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Mohammed Arif's Blog – March 2017 Archive (5)

हाइकु

1.प्यासा तालाब
पीपल उदास-सा
गाँव है चुप ।
2.हुक्का , खटिया
चौपाल है गायब
बीमार गाँव ।
3.दहेज प्रथा
परिवर्तित रूप
कैश का खेल ।
4.धरती छोड़
चाँद पर छलांग
पुकारे भूख ।
5.मिलन नहीं
प्यास है बरकरार
है इंतज़ार ।
6.ऐश्वर्य प्रेमी
संत उपदेशक
माया का खेल ।
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on March 18, 2017 at 7:30pm — 4 Comments

सार छंद (मात्रिक विधान-16-12/16-12 )

छन्न पकैया छन्न पकैया ,बोले मीठी बोली ।

गाँवों , बाग़ो़ं गलियों छाई , टेसू की रंगोली ।।

.

छन्न पकैया छन्न पकैया , देखो, खिलता पलाश ।

पागल मतवाले भँवरों को , कलियों की है तलाश ।।

.

छन्न पकैया छन्न पकैया , टेसू मन को भाया ।

मतवाला, दीवाना, पागल, भँवरा भी इठलाया ।।

.

छन्न पकैया छन्न पकैया , उड़ता अबीर-गुलाल ।

यारों, संगी-साथी मिलकर ,करते मस्ती धमाल ।।

.

छन्न पकैया छन्न पकैया , पलाश के हैं झूमर ।

मौसम, यौवन, कलियाँ…

Continue

Added by Mohammed Arif on March 14, 2017 at 7:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

पानी वाला बादल हो ,
नदियों में फिर हलचल हो ।
गाँवों की पनघट पे अब ,
फिर से बजती पायल हो ।
झूठे वादों से ऊपर ,
कोई तो ऐसा दल हो ।
जिसमें राहत हो सबको ,
आने वाला वो कल हो ।
सारे दुख सह जाऊँ मैं ,
सर पे माँ का आँचल हो ।
साफ़ हवा पानी पायें ,
पेड़ों वाला जंगल हो ।
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on March 12, 2017 at 1:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

थोड़ा आगे आने दो ,
मौक़ा उनको पाने दो ।


देखो, भटके फिरते हैं ,
उनको भी समझाने दो ।


कब तक सहना पाबंदी ,
दौर नया दिखलाने दो ।


सबको राहत मिल जाये ,
मौसम ऐसा आने दो ।


फिक्र करो मत दुनिया की ,
छोड़ो यारो जाने दो ।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on March 7, 2017 at 11:30am — 22 Comments

फागुनी हाइकु

1.

आया फागुन
भँवरों की गुंँजार
छाई बहार ।

.
2.

मन मयूर
पलाश हुआ मस्त
भँवरें व्यस्त ।

.
3.

रंगों की छटा
मस्ती भरी उमंग
थिरके अंग ।


4.

आम बौराए
उड़ा गुलाबी रंग
है हुड़दंग ।


5.

दिशा बेहाल
फूलों उड़ी सुगंध
बने संबंध ।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on March 1, 2017 at 7:00pm — 12 Comments

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