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हर ख़ुशी का इक ज़रीआ चाहिये- ग़ज़ल

2122 2122 212

हर ख़ुशी का इक ज़रीआ चाहिए
ठीक हो वह ध्यान पूरा चाहिए।

दर्द को भी झेलता है खेल में
दिल भी होना एक बच्चा चाहिए।

जान लेना राह को हाँ ठीक है
पर इरादा भी तो पक्का चाहिये।

टूट कर शीशा  जुड़ा है क्या कभी
टूट जाए तो न रोना चाहिए।

झूठ की बुनियाद पर है जो टिका
वो महल हमको तो कचरा चाहिए।

 विष वमन कर जो हवा दूषित करे
उस जुबाँ पर ठोस ताला चाहिए।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 22, 2018 at 11:49am

आदरणीय सतविंद्र जी अच्छी ग़ज़ल कही है..लेकिन आदरणीय समर कबीर जी की बात से इत्तफ़ाक़ रखता हूँ..

Comment by राज़ नवादवी on December 21, 2018 at 11:43am

आदरणीय सतविंदर सिंह जी, आदाब. ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें. बाक़ी आदरणीय समर कबीर साहब ने अपनी बहुमूल्य प्रक्रिया दे दी है. सादर 

Comment by Samar kabeer on December 20, 2018 at 12:07pm

'मफ़हूम'--यानी,जो बात आप कहना चाहते हैं वो स्पष्ट नहीं हो रही है ।

Comment by नाथ सोनांचली on December 20, 2018 at 9:33am

आद0 सतविंदर भाई जी ग़ज़ल के बेहतरीन प्रयास के लिए बधाई। मफ़हूम मतलब अर्थ या meaning होता है मेरे समझ से। 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 20, 2018 at 6:57am

आदरणीय समर कबीर जी सादर वन्दन, मार्गदर्शन के लिए सादर आभार।

मफ़हूम का मतलब मई न समझ पाया। सादर

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 20, 2018 at 6:55am

आदरणीय छोटे लाल सिंह जी नमन सादर, हार्दिक आभार

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 20, 2018 at 6:54am

आदरणीय फूल सिंह जी सादर नमन, हौंसलाफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on December 19, 2018 at 9:03am

आदरणीय राणा जी सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई

Comment by Samar kabeer on December 17, 2018 at 9:42pm

जनाब सतविन्द्र कुमार 'राणा' जी आदाब,ग़ज़ल की कोशिश अच्छी है,लेकिन अभी समय चाहती है,बहरहाल बधाई स्वीकार करें ।

हर ख़ुशी का इक ज़रिआ चाहिए
ठीक हो यह ध्यान पूरा चाहिए'

मतले के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,दूसरी बात,ऊला मिसरे में 'ज़रिआ' ग़लत है,सहीह शब्द है "ज़रीआ" ।

' दर्द को भी झेल ले जो खेल में
दिल को होना एक बच्चा चाहिए'

इस शैर के ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है,और दूसरे मिसरे का शिल्प कमज़ोर है,इस शैर को यूँ कर सकते हैं :-

'झेल पाये दर्द को जो खेल में

दिल हमारा ऐसा होना चाहिये'

' काँच टूटा फिर जुड़ा है क्या कभी
टूटने को फिर न रोना चाहिए'

इस शैर को यूँ कर लें:-

'टूट कर शीशा जुड़ा है क्या कभी

टूट जाये तो न रोना चाहिये'

बाक़ी अशआर में मफ़हूम साफ़ नहीं है ।

Comment by PHOOL SINGH on December 17, 2018 at 2:48pm

सुंदर रचना बधाई स्वीकारे

कृपया ध्यान दे...

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