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Manan Kumar singh
  • बिहार
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Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"आदरणीय सुरेंद्र जी,शुक्रिया।"
17 hours ago
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"गुरप्रीत जी।"
17 hours ago
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"शुक्रिया जी।"
17 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"आद0 मनन कुमार सिंह जी सादर अभिवादन। अच्छी ग़ज़ल हुई है,,बधाई स्वीकार कीजिये।"
yesterday
Gurpreet Singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
Thursday
narendrasinh chauhan commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"खुब सुन्दर रचना"
Wednesday
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"जनाब समर जी,आदाब एवं शुक्रिया।"
Wednesday
babitagupta commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"उम्दा रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।"
Wednesday
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"आभार आदरणीय तेजवीर जी।"
Wednesday
Samar kabeer commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Wednesday
TEJ VEER SINGH commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)
"हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार जी।बेहतरीन गज़ल। कदम से कदम हम मिलाके चले थे पहुँचने में क्यूँ फिर जमाने लगे हैं? "
Wednesday
Manan Kumar singh posted a blog post

गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)

122 122 122 122उजाले हमें फिर लुभाने लगे हैंनया गीत हम आज गाने लगे हैं।1बढ़े जो अँधेरे, सताने लगे हैंगये वक्त फिर याद आने लगे हैं।2कदम से कदम हम मिलाके चले थेपहुँचने में क्यूँ फिर जमाने लगे हैं? 3लुटे जालिमों से,यहाँ भी ठगे हमलुटेरे मसीहा कहाने लगे हैं।4अदाओं ने मारा बहाने बनाकर,बसे जो ज़िगर खूं बहाने लगे हैं।5"मौलिक व अप्रकाशित"See More
Wednesday
Mohammed Arif commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(जब सँभलना...)
"आदरणीय मनन कुमार जी आदाब,                          ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।"
Aug 8
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post जब सँभलना.....(गजल)
"आभारी हूँ आदरणीय,पर मैं 'मनन'हूँ,;अन्य कुछ नहीं।"
Aug 7
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(जब सँभलना...)
"बहुत बहुत आभार आदरणीय रवि शुक्ला जी।आपके स्नेह से अभिभूत हूँ,सादर।"
Aug 7
Ravi Shukla commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(जब सँभलना...)
"आदरणाीय मनन जी गजल अच्छी हुई है बघाई "
Aug 6

Profile Information

Gender
Male
City State
Mumbai
Native Place
E 52 Krishna Apt , Patna
Profession
Service
About me
A poet/ Writer

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गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)

122 122 122 122

उजाले हमें फिर लुभाने लगे हैं

नया गीत हम आज गाने लगे हैं।1

बढ़े जो अँधेरे, सताने लगे हैं

गये वक्त फिर याद आने लगे हैं।2

कदम से कदम हम मिलाके चले थे

पहुँचने में क्यूँ फिर जमाने लगे हैं? 3

लुटे जालिमों से,यहाँ भी ठगे हम

लुटेरे मसीहा कहाने लगे हैं।4

अदाओं ने मारा बहाने बनाकर,

बसे जो ज़िगर खूं बहाने लगे हैं।5

"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on August 14, 2018 at 7:13pm — 11 Comments

गजल(जब सँभलना...)

2122 2122 212
जब सँभलना आदमी को आ रहा
घुट्टियों का खेल खेला जा रहा।1

पाँव भारी हो गए हैं शब्द के
अर्थ क्या से क्या निकाला जा रहा।2

क्या कुलाँचे भर सकेगा अब शशक
घाव घुटनों में मुआ चिपका रहा।3

थम गई थीं आँधियाँ दुर्द्वंद्व की
कौन जहरीली हवा भड़का रहा?4

चैन से नीरो बजाता बंसियाँ
धुन वही हर शख्स फिर-फिर गा रहा।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on August 5, 2018 at 8:03pm — 3 Comments

जब सँभलना.....(गजल)

2122   2122  212

जब सँभलना आदमी को आ रहा

घुट्टियों का खेल खेला जा रहा।1



पाँव भारी हो गए हैं शब्द के

अर्थ क्या से क्या निकाला जा रहा।2



पोथियाँ जज़्बात से घायल हुईं

जो नहीं समझा वही समझा रहा।3



क्या कुलाँचे भर सकेगा अब शशक

घुन मुआफ़िक पाँव कोई खा रहा।4



थम गई थीं आँधियाँ दुर्द्वंद्व की

कौन जहरीली हवा भड़का रहा?5



चैन से नीरो बजाता बाँसुरी

धुन वही हर शख्स फिर-फिर गा रहा।6



कोयलों की बस्तियाँ अब मौन… Continue

Posted on August 5, 2018 at 7:30pm — 8 Comments

प्रजातंत्र(लघुकथा)



'एक सेठ के पाँच पुत्र थे, दो खूब पढ़े-लिखे,एक कुछ-कुछ पढ़ा हुआ और शेष दो के लिए काला अक्षर भैंस बराबर था।सेठ के मरते समय की बात के अनुसार घर की मिल्कियत(मालिकाना हक) साल भर के लिए पाँचों भाइयों में से सर्वसम्मति से या बहुमत से चुने हुए एक भाई को सौंप दी जाती।वह घर का कामकाज देखता,अपने हिसाब से विभिन्न मदों में धन खर्च करता।कभी पहला पढ़ा-लिखा भाई मालिक होता,तो कभी दूसरा।बीच-बीच में तीसरा कम पढ़ा लिखा भी मालिक बन जाता,अन्य दो अँगूठाछाप भाइयों की मदद से।पर उसकी कुछ चल नहीं पाती।ढुलमुल रवैये…

Continue

Posted on July 8, 2018 at 8:30am — 6 Comments

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At 11:03pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
आदरणीय
श्री मनन कुमार सिंह जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन
At 8:47pm on May 24, 2015, kanta roy said…
स्वागत आपका दोस्त
At 5:20pm on April 12, 2015, Manan Kumar singh said…
आदरणीय गोपालजी, आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है।
At 8:29pm on April 7, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ0 मनन जी

आपकी मित्रता मेरा गौरव है . सादर .

 
 
 

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