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धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Blog (235)

लघुकथा : राष्ट्रीय वन निगम

(पूर्णतया काल्पनिक, वास्तविकता से समानता केवल संयोग)

बहुत समय पहले की बात है। जंगल में शेर, लोमड़ी, गधे और कुत्ते ने मिलकर एक कंपनी खोली, जिसका नाम सर्वसम्मति से ‘राष्ट्रीय वन निगम’ रखा गया । गधा दिन भर बोझ ढोता। शाम को अपनी गलतियों के लिए शेर की डाँट और सूखी घास खाकर जमीन पर सो जाता।  कुत्ता दरवाजे के बाहर दिन भर भौंक भौंक कर कंपनी की रखवाली करता और शाम को बाहर फेंकी हड्डियाँ खाकर कागजों के ढेर पर सो जाता। लोमड़ी दिन भर हिसाब किताब देखती। हिसाब में थोड़ा बहुत इधर उधर करके…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2012 at 12:13pm — 16 Comments

ग़ज़ल : बरगदों से जियादा घना कौन है?

बहर : २१२ २१२ २१२ २१२

बरगदों से जियादा घना कौन है

किंतु इनके तले उग सका कौन है

 

मीन का तड़फड़ाना सभी देखते

झील का काँपना देखता कौन है

 

घर के बदले मिले खूबसूरत मकाँ

छोड़ता फिर जहाँ में भला कौन है

 

लाख हारा हूँ तब दिल की बेगम मिली

आओ देखूँ के अब हारता कौन है

 

प्रश्न इतना हसीं हो अगर सामने

तो फिर उत्तर में नो कर सका कौन है

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 1, 2012 at 8:30pm — 13 Comments

मुक्तिका : अपनी माटी से जब कटकर जाना पड़ता है

टुकड़ों टुकड़ों में ही बँटकर जाना पड़ता है

अपनी माटी से जब कटकर जाना पड़ता है

 

परदेशों में नौकर भर बन जाने की खातिर

लाखों लोगों में से छँटकर जाना पड़ता है

 

गलती से भी इंटरव्यू में सच न कहूँ, इससे

झूठे उत्तर सारे रटकर जाना पड़ता है

 

उसकी चौखट में दरवाजा नहीं लगा लेकिन

उसके घर में सबको मिटकर जाना पड़ता है

 

आलीशान महल है यूँ तो संसद पर इसमें

इंसानों को कितना घटकर जाना पड़ता है

 

जितना कम…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 26, 2012 at 9:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल : मुझसे नज़रें न तू मिलाया कर

बहर : २१२२ १२१२ २२ [इस बहर को ११२२ १२१२ २२ भी लेने की छूट होती है]

 

मुझसे नज़रें न तू मिलाया कर

की है तौबा न यूँ पिलाया कर

 

जिस्म उरियाँ हो रूह ढँक जाए

ऐसे कपड़े न तू सिलाया कर…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 21, 2012 at 3:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल : आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है

बहर : २१२२ ११२२ ११२२ २२ 

रह गया ठूँठ, कहाँ अब वो शजर बाकी है

अब तो शोलों को ही होनी ये खबर बाकी है

है चुभन तेज बड़ी, रो नहीं सकता फिर भी

मेरी आँखों में कहीं रेत का घर बाकी है

रात कुछ ओस क्या मरुथल में गिरी, अब दिन भर

आँधियाँ आग की कहती हैं कसर बाकी है

तेरी आँखों के समंदर में ही दम टूट गया

पार करना अभी जुल्फों का भँवर बाकी है

तू कहीं खुद भी न मर जाए सनम चाट इसे

आ मेरे पास तेरे लब पे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 12, 2012 at 2:21pm — 33 Comments

कहानी : मठ और गढ़

सौ साल बाद एक पैसे का सिक्का गढ्ढे से बाहर निकला। एक ऊँची इमारत बनाने के लिए खुदाई चल रही थी। एक मजदूर के फावड़े से टकराकर मिट्टी के साथ उछला और जाकर सड़क के किनारे गिरा। वर्षों बाद उसने खुली हवा में साँस ली और अपने आस पास नजर घुमाई तो उसे कई निर्माणाधीन इमारतें दिखाई पड़ीं। थोड़ी देर खुली हवा में साँस लेने के बाद धीरे धीरे उसकी चेतना लौटने लगी। उसे याद आने लगा कि कैसे वो एक सेठ की थैली से निकलकर गढ्ढे में गिर गया था। सेठ ने उसे निकालने की कोशिश की मगर अंत में थक हारकर सेठ ने उसे गढ्ढे में ही…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 19, 2012 at 5:56pm — 18 Comments

कहानी : आँखों के साँप

कजरी गाँव से नई नई आई थी शहर में अपने मामा के पास। उसकी माँ और तीन छोटी बहनें गाँव में ही थे। उसका बाप चौथी बेटी के जन्म के बाद घर छोड़कर भाग गया था ऐसा गाँव के लोग कहते थे। उसकी माँ का कहना था कि उसका बाप इलाहाबाद के माघ मेले में नहाने गया था और मेले के दौरान संगम के करीब जो नाव डूबी थी उसमें उसका बाप भी सवार था। जिन लोगों को थोड़ा बहुत तैरना आता था उनको तो बचा लिया गया पर जो बिल्कुल ही अनाड़ी थे उनको गंगाजी ने अपनी गोद में सुला लिया। तब वह छह साल की थी। उसकी माँ ने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाई…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 16, 2012 at 6:58pm — 8 Comments

