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Umesh katara's Blog – November 2013 Archive (3)

गजल-अब मैं थक कर हार रहा हूँ--उमेश कटारा

बह्र--222 221 122



लुट लुट कर बदहाल रहा हूँ

गम के आँसू पाल रहा हूँ 



जीवन से ता उम्र लडा मैं

हथियारों को डाल रहा हूँ

किस्मत ने भी खूब नचाया

मैं पिटता सुरताल रहा हूँ



सब हमको ही बेच रहे थे

सस्ता बिकता माल रहा हँ



मकडी मरती आप उलझकर

खुदको बुनता जाल रहा हूँ



मरजाऊँ तो आँख न भरना

मैं अश्कों का ताल रहा हूँ 



कर बैठा मैं प्यार अनौखा

रो रोकर बे-हाल रहा हूँ



मौलिक व…

Continue

Added by umesh katara on November 23, 2013 at 9:30am — 12 Comments

गजल-लाश मुहब्बत की उठाता फिरता हूँ

लाश मुहब्बत की उठाता फिरता हूँ
गीत गमों के गुनगुनाता फिरता हूँ

काश के मिल जाये खुशी का पल कोई
हाथ फकीरों को दिखाता फिरता हूँ

नींद हमें आती नहीं दुनिया वालो
साथ सितारों को जगाता फिरता हूँ

हो न अँधेरा आशियाने में उनके
सोच यही खुद को जलाता फिरता हूँ

खूब किया है फैसला किस्मत तूने
जख्म भरे दिल को छुपाता फिरता हूँ

उमेश कटारा
मौलिक एंव अप्रकाशित



Added by umesh katara on November 16, 2013 at 8:55am — 17 Comments

सवाल --गजल --उमेश कटारा

2122 2121 222

आप तो सचमुच कमाल करते हो
बेवफा होकर सवाल करते हो

जंग में तो हार जीत जायज है 
हारने का क्यों मलाल करते हो

क्या हुआ जो बेवफा मुहब्बत थी
मुद्दतों से ही बवाल करते हो

.

पत्थरों के शह्र में बसर है तो
क्यों बिखरने का ख़याल करते हो

.

आदमी तो मर गया कभी से था

आत्मा को भी हलाल करते हो

उमेश कटारा

मौलिक एंव अप्रकाशित रचना

Added by umesh katara on November 8, 2013 at 7:00pm — 18 Comments

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