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Ajay sharma's Blog (71)

सबसे मिलना तो इक बहाना है

सबसे मिलना तो इक बहाना है

कौन अपना है अजमाना है 



मै कोई ख्वाब आँखों में सजाता ही नहीं

इल्म होता जो बिखर जाना है



बड़े जतन से रक्खा था सहेजा था जिसे 

सब्र का लुट रहा वही खज़ाना है



है मिरी हिम्मत पत्थर या संगेदिल तू

ये वक्त तुझको भी अजमाना है


ग़मों की दरिया को ग़र है ऐतबार मुझपे

तो फ़र्ज़ मुझको भी समंदर का निभाना है



झूंठ है की मै तेरा कुछ भी नहीं मगर

रिश्ता खुद से…
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Added by ajay sharma on November 3, 2012 at 11:00pm — 3 Comments

जो बाँतें चेनो ओ अमन की करते हैं

जो बाँतें चेनो ओ अमन की करते हैं 
खुद तैयारी कफन की करते हैं 
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फूल का कारोबार है उनका 
जो बुराई चमन की करते  हैं 
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लोग कहते हैं सिरफिरा उनको 
जो बाँतें  ज्यादा वतन की करते हैं 
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उनकी यादें भी न रहती महफूज़  
जो हिफाज़त वतन की करते…
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Added by ajay sharma on October 12, 2012 at 5:30pm — 1 Comment

सांस के क़दमों से पूछियें .......

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कितनी ख़ास ओ आम ज़िन्दगी 

पेट  की  ग़ुलाम  ज़िन्दगी
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मिल गयी तो  सुबह हो  गयी 
खो गयी तो शाम ज़िन्दगी 
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हर गरीब अमीर के लिए 
बन गयी इक काम ज़िन्दगी
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सांस…
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Added by ajay sharma on October 12, 2012 at 5:21pm — 3 Comments

ग़ालिब भूखे पेट है तुलसी नंगी पीठ..

ना गर्मी में ताप है, ना सर्दी में शीत,

जाने कैसा दौर है, कोई नियम ना रीत |



गूंगे बहरे पा रहे अंधों से सम्मान,

ग़ालिब भूखे पेट है तुलसी नंगी पीठ |



जब पैसा साहित्य का बन जाता है धर्म, 

ग़ज़लें बर्तन मांजती पानी भरते गीत |



आंसू पीकर सो गए बच्चे सब लाचार,

हार गए फिर वायदे, गयी…
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Added by ajay sharma on October 8, 2012 at 10:00pm — 4 Comments

इतनी दूर चले जाना था इतनी पास बुलाया क्यों -----------

तुमसे सीखा हंसना मैंने आखिर मुझे रुलाया क्यों ....

इतनी दूर चले जाना था इतनी पास बुलाया क्यों ...



तेरी यादें, ख़त तेरे कुछ केवल बचा खजाने में 

नींदें, दिल का चैन , खो गया तेरे ख्वाब सजाने में

सोना था तो सो जाते तुम नाहक मुझे जगाया क्यों 

इतनी दूर चले जाना था इतनी पास बुलाया क्यों -----------



काँटों पर चलना था चलते, लेकिन तुम भी होते साथ 

जब भी ठोकर गर मैं खाता तुम दे देते अपना हाथ 

वादे ढेरों लेकिन तुमने इक भी नहीं…

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Added by ajay sharma on October 1, 2012 at 12:02pm — 2 Comments

द्रौपदी के हिय की व्यथा सुनेगा कौन यहाँ ,,,,,,,,,

छोटी छोटी बातें बने आस्था के प्रश्न जब ,

बातें बड़ी बड़ी जाने क्यों बिसा र जाते है

अन्नदाता को तो है पिलाते दूध हम किन्तु ,

नौनिहाल देश की प्यासे मर जाते है

द्रौपदी के हिय की व्यथा सुनेगा कौन यहाँ

कृष्ण की चरित्र जब सत्ता की निमित्त हों

कैसे होंगे सीमित दु:शासनों के आचरण

कुंती पुत्र जब आत्मदाह को प्रवत्त हों

कैसे राष्ट्रगान राष्ट्र चिंतन करेगा कोई

पेट को भूख को अंगारे छलते हो मित्र

कैसे होगा देश का भविष्य खुशहाल भला

सड़कों पे जब वर्त्तमान…

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Added by ajay sharma on September 30, 2012 at 11:30pm — 2 Comments

