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SANDEEP KUMAR PATEL's Blog – March 2013 Archive (11)

दर्द चेहरे पे नहीं भूल से लाया करिए "ग़ज़ल"

===========ग़ज़ल===========

 

दर्द चेहरे पे नहीं भूल से लाया करिए

लुत्फ़ लेता है ज़माना ये छुपाया करिए

 

सच है हर बात तो फिर सामने आया करिए

आइने से यूँ निगाहें न चुराया करिए

 

हर कोई अपना नज़र तुमको भी आएगा  

चंद लम्हों को सही “मैं” तो भुलाया करिए

 

चश्म में इश्क अगर देखना हो सच्चा तो

कोई मजलूम कलेजे से लगाया करिए

 

हो बड़े गर तो गरीबों को सहारा देकर

इस अमीरी को कभी आप भुनाया…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 31, 2013 at 3:30pm — 13 Comments

सार/ललित छंद

सार/ललित छंद (16+12मात्रायें:- छन्नपकैया की जगह "आई होली छाई होली," का प्रयोग)



आई होली छाई होली, पवन चली मतवारी

रंग लगाते झूम झूम के, मस्त हुए नर नारी



आई होली छाई होली, रंग उड़े सतरंगी

भंग चढ़े है सर पे सबके, होती है हुड़दंगी



आई होली छाई होली, बुरा कोई न माने

रंगों का मौसम ये प्यारा, आता प्रीत बढ़ाने



आई होली छाई होली, भर भर के पिचकारी

कान्हा रंगों को बरसाते, भीगे राधा प्यारी



आई होली छाई होली, यौवन की ले हाला

रंग चटक… Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 21, 2013 at 12:43pm — 6 Comments

"फूल हो क्या तुम" ????

"फूल हो क्या तुम" ????

तुमसे खूबसूरत कौन होगा

क्या नाज़ुकी है

क्या तराश है

इस दुनिया मैं कोई नही

दूजा तुमसा

भँवरे तुम्हे यूँ भरमाते हैं

और तुम

इठलाने लगती हो

फूल हो क्या तुम ??

पता है

एक कोना होता है

जिस्म में

छोटा सा

जो हम सब को

सच ही बताता है

सच ही दिखाता है

रूको रूको

यूँ मत मुस्कुराओ

तुम जो सोच रही हो न !

दिल नहीं है

वो है दिमाग

जो काम नहीं करता

हाई टेक झूठ…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 16, 2013 at 12:29pm — 4 Comments

ग़ज़ल "खार दामन में रक्खे है गुलाब क्या कहिये"

 

इक ग़ज़ल पेशेखिदमत है

 

 

ये ज़माना अजल से है खराब क्या कहिये

खार दामन में रक्खे है गुलाब क्या कहिये

 

चंद खुशियाँ मिली थी इश्क में हमें लेकिन   

दर्द दिल को मिला है बेहिसाब क्या कहिये 

 

आब की जद में जब रहा वजूद कायम था

आ के बाहर खुदी मिटे हुबाब क्या कहिये

 

गर्दिशों से निकल के रौशनी में आते ही

टूट जाते हैं मेरे सारे ख्वाब क्या कहिये

 

बाद पीने के किसको होश क्या कहे न कहे

बोल…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 15, 2013 at 10:34pm — 5 Comments

गणात्मक “मनहरण घनाक्षरी “

गणात्मक “मनहरण घनाक्षरी “

(रगण जगण)x2 +रगण+लघु, (रगण जगण)x2 +रगण

(चार चरण प्रति चरण ३१ वर्ण १६,१५ पर यति)

 

आन बान शान ध्यान, में रखे उठो जवान

मान देश का घटे न, स्वाभिमान लाइए

कर्मशील धीर वीर, सत्य मार्ग में रुके न

काम क्रोध मोह त्याग, धर्म को बढाइये

भूल लोक-लाज धर्म, जो हुआ युवा अचेत

रीत प्रीत शंख फूंक, नींद से जगाइए

लाज नार की लुटे न, देवियाँ यही महान

नारियाँ पुनीत पूज्य, देश में बचाइए

 

