For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Featured Blog Posts – April 2017 Archive (12)


सदस्य टीम प्रबंधन
मैं अलमस्त फकीर ..... गीत / डॉ० प्राची

टिपर-टिपर-टिप

टिपर-टिपर-टिप

पानी की इक बूँद झूम कर

मुस्काई फिर ये बोली...

मैं अलमस्त फकीर

टिपर-टिप

मैं अलमस्त फकीर...



चंचलता जब ओस ढली तो

पत्तों नें भी जोग लिया,

उनके हिस्से जितना मद था

सब का सब ही भोग लिया,



बाँध सकी पर बूँदों को कब

कोई भी ज़ंजीर...

टिपर-टिप

मैं अलमस्त फकीर...



रिमझिम-रिमझिम जब बरसी तो

जीवन के अंकुर फूटे,

अम्बर की सौंधी पाती ने

जोड़े सब रिश्ते टूटे,



बूँदें ही…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 24, 2017 at 10:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल-नूर की- ऐसा लगता है फ़क़त ख़ार सँभाले हुए हैं,

2122/1122/1122/22

.

ऐसा लगता है फ़क़त ख़ार सँभाले हुए हैं,

शाख़ें, पतझड़ में भी क़िरदार सँभाले हुए हैं.

.

जिस्म क्या है मेरे बचपन की कोई गुल्लक है  

ज़ह’न-ओ-दिल आज भी कलदार सँभाले हुए हैं.   

.

आँधियाँ ऐसी कि सर ही न रहे शानों पर,

और हम ऐसे में दस्तार सँभाले हुए हैं.

.

वक़्त वो और था; तब जान से प्यारे थे ख़ुतूत

अब ये लगता है कि बेकार सँभाले हुए हैं.

.

टूटी कश्ती का सफ़र बीच में कुछ छोड़ गए,  

और कुछ आज भी पतवार सँभाले हुए…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on April 24, 2017 at 8:59pm — 20 Comments

ग़ज़ल...जहर से भरी वादियों में हवा है

कश्मीर के हालातों को लेकर मन की उपज
122 122 122 122
दवा काम आये न लगती दुआ है
जहर से भरी वादियों में हवा है

यहाँ आदमी मुख़्तलिफ़ है खुदी से
न मुददा है कोई न ही माज़रा है

रुको मत लहू आखरी तक निचोड़ो
अभी जिस्म में जान बाकी जरा है

कहीं उड़ न जाये वफ़ा का परिंदा
अभी और मारो अभी अधमरा है

सरे राह घर है औ धरती बिछौना
भला मुफलिसों की जरुरत भी क्या है
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 23, 2017 at 4:30pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - दुश्मनी घुट के मर न जाये कहीं - ( गिरिराज )

2122   1212   22 /112

मेरी साँसें रवाँ - दवाँ कर दे  

फिर लगे दूर आसमाँ कर दे

 

प्यासे दोनों तरफ़ हैं , खाई के

है कोई.. ? खाई जो कुआँ कर दे 

 

वो ठिकाना जहाँ उजाला हो

सब की ख़ातिर उसे अयाँ कर दे

 

दुश्मनी घुट के मर न जाये कहीं

आ मेरे सामने , बयाँ कर दे

 

ऐ ख़ुदा, क्या नहीं है बस में तिरे

हिन्दी- उर्दू को एक जाँ कर दे

 

कैसे देखूँगा मै ये जंग ए अदब

मेरी आँखे धुआँ धुआँ कर…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on April 23, 2017 at 11:11am — 23 Comments

ग़ज़ल(दिल बचाया तो तेरा जिगर जाएगा )

फाइलुन -फाइलुन-फाइलुन-फाइलुन

वक़्ते तन्हाई मेरा गुज़र जाएगा |

तू अगर साथ शब भर ठहर जाएगा |

मुझको इज़ने तबस्सुम अगऱ मिल गई

तेरा मगरूर चेहरा उतर जाएगा |

मालो दौलत नहीं सिर्फ़ आमाल हैं

हश्र में जिनको लेकर बशर जाएगा |

उसके वादों पे कोई न करना यक़ी

वो सियासी बशर है मुकर जाएगा |

देखिए तो मिलाकर किसी से नज़र

खुद बखुद ही निकल दिल से डर जाएगा |

आप खंजर का एहसान लेते है…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 22, 2017 at 12:00pm — 13 Comments

छाँव

खेतों में चलते हैं

हल जब भी

पसीना बहता है

मिट्टी में घुल मिलकर

लहराती फ़सल की देता सौगात है



धूप की तपिश

बरसात होती वरदान

थके कदमों को

बड़े वृक्ष देतें हैं छाँव



कुदरत के बिना

जीना होगा असम्भव

फिर कैसा घमण्ड

कैसा गुरुर



ज़मीन सभी की

पेड़ सभी के

छोटे बड़ों की

क्या होतीं हैं पहचान ?



