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Sushil Sarna's Blog – December 2016 Archive (13)

ज़िन्दगी ..... (क्षणिका )


ज़िन्दगी ..... (क्षणिका )

हो गया
खामोश बशर
उलझनें
सुलझाने के
फेर में

एक
मकड़ी से
शर्मिंदा
हो गयी
ज़िन्दगी

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 30, 2016 at 2:50pm — 7 Comments

अपनों से ...

अपनों से  ... 

सपने
अक्सर
तारों की तरह
गिरकर
टूट जाते हैं

चीख उठते हैं
आँखों में
ख़ामोश आंसू
जब
अपने
अपनों से
रूठ जाते हैं

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 29, 2016 at 5:57pm — 6 Comments

कह्र....

कह्र ...

थक गयी है
लबों पे हंसी
शायद लब
आडम्बर का ये बोझ
और न सहन कर पाएंगे
संग अंधेरों के
ये भी चुप हो जाएंगे
कफ़स में कहकहों के
दर्द बेवफाई का
ये छुपा न पाएंगे
बावज़ूद
लाख कोशिशों के
ये
गुज़रे हुए
लम्हों की आतिश से
बंद पलकों से
पिघल कर
तकिये को
गीला कर जाएंगे
सहर की पहली शरर पे
रिस्ते ज़ख्मों का
कह्र लिख जाएंगे


सुशील सरना

मौलिक एवम अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on December 28, 2016 at 5:45pm — 14 Comments

अक्षय गीत ....

अक्षय गीत ....

मैं हार कहूँ या जीत कहूँ ,या टूटे मन की प्रीत कहूँ

तुम ही बताओ कैसे प्रिय ,मैं कोई अक्षय गीत कहूँ

मैं पग पग  आगे  बढ़ता  हूँ

कुछ भी कहने से डरता  हूँ

पीर हृदय की कह  न  सकूं

बन दीप शलभ मैं जलता हूँ

शशांक का विरह गीत कहूँ,या रैन की निर्दयी रीत कहूँ

तुम ही बताओ  कैसे  प्रिय , मैं  कोई  अक्षय  गीत कहूँ

अतृप्त तृषा  है. घूंघट  में

अधरों की हाला प्यासी है

स्वप्न नीड़  पर  नयनों  के…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 22, 2016 at 6:00pm — 19 Comments

उसके दरबार में ……………

उसके दरबार में ……………

पूजा कहीं दिल से की जाती है

तो कहीं भय से की जाती है

कभी मन्नत के लिए की जाती है

तो कभी जन्नत के लिए की जाती है

कारण चाहे कुछ भी हो

ये निश्चित है कि

पूजा तो बस स्वयं के लिए की जाती है

कुछ पुष्प और अगरबती के बदले

हम प्रभु से जहां के सुख मांगते हैं

अपने स्वार्थ के लिए

उसकी चौखट पे अपना सर झुकाते हैं

अपनी इच्छाओं पर

अपना अधिकार जताते हैं

इधर उधर देखकर

प्रभु के परम भक्त होने पर इतराते…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 19, 2016 at 6:31pm — 12 Comments

ज़ंग .....

ज़ंग .....

गलत है

मिथ्या है

झूठ है

कि 

उदासी

अकेलेपन की दासी है

अकेलेपन के किनारों पर

नमी का अहसास होता है

क्या अकेलापन

अंतस का

दर्द से

परिचय कराने का पर्याय है ?

जब कुछ नहीं होता

तो अकेलापन होता है

अकेलेपन में

स्व से परिचय होता है

अपने वज़ूद से

पहचान होती है

ज़िदंगी करीब आती है

अपना पराया समझाती है

अकेलेपन में

पीछे छूटे लम्हात

साथ निभाते हैं…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 17, 2016 at 4:45pm — 6 Comments

इंतज़ार ....

इंतज़ार ....

भोर की पहली किरण
सर्द हवा
आधी जागी
आधी सोयी
तू गर्म शाल में लिपटी
बालकनी के कोने में
हाथों में
कॉफी का कप लिए
यक़ीनन
मेरे आने का
इंतज़ार करती होगी
कितना
रुमानियत भरा होगा
वो मंज़र
तेरी आँखों में
मेरे आने के
इंतज़ार का

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 16, 2016 at 1:01pm — 8 Comments

बड़ी अच्छी लगती है...

