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Featured Blog Posts – September 2015 Archive (4)

'मुखाग्नि'- (लघु कथा)

आज सुबह उस चाय की गुमटी पर गरमा गरम चाय पीते-पीते कुछ मुखों से शब्दों के अग्नि-बाण से निकल रहे थे।

"अरे सुना तुमने, मज़हब की बंदिशें तोड़ ग़रीब दोस्त संतोष को मुस्लिम युवक रज़्ज़ाक ने कल मुखाग्नि दी !"

यह सुनकर एक पंडित जी बड़बड़ाने लगे-

"सारा अंतिम संस्कार अपवित्र हो गया, पता नहीं आत्मा को कैसे शान्ति मिलेगी ?"

इस पर एक शिक्षित युवक बोला-

"अरे ये सब वो धर्मान्तरित मुसलमान हैं जो आज भी अपने मूल धार्मिक कर्मकांड गर्व से करते हैं।"

तभी एक दाढ़ी वाले ने दाढ़ी पर…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 21, 2015 at 9:30am — 24 Comments

अस्तित्व

छलछलाई आँखों से 

मुस्कराई आँखों से 

विदा दी देहरी ने 

चल पड़ी मैं......

छलछलाई आँखों से 

मुस्कराई आँखों से 

स्वागत किया देहरी ने 

हंस पड़ी मैं.........

रंगोली सजाने लगी 

वंदनवार लगाने लगी

सज गयी देहरी 

रम गयी मैं........

प्रीत ने बहका दिया 

मीत ने महका दिया

लहरा गया आँचल 

संवर गयी मैं........

ममता ने निखार दिया 

आँचल भी संवार…

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Added by Abha Chandra on September 9, 2015 at 4:00pm — 14 Comments

हस्ताक्षर

उकेर दिया है

समय की रेत पर

अपना हस्ताक्षर.

जानता हूँ

ख़त्म हो जाएगा

रेत के बिखराव से

मेरा वज़ूद.

संभावना यह भी

किसी संकुचन क्रियावश

घनीभूत हो रेत

प्रस्तर बन जाय .

तब देख पाओगे

खंडित होने तक

मेरा हस्ताक्षर.

कुच्छ भी तो नहीं है

अनंत.

(विजय प्रकाश)

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on September 5, 2015 at 1:30pm — 12 Comments


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ग़ज़ल - जैसे अपना बयान छोड़ गये ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212  112/22

ज़ख़्म  सूखे निशान छोड़ गये

जैसे अपना बयान छोड़ गये

 

लौट के यूँ गये मेरे दिल से

मानो ख़ाली मकान छोड़ गये

 

सारी खुश्बू हवायें ले के गईं  

ये भी सच है कि भान छोड़ गये

 

राग खुशियों के छिन्न भिन्न किये

मित्र, ग़मगीन तान छोड़ गये

 

उड़ गये जब परिंदे बाग़ों से

पीछे सब सून सान छोड़ गये 

 

हाले दिल क्या बयान कर पाते ?

हम से कुछ बे ज़ुबान छोड़ गये

 

खुद चढ़ाई चढ़े…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 3, 2015 at 10:54am — 26 Comments

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