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Ram shiromani pathak's Blog – March 2013 Archive (12)

"ख्याली पुलाव"

चारपाई पर लेटे लेटे ,

ख्याली पुलाव पका रहा था !

सुन्दर अभिनेत्री के साथ ,

झील में नहा रहा था !!

इशारा किया पास आओ ,

इतने में शर्मा गयी!

उसकी यह चंचल अदा

मुझे और भी भा गयी…

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Added by ram shiromani pathak on March 31, 2013 at 12:37pm — 17 Comments

ललित छंद

ललित छंद (16+12मात्रायें:- छन्नपकैया की जगह "आनंद करो आनंद करो" का प्रयोग)



आनंद करो आनंद करो ,देखो होली आई !

मजे लेकर सब खा रहे है ,हलवा खीर मिठाई !!१

आनंद करो आनंद करो,इसको उसको रंगा !

झूमते हुड़दंग मचाया ,पीकर सबने भंगा !!२

आनंद करो आनंद करो,रंग भरी…

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Added by ram shiromani pathak on March 26, 2013 at 12:00pm — 3 Comments

"प्यारे बच्चे "

कपोल पुष्प 

अधर पंखुडियां

मनमोहिनी 

तोतली बोली

नटखट,चंचल

मन मोहक

खिलखिलाता 

बिगड़ता बनाता 

बच्चे प्यारे है…

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Added by ram shiromani pathak on March 22, 2013 at 5:04pm — 1 Comment

"होड़"

लूट अकूत मची सगरे अरु ,छोड़त नाहि घरै अपना !
आपस में झगड़ाइ रहे सब ,पावत कौन रहा कितना !!
खीचत छीनत मारत पीटत,धोइ रहे जइसे पिटना!
होड़ मची इक दूसर से बस ,कौन बनावत है कितना !!

राम शिरोमणि पाठक "दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on March 21, 2013 at 12:52pm — 8 Comments

"मत्तगयंद सवैया"(प्रयास )

पीर उठे नहि कष्ट घटे अरु, लागत रात बड़ी अधियारी !

आँखिन आँसु सुखाइ गया अरु, सेज जले जइसे अगियारी !!

आपन रूप बिगाड़ फिरे वह, ताकत राह खड़ी दुखियारी !

लोग कहे पगलाय गयी यह, लागत हो जइसे विधवारी!!

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक /अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on March 17, 2013 at 12:00pm — 6 Comments

मत्तगयंद सवैया(एक प्रयास )

दूर करैं सब कष्ट महा प्रभु ,जाप करो शिव शंकर नामा ! 

जो नर ध्यान धरै नित शंकर ,ते नर पावत शंकर धामा !!

ध्यान लगाय भजो नित शंकर ,लालच मोह सबै तजि कामा !

जो भ्रमता भव बंधन में तब,पावत ना वह जीव विरामा !!

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"…

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Added by ram shiromani pathak on March 12, 2013 at 12:31pm — 8 Comments

"गर्मी "

(1)तपता तन
सूरज की किरणें
लाचार जन

(2)धूप का घर
तरुवर की छाया
ठंडी बयार

(3)सभी बेकल
अनुभव करते
उष्ण कम्बल

(4)संध्या हो जाये
रजनी आगमन
सभी मगन

(५) उड़ती जाती
बंद मुठ्ठी में कैद
भाप बनती

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक /अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on March 11, 2013 at 8:45pm — 8 Comments

"महिला दिवस पर कुछ दोहे "

बॆटॊं जैसा ही मिले, इनको भी अधिकार ।
विनती है हर मात सॆ, बेटी को मत मार ॥
**************************
माता,बहना रूप में, मिलता इनका प्यार ।
बेटी मूरत प्रेम की , जानत है संसार ॥
**************************
इनको मिले समाज में, उतना ही सम्मान ।
कुल का दीपक पूत है , बेटी घर की शान ॥
***************************
बदलो अपनी सोच को,दो नवीन आकार ।
नारी कॆ कारन रहॆ , हरा-भरा परिवार ॥

राम शिरोमणि पाठक "दीपक"

मौलिक /अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on March 8, 2013 at 3:00pm — 8 Comments

"कुण्डलिया एक प्रयास "

कांपे निशाचर थर-थर-2 ,देख रूप विकराल !

उनको ऐसा लग रहा ,खड़ा सामने काल !!

खड़ा सामने काल ,सभी निशिचर घबराये!

लिये हाथ में खड्ग ,सबै चंडी दौड़ाये!!

लगे भागने दुष्ट ,मृत्यु सम्मुख जब भांपे ,

देख भयंकर रूप ,तीनो लोक फिर कांपे !!

राम शिरोमणि…

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Added by ram shiromani pathak on March 6, 2013 at 8:06pm — 3 Comments

"कुछ दोहे "

मन को ऐसा राखिये ,जैसे गंगा नीर !

निर्मल जल से जिस तरह ,रहता स्वच्छ शरीर !!

************************************************

मोल भाव ना ज्ञान का ,क्रय-विक्रय ना होय!

खर्च करो जितना इसे ,वृद्धि निरंतर होय !!

******************************************…

Continue

Added by ram shiromani pathak on March 5, 2013 at 8:30pm — 5 Comments

"प्रकृति"(दोहा )

कल -कल की ध्वनि आ रही ,सुनो मधुर संगीत !
प्रकृति बांसुरी बजती,होता यही प्रतीत !!


शीतल बयार बह रही ,तन-मन ठंडा होय !
देख भ्रमर दल पुष्प पर,ह्रदय प्रफुल्लित होय !!


तरुवर की छाया मिले ,लिये बिछौना घास !
इस प्रकृति वरदान में ,सब ले खुलकर स्वास !!


पेड़ों की रक्षा करो ,कटने ना दें आप !
सबको ,कमी से इनके ,लगे भयानक श्राप !!


राम शिरोमणि पाठक "दीपक"
मौलिक /अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on March 5, 2013 at 3:12pm — 4 Comments

"यहाँ सबकुछ बिकता है "

कलयुग है भाई ,

यहाँ सबकुछ बिकता है !

घर ,वाहन,ज़मीन को छोड़ो,

यहाँ इंसान बिकता है !!



बस खरीदने वाला चाहिए ,

यहाँ ईनाम बिकता है !

फ़कत चंद नोटों के लिए ,

यहाँ सम्मान बिकता है !!



गरीब की रोटी बिकती है ,

लाचार,नंगा भूखा बिकता है !

जिससे ढकता बदन वह ,

गरीब की वह धोती बिकती है !!



जिसके पास कुछ नहीं ,

स्वाभिमान को छोड़कर !

उस स्वाभिमानी का अब ,

ईमान बिकता है !!



राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक…

Continue

Added by ram shiromani pathak on March 3, 2013 at 11:35am — 2 Comments

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