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मुँह ज़ख्मों के शे'र सुनाकर सीता है

मुँह ज़ख्मों के शे'र सुनाकर सीता है
शाइर भी तो इक दर्जी के जैसा है[1]
.
दोस्त मुझे बस तुझसे एक शिकायत है
तू पहले से काफ़ी सिगरेट पीता है[2]
.
जिसको प्यार नहीं मिल पाया वो लड़का
ज़िंदा है पर लाश के जैसे जीता है[3]
.
उसके हाथ में मेरे प्यार की मिट्टी है
जिस मिट्टी में प्यार के बीज वो बोता है[4]
.
जिस बस्ती में प्यार से सौदा हो जाए
उस बस्ती का हर इक सिक्का खोटा है[5]
.
तुमने एक किताब कही थी पढ़ने को
उसको पढ़कर 'मीत' हमेशा रोता है[6]
.

रूपम कुमार -'मीत'

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 115

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Comment by Samar kabeer on June 2, 2020 at 3:44pm

जनाब रूपम कुमार जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

आपकी ग़ज़ल के अरकान है 5 फ़ेलुन 1 फ़ा

 
'तू पहले से ज़ियादा सिगरेट पीता है'
इन अरकान पर इस मिसरे की तक़ती'अ कर के देखें ।
किसी भी शैर या मिसरे में बदलाव कुछ टिप्पणियाँ आने के बाद किया करें ।
Comment by Rupam kumar -'मीत' on May 30, 2020 at 2:22pm
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on May 30, 2020 at 1:41pm

अज़ीज़म रूपम कुमार जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें।

मतले का ऊला मिसरा "दिल के ज़ख़्म को शे'र सुनाकर सीता है" फिट नहीं है क्योंकि ज़ख़्मों को भरा जाता है सिया नहीं जाता, अलबत्ता ज़ख्मों का मुंह सिया जाता है। इसलिए इसे ऐसे कर सकते हैं : मुँह ज़ख्मों के शैर सुनाकर सीता है। बाकी शुभ शुभ। 

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