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प्रवाह, बुद्धिमत्ता और भ्रम का खेल सिद्धांत (लेख)

मनुष्य और भाषा के बीच का संबंध केवल अभिव्यक्ति का नहीं है, अगर ध्यान से सोचें तो यह एक तरह का खेल है जिसकी व्याख्या खेल सिद्धांत के आधार पर की जा सकती है। खेल सिद्धांत हमें सिखाता है कि जब दो या अधिक खिलाड़ी किसी स्थिति में निर्णय लेते हैं, तो हमेशा सत्य या सही को नहीं चुनते, बल्कि वह विकल्प चुनते हैं जिससे उन्हें सबसे अधिक लाभ दिखाई देता है। यही सिद्धांत भाषा और बुद्धिमत्ता के आकलन पर भी लागू होता है।…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 25, 2026 at 10:31pm — No Comments

हादिसाते-शायरी (नज़्म) – रवि भसीन 'शाहिद'

दावतनामा हमको आया एक मुशायरे में शिरकत का

जिस में अपनी शायरी पढ़ना बाइस था बेहद इज़्ज़त का

किया इरादा हमने उसी दिन ग़ज़लें पुरानी नहीं पढ़ेंगे

जाएंगे उस महफ़िल में तो ताज़ा सुख़न ही पेश करेंगे

नई ग़ज़ल लिखने की ठानी भूल के सारे काम थे जितने

कलम दवात रजिस्टर लेकर बैठ गए हम मतला लिखने

बैठे रहे घंटों कुर्सी पर अपना पूरा ध्यान लगाया

छत पे सैर भी की हमने और लफ़्ज़ों को भी ख़ूब घुमाया

वफ़ा मुहब्बत हिज्र इबादत मौज़ूआत कई ज़ेहन में आये

रहे मुन्तज़िर कब…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on January 25, 2026 at 12:11pm — No Comments

कुंडलिया. . .बेटी

कुंडलिया. . . . बेटी

बेटी  से  बेटा   भला, कहने   की   है   बात ।
बेटा सुख का   सारथी, सुता   सहे  आघात ।।
सुता   सहे    आघात, पराई   हरदम   रहती ।
जीवन के वह दर्द, सदा ही चुप - चुप सहती ।।
जाने   कितने  रूप,सुता   यह   ओढ़े    लेटी ।
सृष्टि  सृजन  आधार, मगर  है   मानो   बेटी ।।

सुशील सरना / 20-1-26

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on January 20, 2026 at 2:21pm — 2 Comments

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर पर

दोहा एकादश   . . . . पतंग

आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।

बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।।

बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।

आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।

कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।

डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।

नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के रंग ।

जात- पात को भूलकर, अम्बर उड़े पतंग ।।

जैसे ही आकाश में, कोई कटे पतंग ।

उसे लूटने के लिए, आते कई दबंग ।।

किसी धर्म…

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Added by Sushil Sarna on January 14, 2026 at 3:03pm — 2 Comments


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नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   

जिस-जिस की सामर्थ्य रही है

धौंस उसी की

एक सदा से

 

एक कहावत रही चलन में

भैंस उसीकी जिसकी लाठी

मनमर्जी थोपी जाती है

नहीं चली तो तोड़ें काठी

 

अहंकार मद भरे विचारों

उड़ें हवा में

वे गर्दा से ..

 

हठ में अड़ना, जबरन भिड़ना

और झूठ रच मन की करना

निर्बल अबलों या नन्हों में

नाहक वीर बने घुस लड़ना

 

मद में ऐंठे गरमी झोंकें

लफ्फाजी भी

यदा-कदा से

 

खरबूजे का मीठा बाना

चक्कू से…

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Added by Saurabh Pandey on January 13, 2026 at 11:28pm — 1 Comment

कुंडलिया. . . . .

कुंडलिया. . . .

किसने समझा आज तक, मुफलिस का संसार ।
आँखें   उसकी    वेदना, नित्य   करें    साकार ।।
नित्य  करें   साकार ,  दर्द  यह  कहा  न  जाता ।
उसे  भूख  का  दंश , सदा  ही   बड़ा   सताता ।।
पत्थर   पर  ही  पीठ , टिकाई   हरदम   इसने  ।
भूखी काली रात , भाग्य  में  लिख  दी  किसने ।।

सुशील सरना / 9-1-26

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on January 9, 2026 at 1:29pm — 2 Comments

ग़ज़ल

  

 

ग़ज़ल

2122  2122  212

 

कितने काँटे कितने कंकर हो गये

हर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये

 

रास्तों  पर  तीरगी  है आज भी

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये                                  

 

आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे

हुक्म आया घर से बेघर हो गये

 

जो गिरी तो साख गिरती ही गई

अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये

 

सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब  

यूँ  बड़े  भँवरों के लश्कर हो…

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Added by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 5:00pm — 6 Comments

दोहा पंचक. . . क्रोध

दोहा पंचक. . . . क्रोध

मानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।

सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध ।।

बड़े भयानक क्रोध के, होते हैं परिणाम ।

बदले के अंगार को, मिलता नहीं विराम ।।

हर लेता इंसान का, क्रोधी  सदा विवेक ।

मिटते  इसके ज्वाल में, रिश्ते मधुर अनेक ।

क्रोध अनल में आदमी, कर जाता वह काम ।

घातक जिसके बाद में, अक्सर हों परिणाम ।।

पर्दे पड़ते अक्ल पर, जब  आता है क्रोध ।

दावानल में क्रोध की, बस लेता प्रतिशोध…

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Added by Sushil Sarna on January 8, 2026 at 2:00pm — 4 Comments

सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

*

ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी

मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१।

*

भूले हैं सिर्फ  लोग  न  सच को निहारना

हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२।

*

आदत पड़ी हो झूठ की जब राजनीति को

दिखता है सच, जबान पे आता नहीं कभी।३।

*

बस्ती में सच की झूठ को मिलता है ठौर पर

सच को तो  झूठ  आस  भी देता नहीं कभी।४।

*

जनता को सत्य  कैसे  भला रास आएगा

सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 7, 2026 at 6:04pm — 2 Comments

सुखद एकान्त है या है अकेलापन

तारों भरी रात, फैल रही चाँदनी

इठलाता पवन, मतवाला पवन

तरू तरु के पात-पात पर

उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास

मेरा मन क्यूँ उन्मन

क्यूँ इतना उदास

 

खुशी ... पिघलती हुई मोम-सी

जाने क्यूँ उसे हमेशा

होती है जाने की जल्दी

आती है, चली जाती है

आ..ती  है 

आलोप हो जाती है

 

कोई टुकड़ा स्याह बादल का आकर

रुक गया है मेरी छत पर मानो

कैसा सिलसिला है प्रकृति का यह

दर्द की अवधि समाप्त नहीं…

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Added by vijay nikore on January 5, 2026 at 9:00am — 6 Comments


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नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ

सूर्य के दस्तक लगाना

देखना सोया हुआ है



व्यक्त होने की जगह

क्यों शब्द लुंठित

जिस समय जग

अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो

कुंद होती दिख रही हो वेग की गति

और कर्कश वक्त

केंचुल छोड़ता हो

साधना जब

शौर्य का विस्तार चाहे

उग्र का पर्याय तब

खोया हुआ है



धूप के दर्शन नहीं हैं,

धुंध है बस

व्योम के उत्साह पर

कुहरा जड़ा है

जम रहा है आँख का पानी निरंतर

काल यह संक्रांति का

औंधा पड़ा है

अब प्रतीक्षा…

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Added by Saurabh Pandey on January 1, 2026 at 12:33am — 8 Comments

न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२

****

सदा बँट के जग में जमातों में हम

रहे खून  लिखते  किताबों में हम।१।

*

हमें मौत  रचने  से  फुरसत नहीं

न शामिल हुए यूँ जनाजों में हम।२।

*

हमारे बिना यह सियासत कहाँ

जवाबों में हम हैं सवालों में हम।३।

*

किया कर्म जग  में  न ऐसा कोई

गिने जायें जिससे सबाबों में हम।४।

*

न मंजिल न मकसद न उन्वान ही

कि समझे गये हैं मिराजों…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2025 at 6:20am — 2 Comments

दोहा पंचक. . . शृंगार

 

बात हुई कुछ इस तरह,  उनसे मेरी यार ।

सिरहाने खामोशियाँ, टूटी सौ- सौ बार ।।

 

मौसम की मनुहार फिर, शीत हुई उद्दंड ।

मिलन ज्वाल के वेग में, ठिठुरन हुई प्रचंड ।

 

मौसम  आया शीत का, मचल उठे जज्बात ।

कैसे बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।

 

स्पर्शों की आँधियाँ, उस पर शीत अलाव ।

काबू में कैसे रहे, मौन मिलन का भाव ।।

 

आँखों -आँखों में हुए, मधुर मिलन संवाद ।

संवादों के फिर किए , अधरों ने अनुवाद…

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Added by Sushil Sarna on November 16, 2025 at 7:30pm — 4 Comments

देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)

