For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

July 2010 Blog Posts (89)

प्यार तो मैं भी करता हूँ ,

प्यार तो मैं भी करता हूँ ,
पर कहने से डरता हूँ ,
कारण जग विदित हैं ,
उन्हें आरक्षण जो मिला हैं
इसी से डरता हूँ ,
शादी हम से करे ,
आरक्षण का फायदा ,
कही और उठायें ,
कारण यही हैं ,
कदम उठाने से डरता हूँ,
प्यार तो मैं भी करता हूँ ,

Added by Rash Bihari Ravi on July 3, 2010 at 3:30pm — 3 Comments

मिल गये

जो थे अरसे से खामोश मेरे इन होठों को तराने मिल गये

लड़ा पत्थरों से कुछ ऐसे की हीरों के खजाने मिल गये



गया मेरी जिंदगी से, मुझे मरने के लिए छोड़ गया वो

अब भी हूँ जिंदा मस्ती मे, मुझे जीने के बहाने मिल गये



जो था मेरा अपना वो मुझसे अब नज़रें चुराने लग गया

पर इस महफ़िल मे हंसकर गले मुझसे बैगाने मिल गये



घर से मिकला था की जाऊँगा मंदिर पर अभी तो नशे मे हुँ

अगली ही गली मे मुझे ये कितने सारे मयखाने मिल गये



गया था कुछ बैगानों की महफ़िल मे कल… Continue

Added by Pallav Pancholi on July 2, 2010 at 11:46pm — 4 Comments

कवि घाघ और उनकी बहू के बीच परिसंवाद

उत्तर भारत में घाघ नामक एक बहुत प्रसिद्ध किसानी कवि हुए थे.

उनकी रचनाएँ आज भी ग्रामीणों द्वारा कही-सुनी जाती हैं.

उनकी बहू भी बहुत बुद्धिमान थीं.

नीचे की संकलित रचनाओं में उनके परिसंवाद हैं :-



1.

घाघ कहते हैं :-



पउआ पहिन के हर जोते,

सुथनी पहिन के निरावे,

कहें घाघ उ तीनों भकुआ,

सिर बोझा ले गावे.



घाघ की बहू कहती हैं :-



अहिरा हो के हर जोते,

तुरहिन हो के निरावे,

छैला होके कस न गावे,

हलुक बोझा जो… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 2, 2010 at 3:24pm — 4 Comments

सभ्यता की पहचान

दिन,प्रतिदिन,

हर एक पल,

हमारी सभ्यता और संस्कृति में

निखार आ रहा है,

हम हो गए हैं,

कितने सभ्य,

कौआ यह गीत गा रहा है.

पहले बहुत पहले,

जब हम इतने सभ्य नहीं थे,

चारों तरफ थी खुशहाली,

लोगों का मिलजुलकर,

विचरण था जारी,

जितना पाते,

प्रेम से खाते,

दोस्तों पाहुनों को खिलाते,

कभी-कभी भूखे सो जाते.

आज जब हम सभ्य हो गए हैं,

देखते नहीं,

दूसरे की रोटी,

छिनकर खा रहे हैं,

और अपनों से कहते हैं,

छिन…
Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 2, 2010 at 3:16pm — 4 Comments

पर चर्चा के आनंद

पर चर्चा के आनंद

एगो भोजपुरी साईट के स्वघोषित स्वयम्भू आ उनकर कुछ चाटुकार मित्र मंडली समय -समय पर भोजपुरी भासी लोगन के इ एहसास करावत रहेला की उ लोग के अलावे पूरा बिहार ,उत्तरप्रदेश ,झारखण्ड, के बारे में केहू सोचे वाला नइखे (पता ना सोच -सोच के का भला करले बा लोग) | समय -समय पर अपना उत्क्रिस्ट (बिखिप्त) भासा से समझावे के बेजोड़ कोशिश करे ला लोग | आ एहू बात के ख्याल रखे ला लोग की उ लोग के बराबरी केहू खाड़ा ना होखे पावस | आ आपन हर लेख के माध्यम से ई एहसाश करावे ला लोग की उ लोग जौन लिखलस उ… Continue

Added by BIJAY PATHAK on July 2, 2010 at 2:10pm — 3 Comments

वर्षा एक --रूप अनेक

जयेष्ट की गर्मी से झुलसी

धरती को

वर्षा की पहली बूंदों से

ख़ुशी मिली

मानो .....

लंका दहन के बाद

हनुमान जी कूदें हो

समुद्र में ॥



सूर्य के अंगारे झेल रही

वर्षा की पहली बूंदों से

किसानों को

ख़ुशी मिली

मानो .....

रावण -वध के बाद

रामचंद्र जानकी सहित

लौटे हो अयोध्या ॥



वर्षा की पहली बूंदें

धरती पर जैसे गिरी

माँ ने .....

गाय के गोबर से बने

सारे उपले

घर के अन्दर कर ली ॥



वर्षा की… Continue

Added by baban pandey on July 2, 2010 at 8:31am — 2 Comments

मुक्तिका: ज़ख्म कुरेदेंगे.... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



ज़ख्म कुरेदेंगे....



संजीव 'सलिल'

*

*

ज़ख्म कुरेदेंगे तो पीर सघन होगी.

शोले हैं तो उनके साथ अगन होगी..



छिपे हुए को बाहर लाकर क्या होगा?

रहा छिपा तो पीछे कहीं लगन होगी..



मत उधेड़-बुन को लादो, फुर्सत ओढ़ो.

होंगे बर्तन चार अगर खन-खन होगी..



फूलों के शूलों को हँसकर सहन करो.

वरना भ्रमरों के हाथों में गन होगी..



बीत गया जो रीत गया उसको भूलो.

कब्र न खोदो, कोई याद दफन होगी..



आज हमेशा… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on July 1, 2010 at 10:48pm — 3 Comments

kirdaar

किरदार
-------
वक़्त के लम्बे सफ़र में
किरदार
यूं बदल जाते हैं
वोह, जो कल
चला करते थे
थामे अंगुली हमारी
वही आज
आगे बढ़
हमें राह
दिखाते हैं

Added by rajni chhabra on July 1, 2010 at 2:28pm — 3 Comments

गीत: आँख का पानी -संजीव 'सलिल'

गीत



संजीव 'सलिल'

*

rain%20cloud%202.gif

*

बेचते हो क्यों

कहो निज आँख का पानी?

मोल समझो

बात का यह है न बेमानी....



जानती जनता

सियासत कर रहे हो तुम.

मानती-पहचानती

छल कर रहे हो तुम.

हो तुम्हीं शासक-

प्रशासक न्याय के दाता.

आह पीड़ा दाह

बनकर पल रहे हो तुम.

खेलते हो क्यों

गँवाकर आँख का पानी?

मोल समझो

बात का यह है न बेमानी....



लाश का

व्यापार करते शर्म ना आई.

बेहतर… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on July 1, 2010 at 8:30am — 3 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
yesterday
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service