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Manan Kumar singh
  • बिहार
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"बहुत बहुत आभारी हूँ,आदरणीया राजेश जी।"
52 minutes ago
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"आदरणीय सौरभ जी,आपके स्नेह से सिंचित मेरी रचना जरूर मकाम हासिल करेगी,ऐसी भावना के तहत अनवरत प्रयास जारी रहेगा,सादर।आवक दिली आभार।"
52 minutes ago
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"आपकी स्नेहपूर्ण टिप्पणी रचना की यात्रा का संबल है, आदरणीय योगराज जी।आपका हार्दिक आभार।"
54 minutes ago
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"बहुत बहुत शुक्रिया भाई लक्ष्मण जी।"
59 minutes ago
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"शुक्रिया आदरणीय आरिफ भाई।"
1 hour ago
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"हार्दिक आभार भाई महेंद्र जी।"
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"शुक्रिया आदरणीय।"
3 hours ago
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"आभार आदरणीय अफरोज साहिब। आपने गौर किया ह"
4 hours ago
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"       गजल-2 गज्ल कहना सिखा गया है मुझे शख्स कोई सुना गया है मुझे।1 मुंतजिर हूँ कि वह करे रौशन राह भटकी,दिखा गया है मुझे।2 रुख हवाओं के मोड़ता फिरा जो, वह बवंडर फँसा गया है मुझे।3 सोचता था,मिरा करीबी उसे आइना-सा दिखा गया है…"
6 hours ago
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"मेरे प्रयास की परख हेतु आपका आभार आदरणीय नीलेश जी।"
19 hours ago
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"...चेहरे को चाँद कहकर....बेजोड़...बधाई आदरणीया।"
21 hours ago
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"...अपनी महफ़िल में खुद वो बुला गया है मुझे....उम्दा,बधाइयाँ।"
21 hours ago
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"आपका शुक्रिया।"
21 hours ago
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"अभिव्यक्ति की तीव्र उत्कंठा,बधाई।"
21 hours ago
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"आदरणीय दिनेश भाई! खूबसूरत गजल के लिए बधाइयाँ। तीसरे शेर की उला में पुनरावृत्ति वाली बात आ रही है,यथा--कर के।इससे बचने की युक्ति हो,तो और बेहतर हो।"
21 hours ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
"एक बढ़िया गजल के लिए बधाइयाँ! हाँ,सातवें शेर में......किंचित 'हवाओं को' के बदले 'हवाओं का' हो।देख लीजियेगा।"
21 hours ago

Profile Information

Gender
Male
City State
Mumbai
Native Place
E 52 Krishna Apt , Patna
Profession
Service
About me
A poet/ Writer

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गजल(डरे जो बहुत....)

122 122  122  12
डरे जो बहुत,बुदबुदाने लगे
मसीहे,लगा है, ठिकाने लगे।1

तबाही का' आलम बढ़ा जा रहा
चिड़ी के भी' पर फड़फड़ाने लगे।2

नचाते रहे जो हसीं को बहुत
सलीके से' नजरें चुराने लगे।3

नहीं कुछ किया,कहते' आँखें भरीं
गये वक्त अब याद आने लगे।4

उड़ाते न तो कोई' उड़ता कहाँ?
यही कह सभी अब चिढ़ाने लगे।5
"मौलिक वअप्रकाशित"

Posted on October 15, 2018 at 9:53pm — 6 Comments

बाज़ (लघुकथा)

बाज

--

चिड़िया ने पंख फड़फड़ाये।उड़ने को उद्यत हुई।उड़ी भी,पर पंख लड़खड़ा गये।उसे सहसा एक झोंका महसूस हुआ।।वह गिरते-गिरते बची,उसमें कुछ दूर उड़ती गयी।वह एक बड़ा पंख था,जो उसे हवा दे रहा था।वह उड़ती जा रही थी।कभी-कभी उसे उस बड़े पंख का दबाव सताता।वह कसमसाती,पर और ऊपर तक उड़ने की ख्वाहिश और जमीन पर गिरने के भय में टंगी वह घुटी भी,उड़ी भी......उड़ती रही।ऊँची शीतल हवाओं का सिहरन भरा स्पर्श उसे आंनदित करता।वह उस कंटकित पंख की चुभन जनित अपने सारे दुःख-दैन्य भूलकर उड़ती रही,तबतक जबतक उसे एक ऊँचाई न मिल…

Continue

Posted on October 12, 2018 at 1:30pm — 16 Comments

गजल(उजाले..लुभाने लगे हैं)

122 122 122 122

उजाले हमें फिर लुभाने लगे हैं

नया गीत हम आज गाने लगे हैं।1

बढ़े जो अँधेरे, सताने लगे हैं

गये वक्त फिर याद आने लगे हैं।2

कदम से कदम हम मिलाके चले थे

पहुँचने में क्यूँ फिर जमाने लगे हैं? 3

लुटे जालिमों से,यहाँ भी ठगे हम

लुटेरे मसीहा कहाने लगे हैं।4

अदाओं ने मारा बहाने बनाकर,

बसे जो ज़िगर खूं बहाने लगे हैं।5

"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on August 14, 2018 at 7:13pm — 11 Comments

गजल(जब सँभलना...)

2122 2122 212
जब सँभलना आदमी को आ रहा
घुट्टियों का खेल खेला जा रहा।1

पाँव भारी हो गए हैं शब्द के
अर्थ क्या से क्या निकाला जा रहा।2

क्या कुलाँचे भर सकेगा अब शशक
घाव घुटनों में मुआ चिपका रहा।3

थम गई थीं आँधियाँ दुर्द्वंद्व की
कौन जहरीली हवा भड़का रहा?4

चैन से नीरो बजाता बंसियाँ
धुन वही हर शख्स फिर-फिर गा रहा।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on August 5, 2018 at 8:03pm — 3 Comments

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At 11:03pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
आदरणीय
श्री मनन कुमार सिंह जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन
At 8:47pm on May 24, 2015, kanta roy said…
स्वागत आपका दोस्त
At 5:20pm on April 12, 2015, Manan Kumar singh said…
आदरणीय गोपालजी, आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है।
At 8:29pm on April 7, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ0 मनन जी

आपकी मित्रता मेरा गौरव है . सादर .

 
 
 

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