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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog (511)

करता रहा था जानवर रखवाली रातभर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२

जिसके लिए स्वयं को यूँ पाषान कर गये

दो फूल उसके आपको भगवान कर गये।१।

**

कारण से कुछ के मस्जिदें बदनाम हो गयीं

मन्दिर को लोग कुछ यहाँ दूकान कर गये।२।

**

करता रहा था जानवर रखवाली रातभर

बरबाद दिन में खेत को इन्सान कर गये।३।

**

अपनी हुई न आज भी  पतवार कश्तियाँ

क्या  खूब  दोस्ती  यहाँ  तूफान  कर गये।४।

**

दिखते नहीं दधीचि से परमार्थी सन्त अब

मरकर भी अपनी देह जो यूँ दान कर गये।५।

**

माटी भी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 30, 2020 at 9:30am — 18 Comments

भूख तक तो ठीक था - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



जिन्दगी की डाँट खाकर भी सँभल पाये न हम

चाह कर भी यूँ  पुराना  पथ  बदल पाये न हम।१।

**

एक संकट क्या उठा के साथ छूटा सबका ही

हाथ था सबने बढ़ाया किन्तु चल पाये न हम।२।

**

फर्क था इस जिन्दगी को जीने के अन्दाज में

आप सा छोटी खुशी पर यूँ उछल पाये न हम।३।

**

भूख तक तो ठीक था मुँह फेरकर सब चल दिये

लुट रही इन इज्जतों  पर क्यों उबल पाये न हम।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 28, 2020 at 6:55am — 6 Comments

मजदूर अब भी जा रहा पैदल चले यहाँ-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२

कहते भरे हुए हैं अब भण्डार तो बहुत

लेकिन गरीब भूख से लाचार तो बहुत।१।

**

फिरता है आज देखिए कैसे वो दरबदर

जिसने बनाये खूब  यूँ सन्सार तो बहुत।२।

**

मजदूर अब भी जा रहा पैदल चले यहाँ

रेलों बसों को  कर  रहे  तैयार तो बहुत।३।

**

बनता दिखा न आजतक हमको भवन कोई

रखते  गये  हैं  आप  भी  आधार  तो  बहुत।४।

**

सारे अदीब चुप  हुए  संकट  के दौर में

सुनते थे यार उनका है बाजार तो बहुत।५।

**

मजदूर सह किसान  से  जाने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 24, 2020 at 11:11am — 13 Comments

मजदूर अपने गाँव के सस्ते नहीं गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२

पथ से खुशी के दुख भरे काँटे नहीं गये

निर्धन के पाँव से  कभी  छाले नहीं गये।१।

**

दसकों गुजर गये हैं ये नारा दिये मगर

होगी  गरीबी  दूर  के  वादे  नहीं  गये।२।

**

जिन्दा नहीं तो मरके वो पाये हैं लाख जो

मजदूर  अपने  गाँव  के  सस्ते  नहीं  गये।३।

**

कहते हैं इसको  आपदा  चाहे जरूर वो

शासन से इसके पर कभी रिश्ते नहीं गये।४।

**

किस्मत गरीब की रही झोपड़ ही घास की

आँगन में जिसके  फूल  के  डाले नहीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 18, 2020 at 4:03pm — 7 Comments

आस में अच्छे दिनों की शह्र आये थे मगर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/ २१२२/२१२



शासकों को रोज अपनी दुख बयानी लिख रहे

एक चिकने घट को  जैसे  बूँद पानी लिख रहे।१।

**

अधजली दंगों में थी अब अधमरी है रोगवश

पर खबर में  खूबसूरत  राजधानी  लिख रहे।२।

**

दान दाता  बन  गये  कुछ  एक  मुट्ठी  दे  चना

खींचकर तस्वीर उसकी नित कहानी लिख रहे।३।

**

आस में  अच्छे  दिनों  की  शह्र  आये थे मगर

गाँव के वो आज सब को खूब मानी लिख रहे।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 17, 2020 at 2:00pm — 6 Comments

