जिस को भी कड़वे लगे, बाबू जी के बोल
उसने समझो खो दिया, हर अमृत अनमोल।१।
*
बाबू जी ने क्या किया, कह दे जो औलाद
समझो उसने कर लिया, सकल पुण्य बर्बाद।२।
*
बाबू जी करते कहाँ, भौतिक सुख की आस
उन के मन में चाह बस, सन्तानें हों पास।३।
*
सोचा सब के चैन की, खुद रहकर बेचैन…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 8, 2024 at 6:24am — 6 Comments
विरही मन कहता फिरे, समझे पीड़ा कौन
आँगन,पनघट, राह सह, हँसी उड़ाये भौन।१।
*
करते हैं दो चार जो, परदेशी से नैन
जले विरह की आग में, उन का मन बेचैन।२।
*
घुमड़ी बदली देखकर, मन में भड़की आग
जिस के पिय परदेश में, फूटे उस के भाग।३।
*
जब साजन परदेश में, शृंगारित ना केश
सावन दावानल लगे, जलता हर परिवेश।४।
*
पिया मिलन की प्यास जो, तन मन करे अधीर
रूठी-रूठी भूख को, लगती विष सी…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 3, 2024 at 11:30am — 2 Comments
पसीना बोलता है (गीत)
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चन्द सूखी रोटियाँ खाकर
कष्ट में हँस गीत नित गाकर
खुशी वो घोलता है।
पसीना बोलता है।।
*
देह मैली, पर जगत चमका
सब सुधारा, आ जहाँ धमका
हाथ की छैनी कुदालों से
नित द्वार सुख के खोलता है।
पसीना बोलता है।।
*
स्वप्न जो है पोषता सब का
राह आगन देखता उस का
शौक से कब छोड़ घर अपना
परदेश में वह डोलता है।
पसीना बोलता है।।
*
खेत हों …
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 2, 2024 at 2:35pm — 2 Comments
पड़ते दुख के घाट पर, कभी न जिनके पाँव
समझ न आता है उन्हें, जग में रोता गाँव।१।
*
चल आती है जो खुशी, दुख बैठा जिस राह
पुरखों से सुनते वही, टिकती बहुत अथाह।२।
*
सुख से सुख की कब हुई, तुलना जग में बोल
सुख का करते मान हैं, बजकर दुख के ढोल।३।
*
दुख आकर देता सदा, सुख को रंग हाजार
उस बिन फीका ही रहे, सुख का घर संसार।४।
*
दुख तो ऐसा बौर है, जिस भीतर सुख बीच
जोर-जबर से कब इसे, कोई सका उलीच।५।
*…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 22, 2024 at 6:00am — 2 Comments
२२१/२१२१/१२२१/२१२
कानों से देख दुनिया को चुप्पी से बोलना
आँखों को किसने सीखा है दिल से टटोलना ।१।
*
कौशल तुम्हें तो आते हैं ढब माप तौल के
जब चाहो खूब नींद को सपनों से तोलना।२।
*
कब जाग जाये कौन सा बदज़ात जानवर
सीमा के हर कपाट को खुलकर न खोलना ।३।
*
करना हमेशा अन्न का जीवन में मान तुम
चाहे पड़े भकोसना या फिर कि चोलना।४।
*
चक्का समय का घूम के लौटा है फिर वहीं
जिस में…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2024 at 5:44am — No Comments
निभाकर रीत होली में
दिलों को जीत होली में।१।
*
भरें जीवन उमंगों से
चलो गा गीत होली में।२।
*
सभी सुख दुश्मनी छीने
बनो सब मीत होली में।३।
*
बहुत विरही तड़पता है
सफल हो प्रीत होली में।४।
*
किसी को याद मत आये
गयी जो बीत होली में।५।
*
लगे अब रोग कहते हैं
दुखों को पीत होली में।६।
*
गिरा दो रंग बरसाकर
खड़ी हर भीत होली में।७।
*
यही अरदास है पिघलें
दिलों की शीत होली…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 21, 2024 at 6:55am — No Comments
नगर भर चले दौड़ काली हवा
है खुश खूब झकझोर डाली हवा।१।
*
गिरे फूल कलियाँ विवश भूमि पर
बजा पात कहती है ताली हवा।२।
*
कभी दान जीवन सभी को दिया
हुई आज लेकिन सवाली हवा।३।
*
कहाँ से प्रदूषण धरा का मिटे
नहीं सीख पायी जुगाली हवा।४।
*
कँपा शीत में नित बढ़ी जब तपन
गयी लौट कुल्लू मनाली हवा।५।
*
तनिक तो कहीं बात होती है कुछ
