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राजेश 'मृदु''s Blog – May 2013 Archive (4)

बस इतनी सी ख़ता हमारी

बस इतनी थी

खता हमारी

कि थोड़ा

जीना चाहा

कॉफी के

हर घूंट में हमने

कितना कुछ

पीना चाहा

मगर बेहया

इन रातों को

इतना भी

मंजूर न था

पलट हंसा

सारे प्रश्‍नों को

जब उत्‍तर कुछ

दूर ना था

और छपे तब

कितने किस्‍से

चेहरे के

अखबार में

समझ चुका था

गहन दहन ही

मिलता इस

संसार में

बस इतनी थी

ख़ता हमारी

कि…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on May 21, 2013 at 1:11pm — 7 Comments

प्रवाह

हर रात

देखता हूं

एक नदी का सपना

जो भरती है

निर्मल धार

उष्‍ण अंतस की गहराई तक

नसों में बहते लावे

जिसके घने स्‍पर्श से

जीवंत हो उठते हैं

पर आंख खुलते ही

घबरा जाता हूं

जब देखता हूं

जलती रेत पर

फड़फड़ाते अंश को

और देह भी तब

भिनभिनाने लगती है

थके डैने थाम पंछी

भी तो सुस्‍ताते नहीं

और फिर

पन्‍नों पर दिखती है

दरिया की लकीरें

सिमटी हुई

इंच दर…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on May 14, 2013 at 4:10pm — 12 Comments

ये सच है मां

मेरे हित

सच है मां तुमने

केवल जन्‍नत

मांगी थी

सच कहना पर

कब बहना हित

कोई मन्‍नत

मांगी थी ?

सदा-सर्वदा

तेरा पूजन

रहा पिता या

मेरे नाम

बहना का पर

रहा हमेशा

एक वहीं

सबका श्रीराम

सच कहना

कब उसकी खातिर

कितनी चौखट

लांघी थी

सदा सर्वदा

मेरी खातिर

दुआ नहीं क्‍या

मांगी थी ?

और सास बन

तुमने ही…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on May 13, 2013 at 5:21pm — 12 Comments

तेरे बाद

तुमने जो भी बात कही थी

सबको माना तेरे बाद

हो गई अपनी पीर पराई

हँस के जाना, तेरे बाद

बोझिल राते खुल के बोलीं

दिन बतियाया तेरे बाद

तेरे रहते था मैं बूढ़ा

खिली जवानी तेरे बाद

तुझे देख जो बादल गरजे

जमकर बरसे तेरे बाद

हो गई सारी दरिया खारी

रो-रो जाना, तेरे बाद

तेरे रहते दर-दर भटका

मंजिल पाई तेरे बाद

हाथों की वो चंद लकीरें

बनीं मुकद्दर तेरे बाद

यह भी तेरी…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on May 2, 2013 at 4:46pm — 15 Comments

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