उम्मीद की चमक- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल )

२२१/ २१२१/२२२/१२१२



दिखती भला है अब किधर उम्मीद की चमक

खोने  लगी  है  खुद  सहर  उम्मीद की चमक।१।

**

माझी को धोखा दे  गयी पतवार हर कोई

दरिया में जैसे हो लहर उम्मीद की चमक।२।

**

बाँटेगा सबको आ के सच थोड़ी मिले भले

लेकर चला है वो  अगर उम्मीद की चमक।३।

**

कहते  उसे  किसान  हैं  निर्धन  बहुत  भले

झुकने न देगी उसका सर उम्मीद की चमक।४।

**

लूटा गया  है  हर  तरह  उसको  जहान में

आँखों में उसके है मगर उम्मीद की…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 12, 2020 at 7:38am — 8 Comments

भय के दोहे -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

करती सूखा बाढ़ बस, हलधर को भयभीत

बाँकी हर दुख पर रही, सदा उसी की जीत।१।

**

नाविक हर तूफान से, पा लेगा नित पार

डर केवल पतवार का, ना निकले गद्दार।२।

**

मजदूरी  में  दिन  कटा,  कैसे  काटे  रात

टपके का भय दे रही, निर्धन को बरसात।३।

**

आते जाते दे हवा, दस्तक जिस भी द्वार

लेकर झट उठ  बैठता, हर कोई तलवार।४।

**

शासन  बैठा  देखता, हर  संकट  को  मूक

निर्धन को भय मौत से, अधिक दे रही भूक।५।

**

मानवता से प्रीत थी,  पशुपन से भय मीत

इस…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 7, 2020 at 6:06am — 6 Comments

जीवन को नर्क नित किया मीठे से झूठ ने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२



भटकन को पाँव की भला कैसे सफर कहें

समझो इसे अगर तो हम लटके अधर कहें।१।

**

गैरों से  जख्म  खायें  तो  अपनों  से बोलते

अपनों के दुख दिये को यूँ बोलो किधर कहें।२।

**

बातें सुधार से  अधिक  भाती  हैं टूट की

दीमक हैं देश धर्म को उन को अगर कहें।३।

**

टूटन  दरो - दीवार  की  करते  रफू  मगर

जाते नहीं हैं छोड़ कर घर को जो घर कहें।४।

**

जाने हुआ है क्या कि सब लगती हैं रात सी

दिखती नहीं है एक भी जिसको सहर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 4, 2020 at 7:41am — 7 Comments

वंचितों के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

  1. फूलों की नाराजगी, काँटों का मनुहार

    दुखियारों के भाग में, ऐसा ही सन्सार।१।

    **

    नदिया ने  दुत्कार  दी, किया  रेत  ने प्यार

    जिसके दम करते रहे, जीवन का विस्तार।२।

    **

    कौतुक करता दुख रहा, पर सुख रहा उदास

    घावों ने  मन  में  भरी, पीड़ा  निहित मिठास।३।

    **

    यादों  की  चौपाल  में, बिन  घूँघट  के  पीर

    जाने क्या क्या कह गया, आँखों बहता नीर।४।

    **

    मुर्दा दिल की बस्तियाँ, चलती फिरती लाश

    हलचल  कैसी  भी  रहे, जीवन  रहे  हताश।५।

    **

    किस्मत…
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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 2, 2020 at 9:41am — 6 Comments

सभ्य कितना चल गया सबको पता -गजल (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')

२१२२/ २१२२/२१२२



द्वार पर वो  नित्य  आकर  बोलता है

किन्तु अपना सच छुपाकर बोलता है।१।

***

दोस्ती का मान जिसने नित घटाया

दुश्मनों को अब क्षमा कर बोलता है।२।

***

हूँ अहिन्सा का पुजारी सबसे बढ़कर

हाथ  में  खन्जर  उठाकर  बोलता है।३।

***

गूँज घन्टी की न आती रास जिसको

वो अजाँ को नित सुनाकर बोलता है।४।

***

दौड़कर मंजिल को हासिल कर अभी तू

पथ  में  काँटे  वो  बिछा कर  बोलता …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 1, 2020 at 10:00pm — 5 Comments

