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PHOOL SINGH's Blog – January 2020 Archive (5)

आखिरी ख़्वाहिश

देख लोगो को रोते हुए

ज़ोर से लाश एक हँस पड़ी

जीते जी तो जीने दिया ना

गुस्से में वो बिफर पड़ी ||

खरी-खोटी मुझे रोज सुनाते

तनिक भी ना परवाह थी

दिल पे मेरी क्या गुजरती

घुट-घुट के मैं रोती थी ||

खुदा बक्शे अगर, जिंदगी

औकात दिखा दे अभी सभी

घड़ियाल से आँसू जो बहाते

असलियत आ जाए सामने अभी ||

भूल जायेंगें कुछ ही दिन में

याद ना आयें मेरी कभी

अच्छी-बुरी मेरी बातें कर

सहानुभूति…

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Added by PHOOL SINGH on January 31, 2020 at 5:00pm — 2 Comments

आधुनिक नारी

संचालित कर दया करूणा, स्वार्थ पूर्ति का भाव नहीं

खुद को समर्पित तुझको कर दूँ,

इच्छाऐं मेरी खास नहीं ॥

 

डोली सजा तेरे दर पर आई, उगने वाली कोइ घास नहीं

हाथ उठाने की गलती ना करना,

नहीं सहुंगी वार कोई ॥

 

तेरे इशारों पर इत-उत डोलूँ, तूँ कोई सरकार नहीं

क्रोध करो मैं थर्र थर्र कांपू,

डरने वाली मैं नार नहीं ॥

 

तुम जालाओं शमां की महफिल, होके नशे में धुत कहीं

ढूँढ बहाने झूठ भी बोलो

इतना तुम पर ऐतबार…

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Added by PHOOL SINGH on January 21, 2020 at 12:00pm — 2 Comments

एक अभागिन किन्नर

ना मर्म का मेरे भान किसी को, लेकिन फिर भी जिंदा हूँ

ना औरत, ना पुरुष हूँ, कहने को मैं किन्नर हूँ|

 

सारा समाज धुत्कार मै खाती, जैसे समाज पे अभिशाप कोई

सोलह शृंगार कर हर दिन सजती, जैसे सुहागिन औरत हूँ |

 

मात-पिता भी कलंक समझते, बदनामी का उनकी कारण हूँ

दुख-दर्द भी ना कोई पूछता, जैसी उनकी ना मै कोई हूँ |

 

ना रोजी-रोटी का साधन कोई, मांग…

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Added by PHOOL SINGH on January 15, 2020 at 11:56am — 3 Comments

अच्छा लगा

अच्छा लगा तेरा प्रेम से मिलना

कुछ अपनी कही, कुछ मेरे सुनना

स्वार्थ से भरी इस दुनियाँ में

सभी के हित की बातें करना ||

 

वक़्त के संग में तेरा बदलना

हसमुखता को धारण करना

उड़ान भर खुली हवा में

सुंदर, ख्वाबो की माला बनुना ||

 

 हौंसलों भर अपने उर में

भूल के बीती बात को  आगे बढ़ना

याद आ जाए कोई भुला-बिसरा

झट से उसका हाल जानना || 

 

काम, क्रोध और…

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Added by PHOOL SINGH on January 14, 2020 at 5:22pm — 4 Comments

“भ्रम जाल”

भ्रम जाल ये कैसा फैला

खुद को खुद ही भूल चुका  

ना वाणी पर संयम किसीका  

उर में माया, द्वेष भरा |

 

कोह में अपना विनती भाव भुलाया  

जो धैर्य भी से दूर हुआ

गरल इतना उर में भरा है कि

क्षमा, प्रेम करना ही भूल गया |

 

करुणा दया भी पास नहीं अब

पशुत्व के जैसा बन चुका

भलाई का दामन ओढ़ की जाने

पीठ पीछे चुरा घोप रहा |

 

आत्महित में अनेत्री बन गए जैसे  

भयंकर बैर का…

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Added by PHOOL SINGH on January 13, 2020 at 4:29pm — 4 Comments

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