ग़ज़ल : कब्र मेरी वो अपनी बताने लगे

जिनको आने में इतने जमाने लगे
कब्र मेरी वो अपनी बताने लगे
 
जाने कब से मैं सोया नहीं चैन से
इस कदर ख्वाब तुम बिन सताने लगे
 
झूठ पर झूठ बोला वो जब ला के हम
आइना आइने को दिखाने लगे
 
है बड़ा पाप पत्थर न मारो कभी
जिनका घर काँच का था, बताने लगे
 
बिन परिश्रम ही जिनको खुदा मिल गया
दौड़कर लो वो मयखाने जाने लगे
 
प्रेम ही जोड़ सकता…
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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 15, 2012 at 9:08pm — 9 Comments

कविता : अम्ल, पानी और मैं

दफ़्तर के काम में डूबा हुआ था मैं
अचानक किसी शब्द से चिपकी चली आई तुम्हारी याद
जैसे ढेर सारे ठंढे सांद्र अम्ल में गिर जाय एक बूँद पानी
और उत्पन्न हुई ढेर सारी ऊष्मा
पानी की तैरती बूँद को झट से उबाल दे
अम्ल छलक पड़े बाहर
कुछ मेरे कपड़ों पर
कुछ मेरे चेहरे पर
यूँ अचानक मत आया करो
मेरे भीतर का अम्ल मुझे जला देता है
मैं खुद आउँगा कतरा कतरा तुम्हारे पास
जैसे ढेर सारे पानी में खो…
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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2012 at 12:00am — 10 Comments

नई कविता : कूप मंडूक

पुरखों के कुँए को ही दुनिया समझना

कूप मंडूकता है



कुँए को अपना घर समझना

पाँवों में पड़ी बेड़ियाँ हैं



कुँए की दीवारों को अभेद्य समझना

खुद को खुद की नज़रों में

दुनिया का विजेता साबित करने की कोशिश है



खुद को विश्व विजयी समझना

चुनौतियों से हारकर आलस्य का जहर पीना है



खुद को कूप मंडूक समझना

बाहर की रोशनी का अहसास है



कुँए की दीवारों के बाहर दुनिया की कल्पना

कुँए से बाहर जाने वाली सुरंग है



दुनिया के बाहर… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 3, 2012 at 5:55pm — 9 Comments

ग़ज़ल : है मरना डूब के मेरा मुकद्दर भूल जाता हूँ

है मरना डूब के मेरा मुकद्दर भूल जाता हूँ
तेरी आँखों में भी है एक सागर भूल जाता हूँ

ये दफ़्तर जादुई है या मेरी कुर्सी तिलिस्मी है
मैं हूँ जनता का एक अदना सा नौकर भूल जाता हूँ

हमारे प्यार में इतना तो नश्शा अब भी बाकी है
पहुँचकर घर के दरवाजे पे दफ़्तर भूल जाता हूँ

तुझे भी भूल जाऊँ ऐ ख़ुदा तो माफ़ कर देना
मैं सब कुछ तोतली आवाज़ सुनकर भूल जाता हूँ

न जी सकता हूँ तेरे बिन, न मरने दे तेरी आदत
दवा हो या जहर दोनों मैं रखकर भूल जाता हूँ

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 20, 2012 at 9:04pm — 11 Comments

कविता : सिस्टम

मच्छर आवाज़ उठाता है

‘सिस्टम’ ताली बजाकर मार देता है

और ‘मीडिया’ को दिखाता है भूखे मच्छर का खून

अपना खून कहकर

 

मच्छर बंदूक उठाते हैं

‘सिस्टम’ ‘मलेरिया’ ‘मलेरिया’ चिल्लाता है

और सारे घर में जहर फैला देता है

 

अंग बागी हो जाते हैं

‘सिस्टम’ सड़न पैदा होने का डर दिखालाता है

बागी अंग काटकर जला दिए जाते हैं

उनकी जगह तुरंत उग आते हैं नये अंग

 

‘सिस्टम’ के पास नहीं है खून बनाने वाली…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2012 at 8:30pm — 8 Comments

बलात्कार: उद्भव, विकास एवं निदान

शुरू में सब ठीक था

जब धरती पर

प्रारम्भिक स्तनधारियों का विकास हुआ

नर मादा में कुछ ज्यादा अन्तर नहीं था

मादा भी नर की तरह शक्तिशाली थी

वह भी भोजन की तलाश करती थी

शत्रुओं से युद्ध करती थी

अपनी मर्जी से जिसके साथ जी चाहा

सहवास करती थी

बस एक ही अन्तर था दोनों में

वह गर्भ धारण करती थी

पर उन दिनों गर्भावस्था में

इतना समय नहीं लगता था

कुछ दिनों की ही बात होती थी।



फिर क्रमिक विकास में बन्दरों का उद्भव हुआ

तब जब हम…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 18, 2012 at 8:04pm — 2 Comments

