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Manoj kumar Ahsaas's Blog – May 2015 Archive (12)

मेरी बेटी( दूसरी कविता) मनोज कुमार अहसास

मेरी बेटी

तपता सूरज

जब माथे पर सुलग रहा है

दो बातें अपने सीने की तेरे हिस्से मे रखता हूँ

ये सूरज एक बड़ा परीक्षक

ये सूरज एक बड़ा तपस्वी

ये सूरज एक सत्य अटल है

ये सूरज एक महा अनल है

इस सूरज के संरक्षण मे

जीवन के सब अर्थ खुलेगे

इस सूरज के साथ तू चलना

देख गगन से शब्द मिलेगें

चुपके चुपके....सुलग सुलग कर

चमक में हिस्सा मिल जाता है

तपते रहने से रंग जीवन का

एक ना एक दिन खिल जाता है

तपना जीवन को रंगना है

वरना सब फीका… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 26, 2015 at 7:16pm — 26 Comments

कोशिश______मनोज कुमार अहसास

122 122 122 122









हक़ीक़त नहीं मैं धुँआ चाहता हूँ

तिरी ओर से बस दगा चाहता हूँ



तु मुझको सफ़र में कही छोड़ देना

फकत दो कदम को सना चाहता हूँ



जहाँ तक मुझे तोड़ देगा ज़माना

वहीँ तक सदा की हवा चाहता हूँ



नहीं साथ तेरा अगर ज़िन्दगी में

तिरी रहगुजर में कज़ा चाहता हूँ



ज़रा तोड़कर ये परत बेबसी की

कहीं दूर अब मै उड़ा चाहता हूँ



फ़क़ीरी मेरी वो कदम से लगा लें

अमीरी का उनकी नशा चाहता हूँ



बहुत… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 23, 2015 at 4:30pm — 3 Comments

आसमां ____मनोज कुमार अहसास

जैसी ज़मीन हो गयी वैसा ही वो हुआ

दूरी से नहीं बेरुखी से आसमां हुआ



पत्थर का शहर हाथ में खंज़र लिए हुए

रोता था मेरी याद में सर नोचता हुआ



ऐसी भी भरी भीड़ न देखी कभी दिलबर

एक ज़िन्दगी में दर्द का मेला लगा हुआ



वैसे तो तुझे भूल भी जाऊ मै जिंदगी

लेकिन ये तेरी याद का जीवन बना हुआ



उस पार का भी गम मेरी आँखों में है मगर

लेकिन ये कफ़न वक़्तका मुझपर पड़ा हुआ



जाता नहीं है आँख से मंज़र कभी भी वो

मै ख़त जला रहा था उसी का लिखा… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 22, 2015 at 5:30am — 4 Comments

नतीज़ा_____मनोज कुमार अहसास

तेरे दामन से लगाकर मै भरी आँखों को

ज़िन्दगी भर की तसल्ली का नतीजा चाहूँ



रौशनी तेरी ज़िन्दगी में ठहर जाये अगर

कौन सी चीज़ मैं मालिक से हमेशा चाहूँ



जो सुबह मुझको मिली है मै करू क्या इसका

बिन तेरे जीत ज़माने की भला क्या चाहूँ



हिज्रकी रात में भी आँख न जल जाये अगर

और मै चुपचाप तेरे गम में उबलना चाहूँ



हो सके तो मेरे ही दिल को बदल दे मालिक

अपने हिस्से से बड़ा और मैं कितना चाहूँ



रात का ज़िक्र ना कर मेरे हसीं दिल तनहा

मैं… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 20, 2015 at 4:48pm — 3 Comments

अधूरे गीत(कहन)______________मनोज कुमार अहसास

मन के सारे गीत अधूरे,फिर से तुझ को अर्पण है

तुझको मन की बात कहूँ मैं,ऐसा अब फिरसे मन है



मर्यादा का एक महल है जिसमे विरह का आँगन है

ख़ामोशी की एक चिता है पल पल जलता जीवन है



संबंधो में प्रेम कहाँ है प्रेम की अब वो रीत कहाँ

मित्र नयन से जुदा है काजल और तरसता दर्पण है



दुःख,पीड़ा,अवसाद,तपस्या,करुणा,संयम और साहस

उस जीवन में नैसर्गिक है इस जीवन में आयोजन है



टूट गयी है डोर विरह की कैसे कहन का रूप सजे

जीवन की इस भाग दौड़ में बस बेकार का… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 16, 2015 at 11:30pm — 8 Comments

यूँ ही

यूँही दिन तमाम गुजर गए, यूँही शामें ख़ाली निकल गयी

तेरे फैसले ना बदल सके, मेरी आरज़ू ही बदल गयी



कभी बदगुमानी ने डस लिया,कभी बेबसी ने तबाह किया

कभी फ़र्ज़ ओ रिश्तों की बंदिशे,मेरी ख्वाइशो को कुचल गयी



यहाँ कुछ नहीं है वफ़ा हया,ये हवस का भूख का सिलसिला

तेरे साथ मैंने जो की कभी,मुझे नेकियां वो निगल गयी



मेरे झुकते कांधे भी मुझमेँ है,तेरे हौसलो का जुनून भी

कोई बात शेरों में ढल गयी,कोई बात आँखों में जल गयी



यही फैसला ना हुआ कभी,के वो कल था सच… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 14, 2015 at 6:00pm — 5 Comments

