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आशीष यादव's Blog – December 2019 Archive (4)

सच सच बोलो आओगी ना

सच सच बोलो आओगी ना

जब सूरज पूरब से पश्चिम

तक चल चल कर थक जाएगा

और जहाँ धरती अम्बर से

मिलती है उस तक जाएगा

चारो ओर सुनहला मौसम

और सुनहली लाली होगी

और लौटते पंछी होंगें

खेत-खेत हरियाली होगी 

 

दिन भर के सब थके थके से

अपने घर को जाते होंगे

कभी झूम कर कभी मन्द से

पवन बाग लहराते होंगे 

 

तुम भी उसी बाग के पीछे

आकर उसी आम के नीचे

झूम-झूम कर मेरे ऊपर

तुम खुद को लहराओगी ना

सच सच बोलो…

Continue

Added by आशीष यादव on December 22, 2019 at 10:30pm — 4 Comments

फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है


फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है।
तेरी यादों में गोते खा रहा हूँ
हवा हौले से छूकर जा रही है।
तेरी खुशबू में भीगा जा रहा हूँ।


लिपट कर चाँदनी मुझसे तुम्हारे
बदन का खुशनुमा एह्सास देती
कभी तन्हा अगर महसूस होता
ढलक कर गोद में एक आस देती


नहीं हो तुम मगर ये सब तुम्हारे
यहाँ होने का एक जरिया बने हैं
समा पाऊँ तेरी गहराइयों में
हवा खुशबू फ़लक दरिया बने हैं। 

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:13am — 2 Comments

तुमने उसकी याद दिला दी

जाने अनजाने में कितनी

जिसे सोचते रातें काटीं

लम्हों-लम्हों में किश्तों में

जिनको अपनी साँसें बाटीं

कभी अचानक कभी चाहकर

जिसे ख़यालों में लाता था

और महकती मुस्कानों पर

सौ-सौ बार लुटा जाता था 

उसकी बोली बोल हृदय में

तुमने जैसे आग लगा दी

तुमने उसकी याद दिला दी



अँधियारी रजनी में खिलकर

चम-चम करने लगते तारे

इक चंदा के आ जाने से

फ़ीके पड़ने लगते सारे

शीतल शांत सजीवन नभ में

रजत चाँदनी फैलाता था

तम-गम में भी…

Continue

Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:00am — 4 Comments

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम सुगंध खिलते गुलाब सी

सुन्दर कोमल मधुर ख्वाब सी

मैं मरुथल का प्यासा हरिना

ललचाती मुझको सराब* सी

तुमको पाने की चाहत में

अब तक मचल रही हैं साँसें

तुम ही कह दो तुमको अपने

प्राणों का मनमीत लिखूँ क्या

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम शीतल हो चंदन वन सी

तुम निर्मल-जल, तुम उपवन सी

तुम चंदा सी और चाँदनी-

सी तुम हो, तुम मलय-पवन सी

नयन मूँद कर तुमको देखूँ…

Continue

Added by आशीष यादव on December 15, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

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