अमीरी और गरीबी की समीकरणें

इंसान खोज चुका है वे समीकरणें

जो लागू होती हैं अमीरों पर

जिनमें बँध कर चलता है सूर्य

जिनका पालन करती है आकाशगंगा

और जिनके अनुसार इतनी तेजी से

विस्तारित होता जा रहा है ब्रह्मांड

कि एक दिन सारी आकाशगंगाएँ

चली जाएँगी हमारे घटना क्षितिज से बाहर

हमारी पहुँच के परे

ये समीकरणें रचती हैं एक ऐसा संसार

जहाँ अनिश्चितताएँ नगण्य हैं



खोजे जा चुके हैं वे नियम भी

जिनमें बँध कर जीता है गरीब

जिनसे पता चल जाता है परमाणुओं का… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 7, 2012 at 11:58pm — 3 Comments

गली के कुत्ते और वफ़ादार कुत्ते

किसे नहीं अच्छे लगते

वफादार कुत्ते?



जो तलवे चाटते रहें

और हर अनजान आदमी से

कोठी और कोठी मालिक की रक्षा करते रहें



ऐसे कुत्ते जो मालिक का हर कुकर्म देख तो सकें

मगर किसी को कुछ बता न सकें

जो मालिक की ही आज्ञा से

उठें, बैठें, सोएँ, जागें, खाएँ, पिएँ और भौंकें



ऐसे ही कुत्तों को खाने के लिए मिलता है

बिस्किट और माँस

रहने के लिए मिलती हैं

बड़ी बड़ी कोठियाँ

और मिलती है

अच्छे से अच्छे नस्ल की कुतिया



और जब…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 4, 2011 at 1:11am — 2 Comments

कविता : सामान्य वर्ग के सामान्य बाप का सामान्य बेटा

मैं हूँ सामान्य वर्ग का एक सामान्य अधेड़

न, न, अभी उम्र पचास की नहीं हुई

केवल पैंतीस की ही है

मगर अधेड़ जैसा लगने लगा हूँ



मेरी गलती यही है

कि मैं विलक्षण प्रतिभा का स्वामी नहीं हूँ

न ही किसी पुराने जमींदार की औलाद हूँ

एक सामान्य से किसान का बेटा हूँ मैं



बचपन में न मेरे बापू ने मेरी पढ़ाई पर ध्यान दिया

न मैंने

नौंवी कक्षा में मुझे समझ में आया

कि इस दुनिया में मेरे लिए कहीं आशा बाकी है

तो वह पढ़ाई में ही है

तब मैंने पढ़ना…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 22, 2011 at 3:38pm — 17 Comments

ग़ज़ल : लाश तेरी यादों की

लाश तेरी यादों की मैं न छोड़ पाता हूँ

रोज दफ़्न करता हूँ रोज खोद लाता हूँ



जो रकीब था कबसे बन गया खुदा मेरा

रोज सर कटाता हूँ रोज सर झुकाता हूँ…



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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 24, 2011 at 3:30pm — 3 Comments

कविता : माँ की गाली

कभी माँ थी मैं तुम्हारी
आज केवल
एक स्त्री देह रह गई
क्योंकि तुमने
गुस्से में ही सही
दूसरों को गाली देने के लिए ही सही
‘माँ’ शब्द को
अपशब्दों से जोड़कर
नए शब्दों को
पैदा करना सीख लिया है

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 24, 2011 at 3:05pm — 1 Comment

कविता : विद्रोह

भ्रष्टाचार के विरोध में हम भी खड़े हैं इस छोटी सी कविता के साथ

 

विरोध कायम रहे
इसके लिए जरूरी है
कि कायम रहे
अणुओं का कंपन

अणुओं का कंपन कायम रहे
इसके लिए जरूरी है
विद्रोह का तापमान

वरना ठंढा होते होते
हर पदार्थ
अंततः विरोध करना बंद कर देता है
और बन जाता है अतिचालक

उसके बाद
मनमर्जी से बहती है बिजली
बिना कोई नुकसान झेले
अनंत काल तक

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 5, 2011 at 10:19pm — 4 Comments

ग़ज़ल : सूरज उगता है तो सब यादें सो जाती हैं

चंदा तारे बन रजनी में नभ को जाती हैं।
सूरज उगता है तो सब यादें सो जाती हैं।

आँखों में जब तक बूँदें तब तक इनका हिस्सा
निकलें तो खारा पानी बनकर खो जाती हैं।

खुशबूदार हवाएँ कितनी भी हो जाएँ पर
मरती हैं मीनें जल से बाहर जो जाती हैं।

सागर में बारिश का कारण तट पर घन लिखते
लहरें आकर पल भर में सबकुछ धो जाती हैं।

भिन्न उजाले में लगती हैं यूँ तो सब शक्लें
किंतु अँधेरे में जाकर इक सी हो जाती हैं।

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 23, 2011 at 10:50pm — 3 Comments

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