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July 2010 Blog Posts

प्यार तो मैं भी करता हूँ ,

प्यार तो मैं भी करता हूँ ,
पर कहने से डरता हूँ ,
कारण जग विदित हैं ,
उन्हें आरक्षण जो मिला हैं
इसी से डरता हूँ ,
शादी हम से करे ,
आरक्षण का फायदा ,
कही और उठायें ,
कारण यही हैं ,
कदम उठाने से डरता हूँ,
प्यार तो मैं भी करता हूँ ,

Added by Rash Bihari Ravi on July 3, 2010 at 3:30pm — 3 Comments

मिल गये

जो थे अरसे से खामोश मेरे इन होठों को तराने मिल गये

लड़ा पत्थरों से कुछ ऐसे की हीरों के खजाने मिल गये



गया मेरी जिंदगी से, मुझे मरने के लिए छोड़ गया वो

अब भी हूँ जिंदा मस्ती मे, मुझे जीने के बहाने मिल गये



जो था मेरा अपना वो मुझसे अब नज़रें चुराने लग गया

पर इस महफ़िल मे हंसकर गले मुझसे बैगाने मिल गये



घर से मिकला था की जाऊँगा मंदिर पर अभी तो नशे मे हुँ

अगली ही गली मे मुझे ये कितने सारे मयखाने मिल गये



गया था कुछ बैगानों की महफ़िल मे कल… Continue

Added by Pallav Pancholi on July 2, 2010 at 11:46pm — 4 Comments

कवि घाघ और उनकी बहू के बीच परिसंवाद

उत्तर भारत में घाघ नामक एक बहुत प्रसिद्ध किसानी कवि हुए थे.

उनकी रचनाएँ आज भी ग्रामीणों द्वारा कही-सुनी जाती हैं.

उनकी बहू भी बहुत बुद्धिमान थीं.

नीचे की संकलित रचनाओं में उनके परिसंवाद हैं :-



1.

घाघ कहते हैं :-



पउआ पहिन के हर जोते,

सुथनी पहिन के निरावे,

कहें घाघ उ तीनों भकुआ,

सिर बोझा ले गावे.



घाघ की बहू कहती हैं :-



अहिरा हो के हर जोते,

तुरहिन हो के निरावे,

छैला होके कस न गावे,

हलुक बोझा जो… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 2, 2010 at 3:24pm — 4 Comments

सभ्यता की पहचान

दिन,प्रतिदिन,

हर एक पल,

हमारी सभ्यता और संस्कृति में

निखार आ रहा है,

हम हो गए हैं,

कितने सभ्य,

कौआ यह गीत गा रहा है.

पहले बहुत पहले,

जब हम इतने सभ्य नहीं थे,

चारों तरफ थी खुशहाली,

लोगों का मिलजुलकर,

विचरण था जारी,

जितना पाते,

प्रेम से खाते,

दोस्तों पाहुनों को खिलाते,

कभी-कभी भूखे सो जाते.

आज जब हम सभ्य हो गए हैं,

देखते नहीं,

दूसरे की रोटी,

छिनकर खा रहे हैं,

और अपनों से कहते हैं,

छिन…
Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 2, 2010 at 3:16pm — 4 Comments

पर चर्चा के आनंद

पर चर्चा के आनंद

एगो भोजपुरी साईट के स्वघोषित स्वयम्भू आ उनकर कुछ चाटुकार मित्र मंडली समय -समय पर भोजपुरी भासी लोगन के इ एहसास करावत रहेला की उ लोग के अलावे पूरा बिहार ,उत्तरप्रदेश ,झारखण्ड, के बारे में केहू सोचे वाला नइखे (पता ना सोच -सोच के का भला करले बा लोग) | समय -समय पर अपना उत्क्रिस्ट (बिखिप्त) भासा से समझावे के बेजोड़ कोशिश करे ला लोग | आ एहू बात के ख्याल रखे ला लोग की उ लोग के बराबरी केहू खाड़ा ना होखे पावस | आ आपन हर लेख के माध्यम से ई एहसाश करावे ला लोग की उ लोग जौन लिखलस उ… Continue

Added by BIJAY PATHAK on July 2, 2010 at 2:10pm — 3 Comments

वर्षा एक --रूप अनेक

जयेष्ट की गर्मी से झुलसी

धरती को

वर्षा की पहली बूंदों से

ख़ुशी मिली

मानो .....

लंका दहन के बाद

हनुमान जी कूदें हो

समुद्र में ॥



सूर्य के अंगारे झेल रही

वर्षा की पहली बूंदों से

किसानों को

ख़ुशी मिली

मानो .....

रावण -वध के बाद

रामचंद्र जानकी सहित

लौटे हो अयोध्या ॥



वर्षा की पहली बूंदें

धरती पर जैसे गिरी

माँ ने .....

गाय के गोबर से बने

सारे उपले

घर के अन्दर कर ली ॥



वर्षा की… Continue

Added by baban pandey on July 2, 2010 at 8:31am — 2 Comments

मुक्तिका: ज़ख्म कुरेदेंगे.... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



ज़ख्म कुरेदेंगे....



संजीव 'सलिल'

*

*

ज़ख्म कुरेदेंगे तो पीर सघन होगी.

शोले हैं तो उनके साथ अगन होगी..



छिपे हुए को बाहर लाकर क्या होगा?

रहा छिपा तो पीछे कहीं लगन होगी..



मत उधेड़-बुन को लादो, फुर्सत ओढ़ो.

होंगे बर्तन चार अगर खन-खन होगी..



फूलों के शूलों को हँसकर सहन करो.

वरना भ्रमरों के हाथों में गन होगी..



बीत गया जो रीत गया उसको भूलो.

कब्र न खोदो, कोई याद दफन होगी..



आज हमेशा… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on July 1, 2010 at 10:48pm — 3 Comments

kirdaar

किरदार
-------
वक़्त के लम्बे सफ़र में
किरदार
यूं बदल जाते हैं
वोह, जो कल
चला करते थे
थामे अंगुली हमारी
वही आज
आगे बढ़
हमें राह
दिखाते हैं

Added by rajni chhabra on July 1, 2010 at 2:28pm — 3 Comments

गीत: आँख का पानी -संजीव 'सलिल'

गीत



संजीव 'सलिल'

*

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*

बेचते हो क्यों

कहो निज आँख का पानी?

मोल समझो

बात का यह है न बेमानी....



जानती जनता

सियासत कर रहे हो तुम.

मानती-पहचानती

छल कर रहे हो तुम.

हो तुम्हीं शासक-

प्रशासक न्याय के दाता.

आह पीड़ा दाह

बनकर पल रहे हो तुम.

खेलते हो क्यों

गँवाकर आँख का पानी?

मोल समझो

बात का यह है न बेमानी....



लाश का

व्यापार करते शर्म ना आई.

बेहतर… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on July 1, 2010 at 8:30am — 3 Comments

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