md. Anis arman on January 16, 2019 at 11:15am

महेन्द्र जी बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है बहुत बहुत बधाई, बाकी जो समर साहब कहें हैं वो गौर करने वाली बात है आप के माध्यम से मुझे भी सीखने को मिला 

Comment by नाथ सोनांचली on January 16, 2019 at 6:31am

आद0 महेंद्र जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by Ajay Tiwari on January 15, 2019 at 7:16pm

आदरणीय महेंद्र जी, अच्छी ग़ज़ल हुई  है. मतला खास तौर से अच्छा लगा. हार्दिक बधाई.

Comment by राज़ नवादवी on January 15, 2019 at 12:40am

आदरणीय महेंद्र कुमार जी, आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे दाद के साथ मुबारकबाद. 

मैंने भी छोड़ दिया ख़ुद को तो अब दुख कैसा
तुमने चाहा ही यही था मुझे तन्हा देखो

बहुत ख़ूब. वाह वाह. 

Comment by Samar kabeer on January 14, 2019 at 5:53pm

जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

' उन सितारों ने वहाँ रौशनी से जल भुन कर
चाँद को आसमाँ से मिल के निकाला देखो'

इस शैर के ऊला में 'वहां' और सानी में 'आसमाँ' शब्द शिल्प की कमज़ोरी का प्रतीक है,ग़ौर करें,यूँ कर सकते हैं:-

'नूर से जल के फ़लक से कोई साज़िश करके

चाँद को कैसे सितारों ने निकाला देखो'

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 14, 2019 at 12:53pm

आदमी वो नहीं होता जो दिखा करता है 
जो नहीं दिखता हो जैसा उसे वैसा देखो --- क्या बात है साहेब तबीयत तर कर दी गज़ब के अशआर है | 

Comment by Ravi Shukla on January 14, 2019 at 10:31am

आदरणीय महेंद्र जी बहुत अच्छी ग़ज़ल आपने कही दिली मुबारकबाद पेश करता हूं दिखा  दिखता इन शब्दों के अपेक्षा दिखाई शब्द का प्रयोग करें तो वाक्य विन्यास की दृष्टि से अधिक अच्छा होगा सादर

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