For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

विनय कुमार's Blog – August 2018 Archive (8)

नींव की ईंट--लघुकथा

"अरे लल्ला, साहब लोगन के लिए दुइ कप चाय तो बनवा दो", दशरथ ने आवाज लगाया.

"रहने दीजिये, अभी तो यहाँ खाना खाया, चाय की जरुरत नहीं है", उसने दशरथ को मना किया. तब तक बगल में बैठे मलखान ने लल्ला को आवाज़ लगायी "अरे चाय नहीं, काफ़ी बनवाओ, और हाँ कम शक्कर वाली", और उन्होंने मुस्कुराते हुए ऐसे देखा जैसे मन की बात पकड़ ली हो. उसने फिर से मना किया लेकिन तब तक लल्ला घर के अंदर घुस गया. गाँव में अभी भी काफी चहल पहल थी.

"साहब आपको १२ बजे आना था, असली मेला तो ओही समय था. कल से अखंड रामायण करवाए थे…

Continue

Added by विनय कुमार on August 18, 2018 at 10:43pm — 8 Comments

सहारा- लघुकथा

कितनी ही बार वह प्रयास कर चुका था लेकिन झोला संभालने में वह अपने आप को असमर्थ पा रहा था. अपने आप पर उसे अब क्रोध आने लगा, क्या जरुरत थी पैदल आकर सब्जी खरीदने की. स्कूटर रहता तो कम से कम उसपर इसे रख तो लेता लेकिन अब करे? सब्जियों से ठसाठस भरा झोला उठाने में उसे वैसे ही बहुत कठिनाई हो रही थी और उस पर इसकी पट्टी को आज ही टूटना था.

अब घर कैसे जाए, झख मारकर उसने घर पर बेटे को फोन लगाया. बेटा भी मैच देखने में मगन था तो उसने भी टालते हुए कहा "अरे एक रिक्शा ले लीजिये और आ जाईये", और फोन रख…

Continue

Added by विनय कुमार on August 17, 2018 at 12:30pm — 4 Comments

देश प्रेम—लघुकथा

आज फिर अब्बू सुबह सुबह शुरू हो गए थे, “तुझे फौजी ही बनना चाहिए, और कुछ नहीं”. 

दरअसल आज फिर अखबार के पहले पन्ने पर छपा था कि दहशतगर्दों से लड़ाई में कई फौजी शहीद हो गए और उनकी अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ की जाएगी.

पिछले कई दिन से वह अपने प्ले के रिहर्सल में लगा हुआ था. वर्तमान राजनीति और धर्म के घालमेल के दुष्परिणाम पर आधारित उसका प्ले, जिसे खुद उसी ने लिखा था. और अपने कुछ रंगकर्मी दोस्तों के साथ आने वाले स्वतन्त्रता दिवस पर लोगों के सामने प्रदर्शित करने की पुरजोर कोशिश…

Continue

Added by विनय कुमार on August 9, 2018 at 1:00pm — 8 Comments

रुके हुए शब्द- कहानी

ट्रेन स्टेशन छोड़ चुकी थी, रिज़र्वेशन वाले डब्बे में भी साधारण डब्बे जैसी भीड़ थी. अपना बैग कंधे पर टाँगे और छोटा ब्रीफकेस खींचते हुए शंभू डब्बे में अंदर बढ़े. लगभग हर सीट पर कई लोग बैठे हुए थे और शंभू को कहीं जगह नजर नहीं आ रही थी. जहां भी वह बैठने का प्रयत्न करते, लोग उन्हे झिड़क देते. अचानक साइड वाली एक सीट पर उनकी नजर पड़ी जहां सिर्फ एक ही व्यक्ति बैठा हुआ था. शंभू लपक कर सीट पर एक तरफ बैठ गये और अपना ब्रीफकेस उन्होने सीट के नीचे घुसा दिया. अक्सर सफर करनेवाले शंभू को इन परिस्थितियों से भी…

Continue

Added by विनय कुमार on August 8, 2018 at 2:00pm — 6 Comments

दिख रहा इंसान है- ग़ज़ल

हर तरफ बस दिख रहा इंसान है

हाँ, मगर अपनों से वो अंजान है



थे कभी रिश्ते भी नाते भी मगर

आजतो यह सिर्फ इक सामान है



जिसको कहते थे कभी काबिल सभी

सबकी नज़रों में वो अब नादान है 



जिसको सौंपी थी हिफाज़त बाग़ की

बिक रहा उसका ही अब ईमान है 



हर तरफ बैठे शिकारी घात में

चंद लम्हों का वो अब मेहमान है



था कभी गुलज़ार जो शाम-ओ-सहर 

अब वही दिखने लगा शमशान है



जिसने देखे अम्न के सपने कभी

अब उसी का टूटता अरमान है …



Continue

Added by विनय कुमार on August 4, 2018 at 6:30pm — 11 Comments

नजरे झुकाये बैठे हैं- ग़ज़ल

आप महफिल में आये बैठे हैं

फिर भी नजरें  झुकाये बैठे हैं

मसअला ये कि मेरी बात से वो

अब  तलक़  खार  खाये  बैठे हैं

मुझको तो याद भी नहीं और वो

बात  दिल  से  लगाए  बैठे  हैं

हम तो करते नहीं कभी पर्दा

वो ही चिलमन गिराए बैठे हैं

हमने हर चीज याद रक्खी है

जाने  वो  क्यूँ  भुलाए बैठे हैं

हर तरफ दौर है ठहाकों का

और वो मुंह  फुलाए  बैठे हैं

बात दर अस्ल थी बहुत छोटी

वो  बड़ी  सी …

Continue

Added by विनय कुमार on August 3, 2018 at 7:00pm — 7 Comments

रूह से भी यारी है - ग़ज़ल

जिस्म से रूह से भी यारी है

इश्क़ में इक सदी गुजारी है

उनसे मिलके भी दिल नहीं भरता

बढ़ रही फिर से बेकरारी है

उनकी बातें हैं जाम की बातें

फिर से चढ़ने लगी खुमारी है

सारी खुशियाँ उन्हें मुअस्सर हैं

सिर्फ अपनी ही गम से यारी है

उनके लब पे भी नाम हो अपना

ये  कवायद  हमारी  जारी  है

एक दिन वो मिलेंगे हमको ही

इश्क़  से  क़ायनात  हारी  है

मैं भी मिल पाऊँगा यक़ीन हुआ

उनके अपनों…

Continue

Added by विनय कुमार on August 2, 2018 at 3:00pm — 3 Comments

याद तेरी - ग़ज़ल

याद तेरी कुछ इस कदर आए
तुझसे मिलने तेरे नगर आए

तुझको देखा करें हरेक लम्हा
वक़्त ऐसे ही अब ठहर जाए

अच्छी बातें ही बचें तेरे लिए
जो बुरा दौर हो गुजर जाए

बेकरारी है तुझको पाने की
हर तरफ तू ही तू नज़र आए

तेरी खुशबू हो हर तरफ मेरे
मेरी साँसों में ये असर आए

खार चुन लेंगे तेरी राहों से
राह में तेरे बस शजर आए !!

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on August 1, 2018 at 2:00pm — 7 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
19 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
19 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
19 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
19 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
19 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
19 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
19 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
20 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
20 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
20 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश जी स्वयं के प्रचार प्रसार के लिए इस तरह के प्रायोजित कार्यक्रमों का चलन साहित्य और…"
20 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"  जी ! //हापुस लँगड़ा नीलम केसर। आम सफेदा चौसा उस पर।।//... कुछ इस तरह किया जा सकता है.…"
21 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service