पहले देवता फुसफुसाते थे

उनके अस्पष्ट स्वर कानों में नहीं, आत्मा में गूँजते थे

वहाँ से रिसकर कभी मिट्टी में

कभी चूल्हे की आँच में, कभी पीपल की छाँव में

और कभी किसी अजनबी के…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 14, 2025 at 9:11pm — 1 Comment

आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२२



कर तरक्की जो सभा में बोलता है

बाँध पाँवो को वही छिप रोकता है।।

*

देवता जिस को बनाया आदमी ने

आदमी की सोच ओछी सोचता है।।

*

हैं लगाते पार झोंके नाव जिसकी

है हवा विपरीत जग में बोलता है।।

*

जान  पायेगा  कहाँ  से  देवता को

आदमी क्या आदमी को जानता है।।

*

एक हम हैं कह रहे हैं प्यार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 11, 2025 at 1:03pm — 2 Comments

दोहा दशम्. . . निर्वाण

दोहा दशम्. . . . निर्वाण

कौन निभाता है भला, जीवन भर का साथ ।

अन्तिम घट पर छूटता, हर अपने का हाथ ।।

तन में चलती साँस का, मत करना विश्वास ।

साँसें तन की जिंदगी, तन साँसों का दास  ।।

साँसों की यह डुगडुगी, बजती है दिन-रात ।

क्या जाने कब नाद यह, दे जीवन को मात ।।

मौन देह से सूक्ष्म का, जब होता निर्वाण ।

अनुत्तरित है आज तक , कहाँ गए वह प्राण ।।

तोड़ देह प्राचीर को, सूक्ष्म चला उस पार ।

मौन देह के साथ तो, बस काँधे थे चार…

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Added by Sushil Sarna on November 5, 2025 at 9:00pm — No Comments

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२

****

तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब

भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१।

*

देवता फिर दोस्त होंगे क्यों भला

आदमी  का  आदमी से बैर जब।२।

*

दुश्मनो की क्या जरूरत है कहो

रक्त  के  रिश्ते   हुए  हैं  गैर जब।३।

*

तन विवश है मन विवश है आज भी

क्या करें  हम  मनचले  हों  पैर जब।४।

*

सोच लो कैसा  समय  तब सामने

मौत मागे  जिन्दगी  की  खैर जब।५।

*

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 4, 2025 at 10:30pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कौन क्या कहता नहीं अब कान देते // सौरभ

२१२२ २१२२ २१२२



जब जिये हम दर्द.. थपकी-तान देते

कौन क्या कहता नहीं अब कान देते 

 

आपके निर्देश हैं चर्या हमारी

इस जिये को काश कुछ पहचान देते



जो न होते राह में पत्थर बताओ

क्या कभी तुम दूब को सम्मान देते ?



बन गया जो बीच अपने हम निभा दें

क्यों खपाएँ सिर इसे उन्वान देते



दिल मिले थे, लाभ की संभावना भी,

अन्यथा हम क्यों परस्पर मान देते ?



जो थे किंकर्तव्यमूढों-से निरुत्तर

आज देखा तो मिले वे…

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Added by Saurabh Pandey on November 2, 2025 at 7:30am — 5 Comments

दोहा सप्तक. . . सागर प्रेम

दोहा सप्तक. . . सागर प्रेम

जाने कितनी वेदना, बिखरी सागर तीर ।

पीते - पीते हो गया, खारा उसका नीर ।।

लहरों से गीले सदा, रहते सागर तीर ।

बनकर कितने ही मिटे, यहाँ स्वप्न प्राचीर ।।

बनकर मिटते नित्य ही, कसमों भरे निशान ।

लहरों ने दम तोड़ते, देखे हैं अरमान ।।

दो दिल डूबे इस तरह , भूले हर तूफान ।

व्याप्त शोर में सिंधु के, प्रखर हुए अरमान ।।

खारे सागर में उठे, मीठी स्वप्न हिलोर ।

प्रेमी देखें साँझ में, अरमानों की भोर ।।

लहर - लहर…

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Added by Sushil Sarna on October 31, 2025 at 8:45pm — No Comments

कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

जोगी सी अब न शेष हैं जोगी की फितरतें

उसमें रमी हैं आज भी कामी की फितरते।१।

*

कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं

चढ़ती हैं आदमी में जो कुर्सी की फितरतें।२।

*

कहने लगे हैं चाँद को,  सूरज को पढ़ रहे

समझे नहीं हैं लोग जो धरती की फितरतें।३।

*

किस हाल में सवार हैं अब कौन क्या कहे

भयभीत नाव देख के  माझी  की फितरतें।४।

*

पूजन सफल समाज में कन्या का है तभी

उसमें समायें मान को काली की…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 23, 2025 at 7:19am — 2 Comments

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