बड़ी अच्छी लगती है ...

हिज़्र में

तन्हाई

बड़ी अच्छी लगती है

यादों की

परछाई

बड़ी अच्छी लगती है

कभी कभी

रुसवाई भी

बड़ी अच्छी लगती है

आँखों की

गहराई

बड़ी अच्छी लगती है

साँसों की

गरमाई

बड़ी अच्छी लगती है

हुस्न की

अंगड़ाई

बड़ी अच्छी लगती है

दिल में

दिल की

समाई

बड़ी अच्छी लगती है

मगर

हक़ीक़ी ज़िन्दगी…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 15, 2016 at 9:19pm — 6 Comments

इक लफ्ज़ मुहब्बत का ....

इक लफ्ज़ मुहब्बत का ....

लम्हों की गर्द में लिपटा
इक साया
ओस में ग़ुम होती
भीगी पगडंडी के
अनजाने मोड़ पर
खामोशियों के लबादे ओढ़े
किसी बिछुड़े साये के
इंतज़ार में
इक बुत बन गया


धुल न जाएँ
सर्दी की बारिश में
कहीं लंबी रातों के
पलकों के लिहाफ़ में
अधूरे से ख़्वाब
वो धीरे धीरे
कोहरे की लहद में
खो गया
इक लफ्ज़
मुहब्बत का
खामोश ही सो गया

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 14, 2016 at 9:03pm — 8 Comments

रेशम से रिश्ते ...

रेशम से रिश्ते ....

न हवा

न आंधी

धूप का कहर

तमतमाई वसुधा

शज़र के शीर्ष से

गिरा

बे-दम सा

एक

ज़र्द पत्ता

इतना भी

क्या अफ़सोस

बोली

नयी कोपल

दर्द पे

शज़र के



एक हल्की सी ज़ुब्मिश

शज़र बोला

बाद गुज़रने के

इतनी लंबी उम्र

अब

रिश्तों की

समझ आयी है



तू

अभी नयी है

तू

मुझे भी कहाँ जान पायी है

छोड़ के देख

मेरी उंगली को

तुझे दर्द की…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 13, 2016 at 9:06pm — 4 Comments

यादों का सफर ...

यादों का सफर ...

मैं

चलता रहा

हर उस रास्ते पर

जहां पर आज

खिजाओं के डेरे थे



मैं

चलता रहा

हर उस रास्ते पर

जहां आज

उजालों में अंधेरे थे



मैं

चलता रहा

हर उस रास्ते पर

जहां आज

सिर्फ

यादों के घेरे थे



मैं

रुक गया

चलते चलते

जहां मंज़िल ने

मुँह मोड़ा था



मैं

हंस पड़ा

उस खार की अदा पर

जिसके दर्द में

यादों के डेरे थे



मैं…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

निशानों में .....

निशानों में .....

आंखें बन्द
मुट्ठियों भिची हुई
अंतस में शोर
अपने रुद्र रूप में
तलाश
बीते लम्हों की
खो गए जो
अपने साथ लिए
जन्मों के वादे
सागर किनारे
गीली रेत पे
छूटे
गीले पाँव के
निशानों में

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 2:29pm — 8 Comments

अधूरी तिश्नगी ...

अधूरी तिश्नगी ...

कैसे भूल सकती हूँ

वो रात

वो बात

जो एक चिंगारी से

शुरू हुई थी

वो चिंगारी

मेरी रगों में

धीरे धीरे

आग बनकर फैलती गयी

और मैं

चुपचाप उस आग में

जलती रही

मैं

खामोशियों के बियाबाँ में

गूंगी बनी

अपने जज़्बातों से

तन्हा सी

गुफ़्तगू करती रही

अपने खून में

लगी आग को बुझाना

मुझे कहां आता था

निहारती रही

आसमां की तरफ़

कि शायद कोई अब्र…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 8, 2016 at 6:11pm — 12 Comments

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