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Featured Blog Posts – December 2016 Archive (7)


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कोई प्रेम-कथा उतरी है (ग़ज़ल) - मिथिलेश वामनकर

2122 – 1122 – 1122  - 22

 

केश विन्यास की मुखड़े पे घटा उतरी है  

या कि आकाश से व्याकुल सी निशा उतरी है

 

इस तरह आज वो आई मेरे आलिंगन में

जैसे सपनों से कोई प्रेम-कथा उतरी है

 

ऐसे उतरो मेरे कोमल से हृदय में प्रियतम

जैसे कविता की सुहानी सी कला उतरी है

 

मेरे विश्वास के हर घाव की संबल जैसे   

तेरे नयनों से जो पीड़ा की दवा उतरी है

 

पीर ने बुद्धि को कुंदन-सा तपाया होगा

तब कहीं जाके हृदय में भी…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 26, 2016 at 8:30pm — 40 Comments

तरही ग़ज़ल

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ा



दौर-ए-जवानी के हमको रंगीन ज़माने याद आये

महफ़िल में यारों से वो साग़र टकराने याद आये



तन्हाई में भूले बिसरे सब अफ़साने याद आये

जिनमें ग़म की रातें गुज़रीं, वो मैख़ाने याद आये



दिल मुट्ठी में लेकर कोई भींच रहा यूँ लगता था

ग़म की काली रातों में जब ख़्वाब सुहाने याद आये



इक मुद्दत के बाद ख़ुशी ने दरवाज़े पर दस्तक दी

दिल घबराया और मुझे कुछ यार पुराने याद आये



सब कुछ खोकर बर्बादी के सहरा में जब… Continue

Added by Samar kabeer on December 25, 2016 at 11:00pm — 36 Comments

अक्षय गीत ....

अक्षय गीत ....

मैं हार कहूँ या जीत कहूँ ,या टूटे मन की प्रीत कहूँ

तुम ही बताओ कैसे प्रिय ,मैं कोई अक्षय गीत कहूँ

मैं पग पग  आगे  बढ़ता  हूँ

कुछ भी कहने से डरता  हूँ

पीर हृदय की कह  न  सकूं

बन दीप शलभ मैं जलता हूँ

शशांक का विरह गीत कहूँ,या रैन की निर्दयी रीत कहूँ

तुम ही बताओ  कैसे  प्रिय , मैं  कोई  अक्षय  गीत कहूँ

अतृप्त तृषा  है. घूंघट  में

अधरों की हाला प्यासी है

स्वप्न नीड़  पर  नयनों  के…

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Added by Sushil Sarna on December 22, 2016 at 6:00pm — 19 Comments

हक़ीक़त - लघुकथा

"हे परवरदिगार! ये तूने मुझे आज कैसे इम्तिहां में डाल दिया ?" उसने पीछे लेटे लगभग बेहोश, युवक को एक नजर देखते हुए हाथ इबादत के लिए उठा दिए।

...... रात का दूसरा पहर ही हुआ था जब वह सोने की कोशिश में था कि 'कोठरी' के बाहर किसी के गिरने की आवाज सुनकर उसने बाहर देखा, घुप्प अँधेरे में दीवार के सहारे बेसुध पड़ा था वह अजनबी। देखने में उसकी हालत निस्संदेह ऐसी थी कि यदि उसे कुछ क्षणों में कोई सहायता नहीं मिलती तो उसका बचना मुश्किल था। युवक की हालत देख वह उसके कपडे ढीले कर उसे कुछ आराम की स्थिति…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on December 20, 2016 at 10:30pm — 23 Comments

मुसाफ़िर थोड़े हूँ, मैं रास्ता हूँ (ग़ज़ल)

1222 1222 122



विरह की ठंड से जब काँपता हूँ।

तेरी यादों की चादर ओढ़ता हूँ।



पहुंचना ही नहीं मुझको कहीं पर

मुसाफ़िर थोड़े हूँ, मैं रास्ता हूँ।



न जाने कौन मुझको मिल गया है

कई दिन से मैं ख़ुद से लापता हूँ



बस इक उम्मीद का आलम है ये, मैं

हर आहट पर उचक कर देखता हूँ।



हुआ है ख़ाक कब का जिस्म मेरा

मैं अब तक उसमें दिल को ढूंढता हूँ।



उफनता है तेरी यादों का दरिया

मैं रफ़्ता-रफ़्ता उसमें डूबता हूँ।



(मौलिक व… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on December 7, 2016 at 5:08pm — 8 Comments

चौथा बन्दर

एक चौथा बन्दर भी है

जिसने हटवा दिए हैं हाथ

उन तीनों बन्दरों के

आँख, कान और मुँह से

अब

वो सुन सकते हैं

बोल सकते हैं

देख सकते हैं

वह सब

जो चौथा बन्दर

सुनता है

बोलता है

देखता है

साथ ही

तीनों बन्दर

लगे हैं अपने जैसे

और भी बन्दर बनाने में

जो वही सुनें

वही बोलें

वही देखें

जो चौथा बन्दर

चाहता है

और जब

कोई बन्दर

कर देता है इंकार

उन तीनों जैसा

बनने से

तो वो तीनों… Continue

Added by Mahendra Kumar on December 6, 2016 at 3:52pm — 18 Comments

सब्र है सबसे बड़ा जऱ दोस्तो(तरही ग़ज़ल)/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र :2122 2122 212

---

उसने नगमा एक गाया देर तक

ऐसे ही हमको सुनाया देर तक।



सब्र है सबसे बड़ा जर दोस्तो

आलिमों ने यह सुझाया देर तक।



इश्क है वो रास्ता जो पाक है

सोच कर मन में बिठाया देर तक।



भाग उनके ही भले सब मानते

हो बड़ों का जिनपे साया देर तक।



भूख से तड़पा बहुत है यार वो

इसलिए उसने यूँ खाया देर तक।



भूलने की सोच कर आगे बढ़ा

भूल मैं उसको न पाया देर तक।



साथ चलने की कसम खाता रहा

आस में मुझको… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 4, 2016 at 6:30am — 15 Comments

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