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और तभी सुनामी आती है !



है दंभ अब किन बातों का !
आंखे फाड़े काली रातों का !


विकट जो चुप्पी छाती है,
और तभी सुनामी आती है !


बौने से जो अब पेड़ खड़े,
साधी चुप्पी से मौन धरे !
ऐसी ऊँची झपटे मन को विकल कर जाती है!
और तभी सुनामी आती है !


देख अवयव अब मिश्रण का,
जो कहीं चूक हो जाती है ...
जीवन तरंग रेडियो सी बन जाती है !


भरते थे हुंकार शक्ति का,
हाथों…
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Added by Sujit Kumar Lucky on March 18, 2011 at 9:06am — No Comments

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - छग प्रदेशाध्यक्ष का फैसला होली के बाद होगा।

पहारू - ऐसी न जाने कितनी होली बीत गई है।





2. समारू - सुरेश कलमाड़ी से सीबीआई ने दूसरी बार पूछताछ की।

पहारू - जितनी बार पूछताछ कर ले, कमाई थोड़ी न कम पड़ने वाली है।





3. समारू - पायलटों ने फर्जी मार्कशीट से नौकरी हथिया ली।

पहारू - हर जगह फर्जी ही तो छाए हुए हैं।





4. समारू - जांच के बाद ही जापानी खाद्य वस्तुएं भारत आएंगी।

पहारू - तब तो चाइना के बल्ले-बल्ले।





5.… Continue

Added by rajkumar sahu on March 17, 2011 at 10:54pm — No Comments

mausam hai aata jaata hai

इस का कब पक्का नाता है 
मौसम है,आता, जाता है
 
सपनों को समझाऊँ कैसे 
जब जी चाहे तू आता है
 
कोई नदी दीवानी होगी 
तभी समंदर अपनाता है
 
सन्नाटा चाहे दिखता हो 
एक बवंडर गहराता है
 
बच्चा जब सीधा बूढ़ा हो
खून रगों में जम जाता है
 
जिन्हें चलाना आता,उन का
खोटा सिक्का चल जाता…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 17, 2011 at 10:19pm — 1 Comment

कुछ क्षणिकाएं..

कलियाँ फूट रहीं हैं यादों की शाखों में,
कुछ ख्वाब सजे हैं इन सूनी आँखों में..

भींगी-भींगी सी शक्लों में शक्लें हैं फूलों की.
फूलों सी तितलियों या तितलियाँ फूलों सी.

न पूछो मेरी मंजिल क्या है.. अभी तो बस इरादा किया है..
न हारेंगे कभी उम्र भर, किसी और से नहीं, खुद से कहा है

ये जीवन पथ है अद्वितीय, मत 'लीक' पकड़ कर चला करो..
खुद खोजो अपनी राह नयी, खुद दीपक बनकर जला करो..

Added by Pranjal Mishra on March 17, 2011 at 9:55pm — No Comments

बहरीन में विदेशी फ़ौजी दख़ल: सऊदी/वहाबी साम्राज्यवादी महत्वकाक्षाऐं

 
फ़ेसबुक पर मेरी ६ मार्च की पोस्ट से उद्धरत:-

"राजा अब्दुल्लाह इसे आवामी जन विद्रोह को शिया विद्रोह- इरानी षडयन्त्र के नाम पर

क्रूरतापूर्वक दमन कर दे."




आज जब इस वक्त मैं यह लिख रहा हूँ, बुधवार की रात

को पर्ल चौक बहरीन पर सऊदी सैनिकों की उपस्थिती में एक नीम फ़ौजी कार्यवाही करके

वहां गत दो माह से चल रहे…
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Added by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on March 17, 2011 at 6:49pm — No Comments

इन अकेली वादियों में चले आये

इन अकेली वादियों में चले आये

(मधु गीति सं. १७१७, दि. १० मार्च, २०११)

 

इन अकेली वादियों में चले आये, भरा सुर आवादियों का छोड़ आये;

गान तुम निस्तब्धता का सुन हो पाये, तान नीरवता की तुम खोये सिहाये.…

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Added by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on March 17, 2011 at 1:06pm — 2 Comments

कुछ धुंआ धुंआ...