किसी की चली कब है…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 6, 2024 at 11:04am — 6 Comments
१२२/१२२/१२२/१२
*
हमें एक नदिया मिली नाम की
न थी वो किसी प्यास के काम की।१।
*
जिसे देश कहते हैं सब राम का
वहीं पर फजीहत हुई राम की।२।
*
दुखाती है मन जो महज याद से
करो अब न बातें उसी शाम की।३।
*
बिना उस के ये भी परायी गली
शरण में चलें कौन से धाम की।४।
*
मिटायेगी वाणी सभी दूरियाँ
मिठासें रखो बस पके आम की।५।
*
चलो अब तो साँसों इसे छोड़कर
घड़ी आ गयी तन…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 29, 2024 at 10:42pm — No Comments
जिन्हें भाव जग में खले दीप के
वही कहते आरे चले दीप के।१।
*
यहाँ बाँध घन्टी गले दीप के
तमस जी रहा है तले दीप के।२।
*
बहुत लोग भटके यहाँ साँझ को
नहीं एक हम ही छले दीप के।३।
*
चले है तमस यूँ दिखा आँख जो
लगे सब को अब दिन ढले दीप के।४।
*
कहाँ कब जले घर नहीं है पता
इरादे कहाँ अब भले दीप के।५।
*
परायों से बढ़ आज अपनो से भय
न बाती ही कालिख …
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 28, 2024 at 2:42pm — No Comments
अँधेरे उजाले मिले प्यार से
चकित है मनुज उनके व्यवहार से।१।
*
नहीं काम आता किसी के कोई
मिटे दुख भला कैसे संसार से।२।
*
हटा मैल मन का तनिक भी नहीं
नहा कर चले नित्य हरिद्वार से।३।
*
न बदला है कोई किसी के कहे
जो बदला स्वयं अपने आचार से।४।
*
अकेले न तुम हो असंतुष्ट अब
हमें भी तो शिकवा है दो चार से।५।
*
शिखर चाहते हैं सजाना बहुत…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 27, 2024 at 11:14pm — No Comments
करुण रुदन करता नहीं, कोई जाता देख
चाहे लिखता वो रहा, हर दिन सुख का लेख।१।
*
कैसे मुख अब फेर लूँ, मन में लिए सवाल
इस से भी बदतर कहीं, ना हो आगत साल।२।
*
यादें छोड़ तमाम फिर, गया और इक वर्ष
लाभ हानि का लोग क्यों, करते हैं निष्कर्ष।३।
*
स्वागत को हर्षित हुए, करें विदा तो हर्ष
क्या बोलूँ अब मैं भला, कैसा था यह वर्ष।४।
*
साथ समय के नित जिसे, कोसा दसियों बार
वही बिछड़ते दे रहा, नया साल उपहार।५।
*
नये …
ContinueAdded by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 31, 2023 at 10:00pm — No Comments
2122/१२१२/२२
***
दिल की कालिख सँवार आँखों में
कह रहे सब खुमार आँखों में।१।
*
फिर सुहाता न कोई भी उस को
उग गया जिस के खार आँखों में।२।
*
वार करती है जानलेवा वो
क्या लिए है कटार आँखों में।३।
*
दिल तो बेचैन उस की बातों से
दिख रहा पर करार आँखों में।४।
*
सिर्फ दुख से न होती नम लोगो
हर्ष भी लाता धार आँखों में।५।
*
मन की चाहत सुबास सरसों की
खिल गयी पर …
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 31, 2023 at 7:29pm — 1 Comment
२२१/२१२१/१२२१/२१२
रहती हो जिसके साथ मुसीबत हरी भरी
कैसे हो उस की यार तबीयत हरी भरी।१।
*
वो भाग्यवान तात से जिसको मिले सदा
आशीष लाड़ डाँट नसीहत हरी भरी।२।
*
सबने है आग द्वेष की सुलगा रखी बहुत
रखता है मन में कौन मुहब्बत हरी भरी।३।
*
बढ़ता न ताप दुनिया का ऐसे कभी नहीं
रखते धरा को लोग जो औसत हरी भरी।४।
*
बाँटें दुखों के बोझ को मिलके सदा यहाँ
दो ईश खूब सब को ही…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 31, 2023 at 7:22pm — 2 Comments
२१२२/१२१२/२२
*
सूनी आँखों की रोशनी बन जा
ईद आयी सी फिर खुशी बन जा।१।
*
अब भी प्यासा हूँ इक सदी बीती
चैन पाऊँ कि तू नदी बन जा।२।
*
हो गया जग ये शीत का मौसम
धूप सी तू तो गुनगुनी बन जा।३।
*
मौत आकर खड़ी है द्वार अपने
एक पल को ही ज़िन्दगी बन जा।४।
*
मुग्ध कर दू फिर से हर महफिल
