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Ajay sharma's Blog – December 2012 Archive (9)

चाँद सितारों से लड़ना आसान नहीं

चाँद सितारों से लड़ना आसान नहीं

क्या होगा अब हश्र कोई अनुमान नहीं

वक़्त निभाएगा अपना दायित्व "अजय "

मेरे हांथों में अब कोई सामान नहीं................

.

जो बांटा करता है सबको जीवन रस ,

पीने को बस गरल मिला केवल उसको

जो पथ पर तेरे फूलों का बना बिछौना ,

काँटों का इक सेज मिला केवल उसको

कैसी हैं हम सन्तति , हम पूत कहा के ,

बचा सके इक जननी का सममान नहीं

वक़्त निभाएगा अपना दायित्व "अजय "

मेरे हांथों में अब कोई सामान नहीं…

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Added by ajay sharma on December 31, 2012 at 12:30am — 4 Comments

तुम उजला सन्दर्भ हो , जिसका मैं हूँ वही कहानी...

मैं हूँ बंदी बिन्दु परिधि का, तुम रेखा मनमानी |

मैं ठहरा पोखर का जल, तुम हो गंगा का पानी ||

मैं जीवन की कथा-व्यथा का नीरस सा गद्यांश कोई इक |

तुम छंदों में लिखी गयी कविता का हो रूपांश कोई इक |

मैं स्वांसों का निहित स्वार्थ हूँ , तुम हो जीवन की मानी  ||

धूप छाँव में पला बढा मैं विषम्तायों का हूँ सहवासी |

तुम महलों के मध्य पली हो ऐश्वर्यों की हो अभ्यासी | 

मैं आँखों का खारा संचय , तुम हो वर्षा अभिमानी ||

विपदायों, संत्रासों से मेरा अटूट अनुबंध रहा…

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Added by ajay sharma on December 27, 2012 at 10:30pm — 4 Comments

गीत ग़ज़ल की देह तौलते ,,,,,,,,,,,,,,,,,

बदल गयी नीयति दर्पण की चेहेरो को अपमान मिले हैं !

निष्ठायों को वर्तमान में नित ऐसे अवसान मिले हैं !!

शहरों को रोशन कर डाला गावों में भर कर अंधियारे !

परिवर्तन की मनमानी में पनघट लहूलूहान मिले हैं !!

चाह कैक्टसी नागफनी के शौक़ जहाँ पलते हों केवल

ऐसे आँगन में तुलसी को जीवन के वरदान मिले हैं !!

भाग दौड़ के इस जीवन में , मतले बदल गए गज़लों के

केवल शो केसों में सजते ग़ालिब के दीवान मिले हैं !!

गीत ग़ज़ल की देह तौलते अक्सर सुनने वाले देखा !…

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Added by ajay sharma on December 24, 2012 at 11:00pm — 4 Comments

शीत के दुर्दिन का ढो रहे संत्रास , क्या करे क्या न करे फुटपाथ ||

शहरो के बीच बीच सड़कों के आसपास |

शीत के दुर्दिन का ढो रहे संत्रास , क्या करे क्या न करे फुटपाथ || 



सूरज की आँखों में कोहरे की चुभन रही 

धुप के पैरो में मेहंदी की थूपन रही 

शर्माती शाम आई छल गयी बाजारों को 

समझ गए रिक्शे भी भीड़…

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Added by ajay sharma on December 22, 2012 at 10:30pm — 3 Comments

आज मसले खत्म सारे हो गए

आज मसले खत्म सारे हो गए 
हम तुम्हारे तुम हमारे हो गए (1)
दोस्ती पे नाज़ था जिनकी हमें 
लो वही दुश्मन हमारे हो गए (2)
 
मुझको तनहा छोड़कर मझधार में 
धीरे धीरे सब किनारे हो गए  (3)
 
ले लिया जबसे  सहारा आपने मुझसे मेरा  
लग रहा हम बे-सहारे हो गए  (4)  
था यकीं इतना उन्हें मेरी वफ़ा…
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Added by ajay sharma on December 13, 2012 at 10:30pm — 5 Comments

ऐतबार नहीं है

दुश्मन न सही काबिल-ए -ऐतबार नहीं है 
कोई भी हो वतन से जिसे प्यार नहीं है 
-------------------------------------------
गैरों से भी अपनों से भी खाता है ठोकरें 
वो शख्स जिसे खुद पे अख्तियार नहीं है 
--------------------------------------------
ज़ालिम वही गुनाह जो करता नहीं कुबूल 
पाता सजा वही जो गुनाहगार…
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Added by ajay sharma on December 13, 2012 at 10:00pm — 3 Comments

जिसको भीड़ सुलभ है जितनी , उतनी ही ज्यादा तन्हाई ,,,,,,,,,,,,,

खुशियों ने ऊँचे दामों की , फिर पक्की दूकान लगायी 

इक तो गाँव अभावों का मैं , और उपर से ये मंहगाई 
 
कुछ टुकड़ों पर ही पंछी ने , सोने का पिंजड़ा स्वीकारा 
क़ैद हुआ जब संगमरमर में , भूल गया सारी अंगड़ाई 
 
एक नहीं जाने कितने ही , सिन्धु रचे मैंने पन्नों पर 
लेकिन जब जब प्यास लगी , बूँद बूँद से ठोकर…
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Added by ajay sharma on December 10, 2012 at 11:12pm — 6 Comments

घर में पलती इसी धूप के साथ पला मैं छाँव हो गया .....................

थकी हुयी शतरंज का, मैं पिटा हुआ इक दांव हो गया 

भाग्य कर्म के घमासान में मैं धरती का घाव हो गया I 
........................................................................................

बचपन में आँगन में खेली तरुडाई में मुंडेरों पे 
घर में पलती इसी धूप के साथ पला मैं छाँव हो गया 
........................................................................................
जब जब बोझ पड़ा अनचाहा जीवन…
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Added by ajay sharma on December 3, 2012 at 10:30pm — 1 Comment

पेट के कहने में फिर हम आ गए

पेट के कहने में फिर हम आ गए 

पीठ पे ढ़ोने शहर , हम आ गए 

माँ ,बहन , भाई , पिता रिश्तें सभी 

छोड़ कर गाँव का घर हम आ गए -----------------

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ऑफिस का रिक्शा पापा का और मदिर वो घंटा - घंटी 

अम्मा की हर बात रटी थी हमको बरसों पंक्ति पंक्ति …

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Added by ajay sharma on December 3, 2012 at 9:30pm — 1 Comment

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