सूना सा है वो घर अब ..बहुत बदला हुआ ..
यादों का जमघट भी है ..कुछ..धुंआ धुंआ..
निगाहें  हर बार उस चौखट पे जा पहुँचती है....…
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Added by Lata R.Ojha on March 17, 2011 at 1:34am — 1 Comment

ग़ज़ल - उजाले कैद हैं कुछ मुट्ठियों में

OBO पर आकर बहुत अच्छा लगा. यहाँ पर एक से एक उस्ताद शायर और कवियों की रचनाएं पढ़कर आनंद आ गया.

अपनी एक नयी ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ, आप सब से मार्गदर्शन की आशा है.



अँधेरा है नुमायाँ बस्तियों में

उजाले कैद हैं कुछ मुट्ठियों में



ये पीकर तेल भी, जलते नहीं हैं…

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Added by Saahil on March 16, 2011 at 8:07pm — 11 Comments

संगदिल शहर

Added by अमि तेष on March 16, 2011 at 12:30pm — 4 Comments

व्यंग्य - महंगाई का निचोड़पन

महंगाई का सिर दर्द लोगों में खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। कोई दवा भी काम नहीं आ रही है और सरकार की अधमने उछल-कूद भी बेकार साबित हो रही है। एक समय दाल, भोजन की थाली से गायब हो गई। फिर बारी आई, प्याज की। प्याज ने तो इस तरह खून के आंसू रूलाए, जिसे न तो जनता भूल पाई है और न ही सरकार। जनता तो जैसे-तैसे प्याज के सदमे से उबर रही है, मगर सरकार, प्याज के दंभी रूख के कारण अभी भी विपक्ष के निशाने पर है। बेसुध महंगाई को चिंता ही नहीं कि सरकार से उसकी दुश्मनी, जनता पर कितनी भारी पड़ रही है ? सरकार के… Continue

Added by rajkumar sahu on March 15, 2011 at 1:52am — No Comments

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - जाटों ने ओबीसी आरक्षण के लिए आर-पार की लड़ाई शुरू कर दी है।

पहारू - आरक्षण का झमेला तो राजनीतिक पार्टियों ने वोट के लिए पाल रखी है।



2. समारू - टैक्स पर इनकम बटोरने वाला एक और नाम आया।

पहारू - जितनी कमाई, उतनी टैक्स चोरी, खुली छूट है।



3. समारू - छग विधानसभा में कांग्रेस, भाजपा सरकार को घेरने में सफल नजर आ रही है।

पहारू - इतनी एकजुटता दिखाकर चुनाव में मेहनत करते तो विपक्ष में नहीं रहते।



4. समारू - पूर्व राज्यपाल एनडी तिवारी की…

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Added by rajkumar sahu on March 15, 2011 at 12:10am — No Comments

प्रिय अभी

प्रिय अभी 

मै न चाहते हुए भी आज उन स्थानों  पर कभी-कभी पहुँच जाता हूँ,जहां कभी अपने प्रेम के बहारो के फूल खिले थे , ना जाने कितने आरजुओ ने जन्म लिए थे जब कभी मै उन जगहों पर जाता हूँ तो हमेशा मेरी नज़र उन जगहों को देखती है जहां हम साथ चले थे , मेरे होठो पर तुम्हारा नाम बरबस ही आ जता है,मेरी नज़रे शायद तुम्हारे पद चिन्हों को ठुंठती है ! पर उसे असफलता ही हाँथ लगाती…

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Added by Sanjay Rajendraprasad Yadav on March 14, 2011 at 8:05pm — 3 Comments

याद आउंगी..

                                                                               

मैं रहूँ न रहूं ,यादें मेरी रह जाएंगी..

