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Naveen Mani Tripathi
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  • Ajay Tiwari
 

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babitagupta commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"वतनपरस्ती का जज्बा बयान करती पंक्तियाँ ,बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक   बधाई स्वीकार कीयेगा आदरणीय सरजी।"
1 hour ago
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है बधाई स्वीकार करें । कुछ अशआर में रदीफ़ और क़ाफ़िये का तालमेल नहीं,यानी रदीफ़ से इंसाफ़ नहीं हो पाया है,देखियेगा ।"
2 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन समसामयिक गज़ल। मौजूदा हालात पर बढ़िया कटाक्ष। है पापी पेट से रिश्ता पकौड़े बेच लेंगे हम।मगर गद्दारियाँ तेरी हमेशा याद रक्खेंगे ।।"
6 hours ago
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222 बड़ी उम्मीद थी उनसे वतन को शाद रक्खेंगे ।खबर क्या थी चमन में वो सितम आबाद रक्खेंगे ।।है पापी पेट से रिश्ता पकौड़े बेच लेंगे हम।मगर गद्दारियाँ तेरी हमेशा याद रक्खेंगे ।।हमारी पीठ पर ख़ंजर चलाकर आप तो साहब ।नये जुमले से नफ़रत की नई बुनियाद रक्खेंगे ।।विधेयक शाहबानो सा दिये हैं फख्र से तोहफा ।लगाकर आग वो कायम यहां उन्माद रक्खेंगे ।।इलक्शन आ रहा है दाल गल जाए न फिर उनकी।तरीका हम भी अपने वास्ते ईज़ाद रक्खेंगे ।।बहुत अब हो चुका हिन्दू मुसलमां का यहाँ नाटक ।तुम्हारी ख्वाहिशों को हम तो…See More
8 hours ago
Ravi Shukla commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नवीन मणि जी गजल के  लिए बधाई स्वीकार करें आदरणीय समर साहब की इस्लाह से कवाफी का मुआमला स्पषट हो गया होगा "
Friday
vijay nikore commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"गज़ल अच्छी बनी है। आपको बधाई, नवीन जी।"
Aug 8
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"बहुत बहुत धन्यवाद सर । मैंने अते काफ़िया बनाने का प्रयास किया था । यहां अलिफ़ साइलेंट होकर जुड़ा हुआ है । हलाकि यह काफ़िया विवादित माना जाता है पर कुछ लोग इस पर सहमति भी देते हैं ।      आपके कमेंट से मेरा कन्फ्यूजन दूर हुआ हार्दिक आभार…"
Aug 7
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"ये मतला भी गलत है,आपका क़ाफ़िया 'ते' है तो हर्फ़-ए-रवी क्या है? मतला यूँ करें फिर आप समझ लेंगे कि क़वाफ़ी क्या होने चाहिए:- 'वहाँ हमने देखा जहाँ भी गये हैं ख़ुदा के तो यारो हज़ारों पते हैं'"
Aug 7
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 कबीर सर सादर नमन बिलकुल सहमत हूँ । जल्दबाजी में गलती हो गयी है । मतला चेंज करता हूँ । जहां भी गये हम वहां  देखते  हैं । खुदा के भी यारो हजारों पते हैं ।। देखिये सर क्वाफी दुरुस्त हुआ या नहीं ।"
Aug 7
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 कबीर सर सादर नमन बिलकुल सहमत हूँ । जल्दबाजी में गलती हो गयी है । मतला चेंज करता हूँ । जहां भी गये हम वहां  देखते  हैं । खुदा के भी यारो हजारों पते हैं ।। देखिये सर क्वाफी दुरुस्त हुआ या नहीं ।"
Aug 7
TEJ VEER SINGH commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन गज़ल। जो ठुकरा दिए थे मेरी बन्दगी को ।मेरे घर का वो भी पता ढूढते हैं ।।"
Aug 7
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,इस ग़ज़ल में क़वाफ़ी सहीह नहीं हैं,देखियेगा ।"
Aug 7
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"'बन के सुकरात कोई ज़ह्र पिया हो जैसे' इस मिसरे पर जनाब रवि जी की शंका ठीक लगती है,चाहें तो यूँ भी कर सकते हैं:- 'ज़ह्र सुक़रात ने फिर आज पिया हो जैसे' क्या कहते हैं रवि जी इस मिसरे के बारे में?"
Aug 7
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 रवि शुक्ला जी सप्रेम आभार । इस पर मैं आ0 कबीर साहब का विचार भी आमंत्रित करता हूँ । "
Aug 7
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

