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विनोद खनगवाल's Blog – November 2014 Archive (9)

पैसों की बात (लघुकथा)

आज विधानसभा में मामला बहुत गर्म हो गया था। नेता विपक्ष के तो कपड़े तक फाड़ दिए। उनको धक्का-मुक्की में दो-चार थप्पड़-लात भी जड़ दिए गए।

"नेता जी, कल हमें आपका समर्थन चाहिए।"- मंत्री जी का फोन आया।

"कैसा समर्थन! हम कोई समर्थन-वमर्थन नहीं देंगें। कपड़े फाड़ने तक तो ठीक था लेकिन हमारी पिटाई भी हुई है।"- नेता जी ने नाराज होते हुए कहा।

"आपकी नाराजगी जायज है लेकिन कल अगर आपका समर्थन ना मिला तो हम सब की तनख्वाह ना बढ़ पाएगी।"

"अच्छा, पैसों की बात है! तो ठीक है हम मान जाते हैं…

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Added by विनोद खनगवाल on November 27, 2014 at 9:30am — 19 Comments

माॅर्निंग अखबार (लघुकथा)

"अनुपमा, इस पुलिस की नौकरी की तनख्वाह से तो घर चलाना बहुत मुश्किल हो रहा है। बच्चे भी बड़े हो रहे हैं। कैसे इनको हम उच्च शिक्षा और सही परवरिश दे पाएंगे?"

"आप ठीक कह रहे हो लेकिन इसका समाधान भी तो नहीं है।"

"समाधान तो है अगर तुम साथ दो तो.....।"

"पहले बताओ तो! क्या समाधान है?"

"तुम्हें बस एक बार मंत्री जी के पास माॅर्निंग का अखबार लेकर जाना होगा। फिर मेरा ट्रांसफर ऐसी जगह हो जाएगा जहाँ तनख्वाह से कई गुना ऊपर की कमाई होगी।"

अनुपमा की माॅर्निंग अखबार की सहमति ने परिवार…

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Added by विनोद खनगवाल on November 26, 2014 at 9:39am — 16 Comments

माँ की सीख (लघुकथा)

"माँ, तुम्हें एक खुशखबरी देनी थी। तुम नानी बनने वाली हो।"- बेटी ने अपनी माँ को बताया जिसकी पिछले महीने ही शादी हुई थी।

"बेटा, तुमने यह बात किसी को बताई तो नहीं है।"

"नहीं माँ, क्या हुआ?"

"बेटा, एक बार अल्ट्रासाउंड करवा लेती तो ठीक रहता। पता लग जाता घर का चिराग है या लड़की।"

"लेकिन माँ, यह तो पहला बच्चा है। ऐसी बातें क्यों सोच रही हो?"

"तुम्हारी भाभी भी यूँ ही माॅर्डन बातें किया करती थी। अब उसको दो लड़कियाँ हैं। बेटा, घर को चिराग देने वाली औरत का मान-सम्मान अपने आप ही…

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Added by विनोद खनगवाल on November 24, 2014 at 6:01pm — 12 Comments

राजकुमार (लघुकथा)

"पापा, पढ़ने के बाद मुझे जाॅब तो मिल जाएगी ना?"
"किस मूर्ख ने कहा है तुमको नौकरी करनी है! तुमको तो राज करना है राज, मेरे राजकुमार बेटे।"- नेता जी ने अपने 12 साल के लड़के को सीने से लगा लिया।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 23, 2014 at 4:12pm — 6 Comments

बलात्कार (लघुकथा)

"सर, एक काॅलेज की लड़की से बलात्कार हुआ है उसे हॉस्पिटल में लाया गया है।"-फोन पर किसी ने पत्रकार को सूचना दी।
"चलो यार, एक लड़की से बलात्कार करना है........"
"किसी टाइम तो अपनी जुबान को लगाम लगा लिया करो।"
"हाहाहाहाहा............"- ठहाकों से प्रेस रूम गूंज उठा और सभी पत्रकार उठकर हस्पताल की तरफ चल दिए।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 22, 2014 at 10:08am — 6 Comments

पुण्य (लघुकथा)

"चाची, तुम्हारी बहू को जापे में खिलाने के लिए घी का इंतजाम नहीं हो पाया है अगर थोड़ी सी मदद कर देती तो...."
"देखो बेटा, इस महीने थोड़ा हाथ तंग है।"- चाची ने बात पूरी होने से पहले ही बहाना बना दिया।
शाम को एक थाली को ढके चाची कहीं जा रही थी। उसने पूछा-"चाची, कहाँ जा रही हो?"
"बेटा, वो अपनी गली की कुतिया ने बच्चों को जन्म दिया है। जापे वाली के लिए देसी घी का हलवा बहुत फायदेमंद होता है इसलिए उसके लिए ले जा रही हूँ। बड़ा पुण्य मिलेगा।"

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 21, 2014 at 2:37pm — 10 Comments

नया मुर्गा (लघुकथा)

"क्या बात, आज क्लास अटेंड नहीं कर रही हो?"
"नहीं यार, एक नया मुर्गा फसा है आज तो बस रेस्टोरेंट और थियेटर।"

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 20, 2014 at 6:20pm — 13 Comments

चिंता (लघुकथा)

"सुनो माँ, रवि का फोन आया था। कल मुझे लेने आ रहा है और इस बार कुछ ढंग के कपड़े ला देना। वहाँ मेरी बहुत इंसेल्ट होती है।"
'पिछली बार जिससे पैसे उधार लिए थे वो कई बार वापस माँगने आ चुकी थी। अब किससे उधार माँगेगी?'- सोचकर माँ चिंता में डूब गई।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on November 19, 2014 at 4:10pm — 10 Comments

फर्क (लघुकथा)

"रमा, सेठ रामलाल की बेटी पिछले महीने किसी के साथ भाग गई थी। कई दिन अखबारों की न्यूज भी बनी। आज उस बात को सब भूल गए हैं। रामलाल भी आराम से अपना धंधा कर रहा है और एक मेरी बेटी ने 5 साल पहले भागकर शादी की थी। आज भी लोग मेरी बेटी और मेरे परिवार को गिरी हुई नजरों से देखते हैं।"- सावित्री ने दुखी मन से कहा।

"सावित्री बहन, गरीब की बेटी और अमीर की बेटी में बहुत फर्क होता है।"- रमा ने सांत्वना देते हुए कहा।

"मौलिक और अप्रकाशित"

Added by विनोद खनगवाल on November 17, 2014 at 3:30pm — 7 Comments

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