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Abhinav Arun's Blog – November 2010 Archive (6)

ग़ज़ल:-हूरों की तस्वीरें

ग़ज़ल

होटल वाली खीरें अच्छी लगती हैं

हूरों की तस्वीरें अच्छी लगती हैं |



अपने घर के गमले सारे सूखे हैं

औरों की जागीरें अच्छी लगती हैं|



शहरों में है लिपे पुते चेहरों की भींड

गावों वाली हीरें अच्छी लगती हैं |



मुझे बनावट वाले ढेरों रिश्तों से

यादों की जंजीरें अच्छी लगती हैं |



अपनी खुशियों में अब कम खुश होते लोग

पड़ोसियों की पीरें अच्छी लगती हैं… Continue

Added by Abhinav Arun on November 30, 2010 at 3:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल:- आज़ादी की बस इतनी परिभाषा

ग़ज़ल:- आज़ादी की बस इतनी परिभाषा



पोर पोर पर प्रकृति ने फेंका पासा देख

क्यों उदास है तू बसंत की भाषा देख |





श्रमजीवी कलमें कहतीं रूमानी शेर

कैसी उभरी अंतस की अभिलाषा देख |





युग के विश्वामित्र ने फिर छेड़ी है रार

फिर त्रिशंकु की टूट रही है आशा देख |





ठूंठ भरी इस राह में रोड़े और छाले

इस पथ जाता कौन पथिक रुआंसा देख |





भूख ग़रीबी महंगाई और भ्रष्टाचार

आजादी की… Continue

Added by Abhinav Arun on November 15, 2010 at 3:25pm — 3 Comments

ग़ज़ल :- आग पानी है



ग़ज़ल :- आग पानी है



मुफलिसी में अब कहाँ है ज़िंदगी

आग पानी है धुआं है ज़िंदगी |





गिरते पड़ते भागते फिरते सभी

यूं लगे अँधा कुआं है ज़िंदगी |





हम जड़ों से दूर गुलदस्ते में हैं

गाँव का खाली मकां है ज़िंदगी |





अब तो हर एहसास की कीमत है तय

कारोबारी हम दुकाँ है ज़िंदगी



एक फक्कड़ की मलंगी देखकर

हमने जाना की कहाँ है ज़िंदगी |





हर… Continue

Added by Abhinav Arun on November 15, 2010 at 2:57pm — 4 Comments

ग़ज़ल- स्कूल की घंटी

ग़ज़ल

ज़मीर इसका कभी का मर गया है

न जाने कौन है किसपर गया है |



दीवारें घर के भीतर बन गयीं हैं

सियासतदाँ सियासत कर गया है |



तरक्की का नया नारा न दो अब

खिलौनों से मेरा मन भर गया है |



कोई स्कूल की घंटी बजा दे

ये बच्चा बंदिशों से डर गया है |



बहुत है क्रूर अपसंस्कृति का रावण

हमारे मन की सीता हर गया है |



शहर से आयी है बेटे की चिट्ठी

कलेजा माँ का फिर… Continue

Added by Abhinav Arun on November 12, 2010 at 10:43pm — 10 Comments

ग़ज़ल-पुराने दौर का कुर्ता

ग़ज़ल



किताबें मानता हूँ रट गया है

वो बच्चा ज़िंदगी से कट गया है|



है दहशत मुद्दतों से हमपर तारी

तमाशे को दिखाकर नट गया है |



धुंधलके में चला बाज़ार को मैं

फटा एक नोट मेरा सट गया है |



चलन उपहार का बढ़ना है अच्छा

मगर जो स्नेह था वो घट गया है |



पुराने दौर का कुर्ता है मेरा

मेरा कद छोटा उसमे अट गया है |



राजनीति में सेवा सादगी का

फलसफा रास्ते से हट… Continue

Added by Abhinav Arun on November 12, 2010 at 10:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल :-आग नहीं कुछ पानी भी दो



ग़ज़ल



आग नहीं कुछ पानी भी दो

परियों की कहानी भी दो |



छोटे होते रिश्ते नाते

मुझको आजी नानी भी दो |



दूह रहे हो सांझ-सवेरे

गाय को भूसा सानी भी दो |



कंकड पत्थर से जलती है

धरा को चूनर धानी भी दो |



रोजी रोटी की दो शिक्षा

पर कबिरा की बानी भी दो |



हाट में बिकता प्रेम दिया है

एक मीरा दीवानी भी दो |



जाति धर्म का बंधन छोडो

कुछ रिश्ते इंसानी… Continue

Added by Abhinav Arun on November 3, 2010 at 10:00am — 8 Comments

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