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रविकर's Blog – February 2013 Archive (5)

मसले होते हिंस्र, जाय ना खटमल मसले-

मौलिक

अप्रकाशित

मसले सुलझाने चला, आतंकी घुसपैठ ।

खटमल स्लीपर सेल बना, रेकी रेका ऐंठ ।



रेकी…

Continue

Added by रविकर on February 25, 2013 at 9:14am — 10 Comments

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल"

मौलिक

अप्रकाशित

लगा ले मीडिया अटकल, बढ़े टी आर पी चैनल ।

जरा आतंक फैलाओ, दिखाओ तो तनिक छल बल ।।

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल…

Continue

Added by रविकर on February 23, 2013 at 4:19pm — 7 Comments

धीरे धीरे पढ़ें -कोई सुन ना ले

मौलिक -अप्रकाशित

सत्तावन "जो-कर" रहे, जोड़ा बावन ताश ।

महल बनाया दनादन, "सदन" दहलता ख़ास ।

सदन दहलता ख़ास, किंग को नहला पंजा।

रानी दहला जैक, कसे हर रोज शिकंजा ।

धक्का इक्का खाय, हिले नहिं पाया-पत्ता ।

खड़ा ताश का महल, शक्तिशाली कुल सत्ता ।।

Added by रविकर on February 9, 2013 at 10:40am — 11 Comments

जागे आर्यावर्त, गर्त में जाय दुश्मनी -

मौलिक-अप्रकाशित 

एकनिष्ठ हों कोशिशें, भाई-चारा शर्त |

भाग्योदय हो देश का, जागे आर्यावर्त |

जागे आर्यावर्त, गर्त में जाय दुश्मनी |

वह हिंसा-आमर्ष, ख़तम हों दुष्ट-अवगुनी |

संविधान ही धर्म, मर्ममय स्वर्ण-पृष्ठ हो |

हो चिंतन एकात्म, कोशिशें एकनिष्ठ हों ||

Added by रविकर on February 7, 2013 at 2:34pm — 5 Comments

सिद्ध होय गर स्वार्थ, दबा दे ख़बरें सच्ची -

मौलिक / अप्रकाशित

खरी-खरी खोटी-खरी, खरबर खबर खँगाल ।

फरी-फरी फ़रियाँय फिर, घरी-घरी घंटाल ।

घरी-घरी घंटाल, मीडिया माथा-पच्ची ।

सिद्ध होय गर स्वार्थ, दबा दे ख़बरें सच्ची ।

परमारथ का ढोंग, बे-हया देखे खबरी ।

करें शुद्ध व्यवसाय, आपदा क्यूँकर अखरी ??

Added by रविकर on February 4, 2013 at 1:25pm — 9 Comments

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