संदीप पटेल…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 14, 2013 at 10:46pm — 1 Comment

ग़ज़ल "है ज़रा मुश्किल मगर रब राहबर मेरा भी है"

झूठ की गलियों में सच तक का सफ़र मेरा भी है

है ज़रा मुश्किल मगर रब राहबर मेरा भी है

बेबफा तुझसे बिछड़कर हाले दिल अब क्या कहें

जो उधर है हाल तेरा वो इधर मेरा भी है

मुंतज़िर होना नहीं खलता है हमको अब सनम

वक़्त का पाबंद तुझ सा मुंतजर मेरा भी है

दूध पीने की खबर पर यूँ पुजारी कह पड़े

संग में रब है मगर कुछ तो हुनर मेरा भी है

टूट कर बिखरा हुआ इक आइना इतरा रहा

शहरे बुत में हो रही हलचल असर मेरा भी…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 14, 2013 at 1:13pm — 7 Comments

ग़ज़ल "उड़ा न देना कहीं आँख से ये तू पानी"

====== ग़ज़ल========

वो दौर और था जिसमे था आबरू पानी

नहीं उबाल रहा अब के है लहू पानी

नदी में फेंक दिए हमने आज कुछ कंकर

दिखा रहा था मेरा अक्स हू-ब-हू पानी

नया है दौर हुई रस्में यहाँ भाप मगर

उड़ा न…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 13, 2013 at 3:00pm — 8 Comments

सवैया

फागुन के रंग छंदों के संग

सवैया


गोल कपोल गुलाल लगे तन सोह रही अति सुंदर चोली
केश घने घन से लगते करते अति चंचल नैन ठिठोली
रूप अनूप धरे हँसती कह कोयल सी मन मोहक बोली
रंग फुहार करे मदमस्त लगे तन मादक खेलत होली


संदीप पटेल "दीप"

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 12, 2013 at 3:30pm — 2 Comments

लिखना चाहता हूँ

लिखना चाहता हूँ



वो गाँव की अमराई

बहार आते ही जो बौराई

सरसों की अंगड़ाई

बाली बाली गदराई



पर कैसे ??

कहाँ से ले आऊँ

वो रंग भरी स्याही

स्याही…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 7, 2013 at 3:06pm — 17 Comments

ग़ज़ल "इस हुनर को देख शायर हो गया हैरान है"

=========ग़ज़ल =========



झूठ कहता बाप से माँ से हुआ अनजान है

भूल क्यूँ जाता है बेटा वो उन्ही की जान है



है दगा रग रग में जिसकी झूठ जिसकी शान है

दूर से पहचान लें वो इक सियासतदान है



मौन हर मौसम में वो रहता है गम हो या ख़ुशी

इस हुनर को देख शायर हो गया हैरान है



खूब भर लो धन घरों में याद रखना तुम मगर

आखिरी मंजिल सभी की है तो कब्रिस्तान है



हर तरफ ही लूट हत्या रेप ऐसे…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 5, 2013 at 10:42pm — 14 Comments

ग़ज़ल

===========ग़ज़ल===========



खामोश लब पलकें झुकीं हालात देखिये

इस मौन में सिमटे हुए जज्बात देखिये



हमको मिली जो इश्क की सौगात देखिए

हर सुब्ह रोशन चाँदनी है रात देखिये



इंसानियत से बढ़ के क्या मजहब हुआ कोई

फिर भी वो हमसे पूछते हैं जात देखिये



पंजा कमल हाथी हथोडा सारे हो जमा

समझा रहे हैं आपकी औकात देखिये



पल पल मे बदले रंग वो माहौल देख के

गिरगिट के जैसे हो गयी हर बात देखिए



सब “दीप” मांगे बिन मिला हमको जुगाड़…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 2, 2013 at 12:00pm — 9 Comments

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