122 122 122 122 न जाने मुहब्बत में क्या चाहते हैं ।जरा सी वफ़ा पर वो दिल मांगते हैं ।।जिन्हें कुछ खबर ही नहीं दर्द क्या है ।वही ज़ख़्म मेरा बहुत देखते हैं ।।अगर वास्ता ही नहीं आपसे है ।मेरा हाले दिल आप क्यूँ पूछते हैं ।।असर चाहतों का दिखा फिर है उनका ।अदाओं में चिलमन से जब झांकते हैं ।।जो ठुकरा दिए थे मेरी बन्दगी को ।मेरे घर का वो भी पता ढूढते हैं ।।जुदाई में हमको ये तोहफ़ा मिला है ।के हम रात भर याद में जागते हैं ।।मिली मंजिलें हैं उन्हीं को यहां पर ।समर्पण लिए जो डगर खोजते हैं ।।उन्हें फ़िक्र होगी…See More
Aug 7
Ravi Shukla commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणाीय नवीन मणिजी गजल के लिए बघाई स्वीकार करें  हर को काेई  पिये जैसे  या किसी ने जहर  पिया हो जैसे  कुछ इस प्रकार वाक्य विन्यास होरहा है इस  मिसरे में । शंका का समाधान कीजियेगा। सादर "
Aug 6

Profile Information

Gender
Male
City State
Kanpur , Uttar Pradesh
Native Place
Basti
Profession
Govt. Service
About me
I am a poet and trained astrologer. Write geet and ghazal.

Naveen Mani Tripathi's Blog

ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222 

बड़ी उम्मीद थी उनसे वतन को शाद रक्खेंगे ।

खबर क्या थी चमन में वो सितम आबाद रक्खेंगे ।।

है पापी पेट से रिश्ता पकौड़े बेच लेंगे हम।

मगर गद्दारियाँ तेरी हमेशा याद रक्खेंगे ।।

हमारी पीठ पर ख़ंजर चलाकर आप तो साहब ।

नये जुमले से नफ़रत की नई बुनियाद रक्खेंगे ।।

विधेयक शाहबानो सा दिये हैं फख्र से तोहफा ।

लगाकर आग वो कायम यहां उन्माद रक्खेंगे ।।

इलक्शन आ रहा है दाल गल जाए न फिर उनकी।

तरीका…

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Posted on August 14, 2018 at 8:06pm — 3 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122 

न जाने मुहब्बत में क्या चाहते हैं ।

जरा सी वफ़ा पर वो दिल मांगते हैं ।।

जिन्हें कुछ खबर ही नहीं दर्द क्या है ।

वही ज़ख़्म मेरा बहुत देखते हैं ।।

अगर वास्ता ही नहीं आपसे है ।

मेरा हाले दिल आप क्यूँ पूछते हैं ।।

असर चाहतों का दिखा फिर है उनका ।

अदाओं में चिलमन से जब झांकते हैं ।।

जो ठुकरा दिए थे मेरी बन्दगी को ।

मेरे घर का वो भी पता ढूढते हैं ।।

जुदाई में हमको ये तोहफ़ा…

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Posted on August 6, 2018 at 10:33pm — 7 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

कुछ धुंआ घर के दरीचों से उठा हो जैसे ।

फिर कोई शख्स रकीबों से जला हो जैसे ।।

खुशबू ए ख़ास बताती है पता फिर तेरा ।

तेरे गुलशन से निकलती ये सबा हो जैसे ।।

बादलों में वो छुपाता ही रहा दामन को ।

रात भर चाँद सितारों से ख़फ़ा हो जैसे ।।

जुल्म मजबूरियों के नाम लिखा जायेगा ।

बन के सुकरात कोई ज़ह्र पिया हो जैसे ।।

खैरियत पूँछ के होठों पे तबस्सुम आना ।

हाल ए दिल मेरा तुझे खूब पता हो जैसे…

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Posted on August 4, 2018 at 9:03pm — 14 Comments

आ जाती है मौत यहाँ अनजाने में

22 22 22 22 22 2



भीड़ बहुत है अब तेरे मैख़ाने में ।।

लग जाते हैं दाग़ सँभल कर जाने में ।।1

महफ़िल में चर्चा है उसकी फ़ितरत पर ।

दर्द लिखा है क्यों उसने अफ़साने में ।।2

इस बस्ती में मुझको तन्हा मत छोडो ।

लुट जाते हैं लोग यहाँ वीराने में ।।3

वह भी अब रहता है खोया खोया सा ।

कुछ तो देखा है उसने दीवाने में ।।4

होश गवांकर लौटा हूँ मैख़ानों से।

जब उभरा है अक्स तेरा…

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Posted on July 28, 2018 at 10:50pm — 13 Comments

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At 6:32am on August 5, 2018, Kishorekant said…

लाजवाब रचना केलिये आपको बहुत बहुत बधाइयाँ आदरणीय नविनमणी त्रिपाठी जी  ,

At 2:14am on May 8, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें!

 
 
 

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