शायद किसी की यादों में ,कभी दोहराई जाएंगी..
 जब कभी भी मौसम धुआं धुआं होगा..…
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Added by Lata R.Ojha on March 14, 2011 at 12:30pm — 3 Comments

बेटी गरीब की

बेटी गरीब की



बेटी थी वो गरीब की मजबूर थी लाचार--

थी खूबसूरत यौवना लेकिन ईमानदार --

सड़कों पे सर झुकाए वो गाँव में निकलती ---

कुछ मनचले दबंगों की नीयतें मचलती --

फिकरे कोई कसे तो वो चुपचाप ही रहती --

मक्कार दबंगों की कई हरकतें सहती --

ना बाप था ना भाई ना उसकी कोई बहिन थी --

तकदीर की मारी हुई वो नेकचलन थी --

कपडे वो नदी पर ही धोती थी नहाती थी -

शाम के ढलते ही घर लौट के आती थी --

एक शाम वो दबंगों के हाथ लग गई --

अब तक बचा रखी थी वो… Continue

Added by jagdishtapish on March 13, 2011 at 8:13pm — 1 Comment

मैं जब भी ठोकरें खाता हूँ नया मुकाम मिलता है....................

मैं जब भी ठोकरें खाता  हूँ नया मुकाम मिलता है
तजुर्बे का चहेरा बनाकर भगवान मिलता है





तसल्ली देती हैं पुरानी…
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Added by अमि तेष on March 13, 2011 at 7:30pm — 3 Comments

Gazal

                  गजल

ईमानदार मैदाॅं में, बाजी मार जाते हैं।     

बेईमानों के घोडे, आखिरी हार जाते हैं।।

परस्तिश करती है, उनकी सल्तनत दोस्तों।

वतन की राह में,जो जांॅ निसार जाते हैं।।

हथियारों पे कायम है, कायनात जिनकी।…

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Added by nemichandpuniyachandan on March 13, 2011 at 7:26pm — 1 Comment

रंग अपना अपना ..

रंग अपना अपना ..



हर आदमी में होता है, रंग अपना अपना ।

उड़ान भर रहे हैं, लेकर के अपनी कल्पना।।

पूरी हुई न अबतक, इस जिंदगी में राहें।

यदि थक गया है कोई, तो भर रहा है आहें।

कुछ और आगे चलने का, रह गया है सपना।।

हर आदमी में…

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Added by R N Tiwari on March 13, 2011 at 6:00pm — 1 Comment

ग़ज़ल :- ऐ खुदा क्योंकर तेरे सागर में सुनामी हुई

ग़ज़ल :- ऐ खुदा क्योंकर तेरे सागर में सुनामी हुई

आपदा की हद हज़ारों ज़िंदगी पानी हुई ,

ऐ खुदा क्योंकर तेरे सागर में सुनामी हुई |

 

है नहीं कूवत लखन सी दौर के इंसान में…

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Added by Abhinav Arun on March 13, 2011 at 3:30pm — 3 Comments

............त्याग बलिदान सॆ.........

............त्याग बलिदान सॆ.........

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कभी त्याग बलिदान सॆ कभी जीवन-मरण सॆ निकलती है !

कविता कलम सॆ नहीं कवि कॆ अंतःकरण सॆ निकलती है !!

कभी बिंदु मॆं समॆट लॆती चराचर संसार यह,

नयन बिन दॆख लॆती है क्षितिज कॆ पार यह,

हवाऒं का रूप धर लिपट जाती वृक्ष कॆ गलॆ,

कभी बूँद बन नीर की पुकारती रसातल तलॆ,

कभी शबनम का रूप धर, यॆ पर्यावरण सॆ निकलती है !!१!!

कविता कलम सॆ… Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 13, 2011 at 3:09pm — 3 Comments

जानॆं किससॆ मिली प्रॆरणा, और...........................

जानॆं किससॆ मिली प्रॆरणा....

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कब मैना मन मुस्कानी है, कब बॊलॆ वह कॊयल कागा !!

जानॆं किससॆ मिली प्रॆरणा, और सृजन का अंकुर जागा !!

शब्द-सुमन चुननॆं मॆं मॆरा,आधा जीवन बीता,

अखिल विश्व का चिंतन,था लगता रीता-रीता,

कभी ढूंढ़ता मॆघदूत मैं,तॊ कभी खॊजता गीता,

मीरा राधा और अहिल्या, कभी द्रॊपदी सीता,

कॆवट और भागीरथ बन कर, क्या-क्या वर मैं मांगा !!१!!

जानॆं किससॆ मिली प्रॆरणा,… Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 13, 2011 at 3:05pm — No Comments

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