आ के अधरों पे शायरी बन जा।५।
*
इस नगर में तो सिर्फ मसलेंगे
फूल जाकर तू जंगली बन जा।६।…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 2, 2023 at 7:00am — 5 Comments
221/2121/1221/212
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सब से हसीन ख्वाब का मंजर सँभालकर
नयनों में उस के प्यार का गौहर सँभालकर।१।
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उर्वर करेगा कोई तो फिर से ये सोच बस
सदियों रखा है जिस्म का बंजर सँभालकर।२।
*
कीटों के प्रेत नोच के हर शब्द ले गये
रक्खा है खत का आज भी पैकर सँभालकर।३।
*
पुरखों से सीख पायी है इस से ही रखते हम
नफरत के दौर प्यार के तेवर सँभालकर।४।
*
फूलों से उस को दूर ही रखना सनम सदा
जिस ने रखा है हाथ में…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 30, 2023 at 12:39pm — 3 Comments
२२१/२१२१/१२२१/२१२
***
ये सच नहीं कि रूप से वो भा गयी मुझे
बारात उस के वादों की बहका गयी मुझे।१।
*
सरकार नित ही वोट से मेरी बनी मगर
कीमत का भार डाल के दफना गई मुझे।२।
*
दंगो की आग दूर थी कहने को मीलों पर
रिश्तों की ढाल भेद के झुलसा गई मुझे।३।
*
अच्छे बहुत थे नित्य के यौवन में रत जगे
पर नींद ढलते काल में अब भा गयी मुझे।४।
*
नद झील ताल सिन्धु पे है तंज प्यास यूँ
दो एक…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 9, 2023 at 7:58am — No Comments
२२२२ २२२२ २२२२ २
**
पर्वत पीछे गाँव पहाड़ी निकला होगा चाँद
हमें न पा यूँ कितने दुख से गुजरा होगा चाँद।१।
*
आस नयी जब लिए अटारी झाँका होगा चाँद
मन कहता है झुँझलाहट से बिफरा होगा चाँद।२।
*
हम होते तो कोशिश करते बात हमारी और
शिवजी जैसा किसने माथे साधा होगा चाँद।३।
*
चाँद बिना हम यहाँ नगर में जैसे काली रात
अबके पूनौ हम बिन भी तो आधा होगा चाँद।४।
*
बातें करती होगी बैठी याद हमारी पास
कैसे कह दें तन्हाई में तन्हा होगा…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 1, 2023 at 12:33pm — 4 Comments
२२/२२/२२/२
*
कुछ हो मत हो नेता दिख
मुख से निकला वादा दिख।१।
*
दुनिया को गर खुश रखना
उसके हित बस खटता दिख।२।
*
शीष नवायें सब तुझ को
इच्छा है तो दादा दिख।३।
*
लोकतन्त्र की रीत निभा
राजा होकर जनता दिख।४।
*
खबरों में गर आना है
नियमित से बस उल्टा दिख।५।
*
भीड़ जुटानी अगल बगल
जीने से बढ़ मरता दिख।६।…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 12, 2023 at 7:49am — 4 Comments
२२२२/ २२२२
जब दंगों का मंजर देखा
सब आँखों में बस डर देखा।१।
*
जलती बस्ती अनजानी थी
पर उसमें भी निज घर देखा।२।
*
मानव तो मानव जैसे ही
मंदिर मस्जिद अन्तर देखा।३।
*
अपने दुख तब से बौने हैं
औरों का दुख ढोकर देखा।४।
*
चीख उठीं दीवारें सारी
सन्नाटा जब छूकर देखा।५।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 31, 2023 at 5:40am — No Comments
जब आजादी पायी है तो, आजादी का मान रखो।
देश, तिरंगे, लोकरीति की, सबसे ऊँची शान रखो।।
*
पुरखों ने बलिदान दिया था, खुली हवा हम पायें।
मस्त गगन में विचरें, खेलें, मिलकर लय में गायें।।
राजनीति की चकाचौंध में, कभी नहीं भरमायें।
भले-बुरे की, सोचें समझें, तब निर्णय पर आयें।।
*
सिर्फ स्वार्थ की अति से बेबश, पुरखे दास बने तब।
स्वार्थ न फिर सिर चढ़े हमारे, सोते जगते ध्यान रखो।
*
भूमि एक थी, धर्म एक तब, किन्तु एकता टूटी।
इस कारण ही सब ने आकर, इज्जत…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 15, 2023 at 6:42am — 2 Comments
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