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Featured Blog Posts – March 2016 Archive (5)


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सॉनेट : एक प्रयास (मिथिलेश वामनकर)

क्या है जीवन, आज समझने मैं आया हूँ

कठिन समय का दर्द सदा ही पाया मैंने

बस आशा का गीत   हमेशा गाया मैंने

जब तुम बनते धूप, बना तब मैं साया हूँ

 

जन्म काल से सत्य एक जो जुड़ा हुआ है

मानव की उफ़ जात बनी ये आदत कैसी

सदा ज्ञात यह बात मगर क्यों भूले जैसी

वहीँ शून्य आकाश एक पथ मुड़ा हुआ है

 

आया है जो आज उसे निश्चित है जाना

इस माटी का मोह, रहे क्यों साँझ सकारे?

इस माटी का रूप बदल जायेगा प्यारे 

फिर भी रे इंसान…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on March 22, 2016 at 10:44pm — 31 Comments

गीत-ये प्रथम मिलन की रात

ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!

तुम भूल न जाना।

तन-यौवन-रूप सजाया ज्यों,

घर-बार सजाना।।

ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!

तुम भूल न जाना।



सुख-दुख में तुम सहभागी अब,

ये मन तुम पर अनुरागी अब।

तुमसे कुछ नही छिपाना है,

हिय का सब हाल बताना है।।

निश्छल मन में, निश्छल मन से,

अब तुम बस जाना।

ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!

तुम भूल न जाना।।



पतझड़-सा सूना जीवन था,

नीरस मेरा घर आँगन था।

अब तुम जीवन में आई हो,

सतरंगी सपने… Continue

Added by रामबली गुप्ता on March 21, 2016 at 10:57am — 11 Comments

ग़ज़ल -फिर ‘नूर’ हर्फ़ हर्फ़ वहाँ तितलियाँ रहीं.

221/2121/122/1212

.

आसानियों के साथ परेशानियाँ रहीं, 

गर रौशनी ज़रा रही, परछाइयाँ रहीं.

.

क़दमों तले रहा कोई तपता सा रेगज़ार, 

यादों में भीगती हुई पुरवाइयाँ रहीं.

.

नाकामियों में कुछ तो रहा दोष वक़्त का,  

ज़्यादा कुसूरवार  तो ख़ुद्दारियाँ रहीं.

.

ऐसा नहीं कि तेरे बिना थम गया सफ़र

हाँ! ज़िन्दगी की राह में तन्हाइयाँ रहीं.

.

क़िरदार.. कुछ कहानी के, कमज़ोर पड़ गए

कुछ लिखने वाले शख्स की कमज़ोरियाँ रहीं.

.

मिलते…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on March 18, 2016 at 9:08pm — 19 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
खुला आकाश तेरा है ..... (विश्व महिला दिवस पर) //डॉ. प्राची

ये माना रात गहरी है, सुनहरा पर सवेरा है।

सलाखें तोड़ दे बुलबुल, खुला आकाश तेरा है।



तुझे जो रोकती है वो

हर इक ज़ंज़ीर झूठी है,

ज़रा झंझोड़ हर बंधन,

कहाँ तकदीर रूठी है ?

उड़ानों पर तेरा हक़ है, ये पिंजर कब बसेरा है?

सलाखें तोड़.....



ज़माने के तराजू पर

न अपने पंख अब तू तोल,

'खुले अम्बर' की परिभाषा

जो सच समझे, वही तू बोल।

ये तेरा चित्र है जिसका, तेरा दिल ही चितेरा है।

सलाखें तोड़.....



तुझे छूना है चन्दा को

तुझे… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 7, 2016 at 9:53pm — 11 Comments

ग़ज़ल...देर तक

2122      2122      2122     212

रात का सन्नाटा' मुझपे मुस्कुराया देर तक

हाथ पर उनको लिखा लिखके मिटाया देर तक



आज ऐसा क्या हुआ क्या साजिशें हैं शाम की

आरजू जिसकी नहीं वो याद आया देर तक



उल्फतें हैं हसरतें हैं और ये दीवानगी

नाम तेरा होंठ पे रख बुदबुदाया देर तक



है अज़ब मंज़र वफ़ा की रहगुज़र में आजकल

चाहतें उस शख्स की जिसने रुलाया देर तक

.

कुछ पलों की जुस्तजू वो कुछ पलों की तिश्नगी

प्यार का गमगीं तराना गुनगुनाया…
Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 7, 2016 at 9:30pm — 24 Comments

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