पहले जगकर रोज भोर में सूरज ताका करते थे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

पत्थर को भी फूल सरीखा होना अच्छा लगता है

काँधा अपनेपन का हो तो रोना अच्छा लगता है।१।

**

पहले जगकर रोज  भोर  में  सूरज ताका करते थे

अब आँखों को उसी वक्त में सोना अच्छा लगता है।२।

**

छीन लिया है वक्त ने चाहे खेत का जो भी टुकड़ा था

बेटे हलधर के  हम  जिन को  बोना अच्छा लगता है।३।

**

घोर तमस के बीच भी जो  तब चौपालों में रहते थे

उनको…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 26, 2020 at 12:31pm — 9 Comments

शौक से लूटे जिसे भी लूटना है - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/ २१२२/ २१२२

आप कहते  आपदा  में योजना है

सत्य में हर भ्रष्ट को यह साधना है।१।

**

बाढ़ सूखा ऐपिडेमिक या हों दंगे

चील गिद्धों के लिए सद्कामना है।२।

**

घोषणाएँ हो  रही  हैं नित्य जो भी

वह गरीबों के लिए बस व्यंजना है।३।

**

बँट रहा है ढब  खजाना  सत्य है यह

किंतु किसको मिल रहा ये जाँचना है।४।

**

हो गई है हर जिले में अब व्यवस्था

शौक  से  लूटे  जिसे  भी लूटना …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 21, 2020 at 7:00am — 4 Comments

जो कारवाँ भरी थी राहें कहाँ गयीं अब (गजल) -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२२/२२१/ २१२२

**

लोरी  सुना  सुलाती  रातें  कहाँ  गयीं अब

बचपन में चहचहाती सुब्हें कहाँ गयीं अब।१।

**

दिनभर का खेलना वो हर भूख भूलकर नित

मस्ती भरी  गजब  की  शामें  कहाँ  गयीं अब।२।

**

हर छलकपट से बंचित लड़ना झगड़ना लेकिन

मन से निकलती  सच्ची  बातें  कहाँ  गयीं अब।३।

**

जिनपर थी झुर्रियाँ ढब हरपल थी कँपकपाती

रखती थी  किन्तु  थामे  बाहें  कहाँ गयीं अब।४।

**

वो होंट खिल-खिलाते मुरझा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 19, 2020 at 6:52am — 4 Comments

कोरोनामय दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

कोरोनामय जग हुआ, फीका पड़ा बसन्त

माँगे खुद की खैर अब, राजा, रंक, महन्त।१।

**

जन्मा चाहे चीन में, लाये अपने लोग

जिससे सारे देश में, फैल रहा यह रोग।२।

**

विकट घड़ी में आपदा, आयी सबके द्वार

घर के बाहर आ मगर, करो नहीं सत्कार।३।

**

घर में बैठो चन्द दिन, ढककर खिड़की द्वार

कोरोना पर  वार  को, यही सफल  हथियार।४।

**

आज चिकित्सक का कहा, थोड़ा मानव मान

घर  में  चुपके  बैठ  कर, होगा  रोग  निदान।५।

**

करो नमस्ते दूर से , नहीं मिलाओ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 24, 2020 at 8:04pm — 2 Comments

किसी आजाद पन्छी को न थी मन्जूर पाबन्दी -गजल

१२२२ /१२२२/ १२२२ /१२२२/

*

कभी कतरों में बँटकर  तो  कभी सारा गिरा कोई

मिला जो माँ का आँचल तो थका हारा गिरा कोई।१।

*

कि होगी कामना  पूरी किसी  की लोग कहते हैं

फलक से आज फिर टूटा हुआ तारा गिरा कोई।२।

*

गमों की मार से लाखों सँभल पाये नहीं  लेकिन

सुना हमने यहाँ  खुशियों  का भी मारा गिरा कोई।३।

*

किसी आजाद पन्छी को न थी मन्जूर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 18, 2020 at 6:17am — 7 Comments