केवल शो केसों में

बदल गयी नियति दर्पण की चेहेरो को अपमान मिले है , 

निस्ठायों को वर्तमान में नित ऐसे अवसान मिले है 



शहरों को रोशन कर डाला गावों में भर कर अंधियारे 

परिवर्तन की मनमानी में पनघट लहूलूहान मिले है,



चाह कैस्तसी नागफनी के शौक़ जहाँ पलते हों केवल 

ऐसे आँगन में तुलसी को अब जीवन के वरदान मिले है ,



भाग दौड़ के इस जीवन में मतले बदल गए गज़लों के 

केवल शो केसों में…

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Added by ajay sharma on September 27, 2012 at 10:00pm — 3 Comments

शीत करे राजनीति मनरेगा है हताश ........

शहरो के बीच बीच सड़कों के आसपास |

शीत के दुर्दिन का ढो रहे संत्रास , क्या करे क्या न करे फुटपाथ ||



सूरज की आँखों में कोहरे की चुभन रही

धुप के पैरो में मेहंदी की थूपन रही

शर्माती शाम आई छल गयी बाजारों को

समझ गए रिक्शे भी भीड़ के इशारों को

बच्चो के खेल सब कमरों में गए बिखर

ठिठक गए चौराहे भी खम्भों के इधर उधर

सुलग उठे हल्के हल्के बल्बों के मन उदास



शहरो के बीच बीच सड़कों के आसपास |

शीत के दुर्दिन का…

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Added by ajay sharma on September 25, 2012 at 11:30pm — No Comments

बाबु जी निबटा रहे अपना ओवर टाईम | |

मासिक वेतन मीत है पेंसन है सम्बन्ध |

जीवन अंधी खोह है न सूरज न चंद |



इअमाई लोन का है वेतन पर राज | |

टीडीएस इस कोढ़ को बना रहा है खाज|



कन्याये है कैजुअल लड़के अर्जित आवकाश | |

इक तरसती मोह को दूजा देता त्रास | |



काम सभी छोटे बड़े जब लगते है खास |

आकस्मिक की छुटिया करती है उपहास ||



आकस्मिक , अर्जित सभी जब हो गयी उपभोग |

मना रहे है छुटिया बना बना कर रोग | |



महगाई के बोझ से बोनस गया लुकाय |

ऐसे में एस्ग्रीसिया मरहम…

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Added by ajay sharma on September 25, 2012 at 10:30pm — 1 Comment

छले गए जो अपनों से ......

जगते ही जिनको भोर मिली 

संघर्ष निशा का क्या जाने 

जो रहे समर से दूर 

मर्म इक बलिदानी का क्या जाने ...............


पर्वो में सिमट गयी यादे 

बलिदान शहीदों के सारे 

हो गए कैद किताबो में 

भारत माता के रखवारे 

जिस देश की खातिर खून दिया , वो देश नहीं अब पहचाने 

....जो रहे समर से दूर मर्म ...............



औरो की खातिर मर जाना 

जिनको केवल इक खेल लगे 

उनके ही त्याग…
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Added by ajay sharma on September 23, 2012 at 10:30pm — 9 Comments

माँ होती तो ऐसा होता

माँ होती तो ऐसा होता माँ होती तो वैसा होता



खुद खाने से पहले तुमने क्या कुछ खाया "पूछा " उसको 

जैसे बचपन में सोते थे उसकी गोद में बेफिक्री से 

कभी थकन से हारी माँ जब , तुमने कभी सुलाया उसको ?

पापा से कर चोरी जब - जब देती थी वो पैसे तुमको 

कभी लौट के उन पैसो का केवल ब्याज चुकाया होता 



माँ तुम ही हो एक सहारा तब तुम कहते अच्छा होता 

माँ होती तो ऐसा होता…

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Added by ajay sharma on September 22, 2012 at 10:30pm — 6 Comments

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