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SANDEEP KUMAR PATEL's Blog – May 2013 Archive (7)

दोहा-रोला गीत ==ग्रीष्म==

========ग्रीष्म=========

सूर्य गरजता गगन से, गिरा गर्म अंगार

धधके धूं धूं कर धरा, सूखी सरिता धार  

 

मचले मनु मन मार, मगर मिलता क्या पानी

ठूंठ ठूंठ हर ठौर, ग्रीष्म की गज़ब कहानी

उड़ा उड़ा के धूल, लपट लू आंधी चलती

बंजर होते खेत, आह आँखें है भरती

 

रिक्त हुए अब कूप भी, ताल गए सब हार

सूर्य गरजता गगन से, गिरा गर्म अंगार

 

पेड़ पौध परजीव , पथिक पक्षी पशु प्यासे

मृग मरीचिका देख, मचल पड़ते मनु…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 31, 2013 at 7:30pm — 19 Comments

शार्दूलविक्रीडित छंद

शार्दूलविक्रीडित छंद

इस छन्द में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में १९ वर्ण होते हैं। १२ वर्णों के बाद तथा चरणान्त में यति होती है। गणों का क्रम इस प्रकार है - गुरु-गुरु-गुरु (मगण ), लघु-लघु-गुरु (सगण ), लघु-गुरु-लघु (जगण), लघु-लघु-गुरु (सगण ) गुरु-गुरु-लघु (तगण ), गुरु-गुरु-लघु (तगण ), गुरु |

 

माँ विद्या वर दायिनी भगवती, तू बुद्धि का दान दे |

माँ अज्ञान मिटा हरो तिमिर को, दो ज्ञान हे शारदे ||

हे माँ पुस्तक धारिणी जगत में, विज्ञान विस्तार दे…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 29, 2013 at 7:26pm — 10 Comments

सब्ज़ दिल

प्रेम के विशाल बटवृक्ष 

जिसमें भावनाओं की गहरी 

जड़ें और यकीन की 

मजबूत साखें

उसमें झूमता है 

इठलाता है 

सब्ज़ दिल 



रिवाजों और रस्मों की 

तेज आँधियाँ भी 

बेअसर होती हैं इस 

विशाल वृक्ष के आगे

जब यकीन के मजबूत तने में 

तना होता है…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 29, 2013 at 12:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल "बह रही गंगा अजल से पापियों के वास्ते"

हो गये सब सर कलम कुछ रोटियों के वास्ते 

जैसे उगते हों शज़र बस आरियों के वास्ते 



दौरे वहशत पूछिए मत, बढ़ रही कैसी हवस 

है परेशां बाप अपनी बच्चियों के वास्ते 



कुछ निवाले छीन लेते हैं गरीबों से भले 

रोज़ दाना लाएं साहब मछलियों के वास्ते 

देश के रक्षक उगाते बेच कर ईमान अब 

नोट की फसलें सियासी इल्लियों के वास्ते 



दौर है रफ़्तार का, फुर्सत नहीं खुद के लिए 

व्यस्त हैं सब कागज़ी कुछ चिन्दियों के…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 19, 2013 at 11:18am — 33 Comments

ग़ज़ल "आदमीयत हो गयी है बेअसर हम क्या कहें"

पश्चिमी तूफां से हैं सब दर-ब-दर हम क्या कहें 

आदमीयत हो गयी है बेअसर हम क्या कहें

 

दौर धोखों और फरेबों का चला है इस कदर 

रहजनी अब कर रहे हैं राहबर हम क्या कहें

 

सच बयानी आजकल घाटे का सौदा हो गया 

झूठ कहना हो गया है अब हुनर हम क्या कहें

 

जिंदगी सब जी रहे हैं जिंदगी की खोज में 

है यहाँ पर कौन किसका हमसफ़र हम क्या कहें



लूटते शैतान इज़्ज़त चीखती हैं बच्चियां  

पत्थरों का शहर है, पत्थर बशर हम क्या…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 15, 2013 at 4:12pm — 6 Comments

ग़ज़ल "दरमियाने इश्क जब दुश्वारियां आने लगीं"

 

दरमियाने इश्क जब दुश्वारियां आने लगीं

एक दूजे में नज़र सौ खामियाँ आने लगीं



मैं ये सोचे हूँ कि कोई याद मुझको भी करे  

तुम परेशां हो कि फिर से हिचकियाँ आने लगीं

 

माँ का दामन है या है मेरा बिछौना मखमली

गोद में जाते ही मीठी झपकियाँ आने लगी

 

हम अकेले रो रहे थे अपने दिल के जख्म पर

और हमारा साथ देने सिसकियाँ आने लगीं

 

इश्क के झोंके फरेबी खुश्बुओं से क्या मिले

“दीप” फिर नफ़रत भरी कुछ आँधियाँ आने…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 14, 2013 at 7:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल "जो पता हो गये निशाने सब "

=====ग़ज़ल======

जो पता हो गये निशाने सब

तीर आने लगे चलाने सब

आँख खोली सुबह हक़ीकत ने

ख्वाब टूटे मेरे सुहाने सब

उनकी मासूम अदा देखें जो

थाम लेते हैं दिल दीवाने सब

कितनी तारीफ मैं करूँ उनकी

कम ही लगते हैं ग़ज़लो गाने सब

उनके दीदार जब हुए जाना

क्यूँ भटकते हैं उनको पाने सब

दौरे रुखसत में दोस्त आए हैं

बस जनाज़ा मेरा उठाने सब

झूठ आया है सामने अब तो

जान पाए…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 14, 2013 at 12:07pm — 9 Comments

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