ज़मीन भी यहीं

आसमान भी

फिर यह कैसी सोच

कि किसी एक को

मिल रहा सरंक्षण आसमान का



जो नहीं… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 21, 2017 at 9:02am — 8 Comments

उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)

2122, 212, 2122, 212



उससे मुझको सच मे कोई शिकायत भी नही,

हाँ मगर दिल से मिलूँ अब ये चाहत भी नही।



इस बुरुत पर ताव देने का मतलब क्या हुआ,

गर बचाई जा सके खुद की इज्जत भी नही।



अब अँधेरा है तो इसका गिला भी क्या करें,

ठीक तो अब रौशनी की तबीअत भी नही।



आती हैं आकर चली जाती हैं यूँ ही मगर,

इन घटाओं मे कोई अब इक़ामत भी नही।



जुल्म सहने का हुआ ये भी इक अन्जाम है,

अब नजर आँखों में आती बगावत भी नही।



मौलिक व…

Continue

Added by Hemant kumar on April 20, 2017 at 11:00am — 16 Comments

क़दम उठाने से पहले विचार करना था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



(आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ करें और शैर का लुत्फ़ लें)



अगर वफ़ा का चलन इख़्तियार करना था

क़दम उठाने से पहले विचार करना था



ये एक बार नहीं बार बार करना था

बग़ैर नाव के दरिया को पार करना था



हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैं

ग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना था



उठाके बोझ ज़माने का तेरी चाहत में

शऊर-ओ-फ़िक्र की सरहद को पार करना था



वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता

उसी… Continue

Added by Samar kabeer on April 20, 2017 at 12:04am — 31 Comments

ग़ज़ल -- भले मैं कभी मुस्कुराया नहीं ( दिनेश कुमार )

122--122--122--12



निगाहों से उसने पिलाया नहीं

मज़ा मुझको महफ़िल में आया नहीं



उदासी भी कब आई रुख़ पर मेरे

भले मैं कभी मुस्कुराया नहीं



बशर कौन है वो जिसे वक़्त ने

इशारों पे अपने नचाया नहीं



अभी दाद अपनी सँभाले रखो

अभी शे'र मैंने सुनाया नहीं



मैं झूठा हूँ चल ठीक है। ये बता

मुझे आइना क्यों दिखाया नहीं



दिलों के मिलन पर है सब मुनहसिर

कोई अपना कोई पराया नहीं



तू पत्थर है या एक हीरा 'दिनेश'

कोई… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 19, 2017 at 6:17pm — 9 Comments

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।

12122/12122

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
करीब मुझ को' बुला रहा था।

वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स,
मगर दिये भी जला रहा था।

वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में,
न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।

सबक़ मुहब्बत का' हम से' पढ़ कर,
हमें मुहब्बत सिखा रहा था।

बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"।
नहीं तो' ये आईना रहा था।

रोहिताश्व मिश्रा, फ़र्रुखाबाद

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by रोहिताश्व मिश्रा on April 18, 2017 at 1:30pm — 15 Comments

मेरे भीतर की कविता

मेरे भीतर की कविता

अक्सर छटपटाती है

शब्दों के अंकुर

भावों की विनीत ज़मीन पर

अंकुरित होना चाहते हैं

ना जाने क्यों वे

अर्थ नहीं उपजा पाते हैं

मेरे भीतर की कविता फिर भी

जाकर संवाद करती है

सड़क किनारे बैठे

उस मोची पर जो

फटे जूते सी रहा है

बंगले की उस मेम साहिबा पर

जो अपना बचा फास्ट फुड

डस्टबिन में फेंककर

ज़ोर से गेट बंद करके

अंदर चली जाती है

लेकिन

अनुभूतियाँ ज़ोर मारती है

पछाड़े खाकर गिर जाती है

हृदय…

Continue

Added by Mohammed Arif on April 17, 2017 at 5:30pm — 12 Comments

ओबीओ की सातवीं सालगिरह का तोहफ़ा

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

(एक शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ कर दें)





जो कहूँ जो लिखूँ ओबीओ के लिये

यूँ समर्पित रहूँ ओबीओ के लिये



माँगता हूँ यही आजकल मैं दुआ

जब तलक भी जियूँ ओबीओ के लिये…



Continue

Added by Samar kabeer on April 1, 2017 at 2:30pm — 43 Comments

Featured Monthly Archives

2025

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
3 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
6 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
9 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
12 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
yesterday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service