रंगों के घन खूब उड़ायें - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

***

आओ नाचें,  झूमें, गायें  फिर  से अब के होली में

इक-दूजे को खूब लुभायें फिर से अब के होली में।१।

**

देख के जिसको मन ललचाये ज़न्नत के वाशिन्दों का

रंगों के  घन  खूब  उड़ायें  फिर  से  अब के होली में।२।

**

जीवन में  रंगत  हो  सब  के  संदेश  हमें देे होली 

रोते जन को यार हँसायें फिर से अब के  होली में।३।

**

आग सियासत चाहे कितनी यार लगाये नफरत की

प्रेम…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2020 at 7:30am — 8 Comments

रक्खो भुजंग जैसा चन्दन में आदमी को - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२२/२२१/२१२२

*

फूलों की क्या जरूरत उपवन में आदमी को

भाने  लगे  हैं  काँटे  जीवन  में  आदमी  को।१।

**

क्या क्या मिला हो चाहे मन्थन में आदमी को

विष की तलब रही  पर  जीवन में आदमी को।२।

**

आजाद जब है  रहता उत्पात करता बेढब

लगता है खूब अच्छा बन्धन में आदमी को।३।

**

आता बुढ़ापा जब है रूहों की करता चिन्ता

तन की ही भूख केवल यौवन में आदमी को।४।

**

कितना हरेगा विष ये चाहे पता नहीं पर

रक्खो भुजंग जैसा चन्दन में आदमी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 5, 2020 at 4:21pm — 2 Comments

होली के रंगों से फिर क्यों - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



जो दुनिया से तन्हा लड़कर प्यार बचाया करते हैं

वो ही  सच्चे  अर्थों  में   सन्सार  बचाया  करते हैं।१।

**

उन लोगों से ही तो  कायम  हर शय की ये रंगत है

जो पत्थर दिल दुनिया में जलधार बचाया करते हैं।२।

**

तुम तो अपने सुख की खातिर खून को पानी करते हो

हम राख  की  ढेरी  में  देखो  अंगार  बचाया  करते हैं।३।

**

जो कहते हैं हम तो डूबे प्यार के रंगो में…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 4, 2020 at 7:30am — 5 Comments

दिल्ली जलती है जलने दे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

**

कब कहता हूँ आम आदमी मुझको अपने पैसे दे

हो सकता है तुझ से  कुछ  तो क़ुर्बानी में रिश्ते दे।१।

**

दिल्ली जलती है जलने दे मुझे सियासत करने दे

हर नेता का ये कहना  है  कुछ तो कुर्सी फलने दे।२।

**

ये  लाशों  के  ढेर  हमेशा  सीढ़ी  बन  कर  उभरे  हैं

इनको मत रो इन पर मुझको पद की खातिर चढ़ने दे।३।

**

खूब सुरक्षा मुझे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 28, 2020 at 8:30am — 13 Comments

तरही गजल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122 / 2122 / 2122 /  212

**

उनका वादा राम का  वादा  समझ बैठे थे हम

हर सियासतदान को सच्चा समझ बैठे थे हम।१।

**

कह रहे थे सब  यहाँ  जम्हूरियत है इसलिए

देश में हर फैसला अपना समझ बैठे थे हम।२।

**

गढ़ गये पुरखे हमारे  बीच  मजहब नाम की

क्यों उसी दीवार को रस्ता समझ बैठे थे हम।३।

**

आस्तीनों  में  छिपे  विषधर  लगे  फुफकारने

यूँ जिन्हें जाँ से अधिक प्यारा समझ बैठे थे हम।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 22, 2020 at 8:28am — 9 Comments

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