गुब्बारे

मेरी बेटी

तेरी खातिर ,

गुब्बारे लाने थे मुझको,

नीले, पीले,लाल,गुलाबी,

हरे,बैंगनी,खूब सजीले

बहुत सुनहरे और चमकीले

गुब्बारों के दाम बहुत थे

पास मेरे पैसे कुछ कम थे

पर

तेरे हिस्से का समय बहुत था....

दूर कहीं परदेस मे बेटी

तेरे जैसे बहुत से बच्चे

अँधियारो से जूझ रहे है

चमक रहे है,बुझ भी रहे है

तेरे हिस्से का समय मै गुड़िया

इन बच्चों में बाँट रहा हूँ

जिससे इनको रंग मिले

समता समानता स्वतंत्रता के

और खिल जाये इनका… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 12, 2015 at 3:36pm — 11 Comments

बेखुदी_______मनोज कुमार अहसास

ज़िन्दगी में गीत सारे दिल जलाने को लिखे

या फिर अपने इश्क़ को ही आज़माने को लिखे



बेखुदी में लिख दिया तेरे नाम का पहला हरुफ़

जाने कितने नाम फिर तुझको छिपाने को लिखे

(या)

बेखुदी में लिख दिया मेरे नाम का पहला हरुफ़

जाने कितने नाम फिर मुझको छिपाने को लिखे



और हमारी बेबसी का एक वाक्या ये भी है

हमने तुझको ख़त भी तो तुझसे छिपाने को लिखे



जिसने ये लिखकर दिया उम्मीद पर कायम है सब

वो घडी मिलने की भी अब दिल बचाने को लिखे



हम इसी दुनिया… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 10, 2015 at 5:20pm — 5 Comments

ज़रा सा

वो तेरे इश्क़ में दरिया होना
सिमटकर आज ज़रा सा होना

होश में आके हमने जाना है
कितना मुश्किल था तमाशा होना

तुमको देखा वो सब याद आया
क्या न हो पाना और क्या होना

गलतियां तुममे ढूंढ़ ली मालिक
हमसे हो पाया ना इन्सां होना

गुनाह इस ग़ज़ल का उतरना है
या फिर इसमें ना तेरा होना

तहज़ीब हमसे कोई निभ न सकी
ज़िन्दगी या के काफ़िया होना

मौलिक और अप्रकाशित

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 7, 2015 at 3:36pm — 5 Comments

देखते ही देखते

देखते ही देखते देखो समां क्या हो गया

आज अपना आप ही खुद से पराया हो गया



देखकर बदहाली उसकी उठता नहीं अब दिल में दर्द

वो मेरी दुनिया का मालिक था जो दुनिया हो गया



मैंने उसके हिस्से की तन्हाइयां जब मांग ली

वो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा तनहा हो गया



भूलने की कोशिशों में याद रखने की तलब

दो उलट लहरो में फंसकर पाट गहरा हो गया



उसके हाथो की लकीरो में न मेरा नाम था

और जो कुछ भी लिखा था वो भी धुंधला हो गया



रह गयी है पास मेरे दर्द… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 6, 2015 at 3:21pm — 10 Comments

सामान

बार बार नुमाईश हुई

पर खरीदारों को सामान पसंद नहीं आया

सामान को काट छाँट कर दिखाया

सजा कर सँवारकर दिखाया

पर.......

फिर भी किसी खरीदार को सामान पसंद नहीं आया

बात कुछ और थी

बाजार सामान के साथ उपहार वाला बन गया है

उपहार भी दिये गए

पर खरीदारों की ज़रूरत पूरी नहीं हुई

सामान नोंचा कुचला गया

निचोड़ा गया और जलाया मिटा दिया गया

और फिर

एक खुदगर्ज ने कवि बनने की चाह में

एक मासूम लड़की को सामान कह… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 3, 2015 at 10:22pm — 10 Comments

फैसला

अब फैसला आखिर मे सारी बात का मिला

दिन की थकन के बाद सफ़र रात का मिला



घर से यूँ लौट आता हु मैं दो दिनों के बाद

कैदी को जैसे वक़्त मुलाकात का मिला



मालिक तू है कहाँ मेरी आँखे तरस गयी

लेकिन पता न मुझको मेरी जात का मिला



आयी सुबह ज़रूर मगर बादलो के साथ

अंजाम ये बरसो से लंबी रात का मिला



इस बात का नहीं मुझे कुछ भी पता चला

क्यों जीत में ये रँग हमे मात का मिला



फिर आज मैंने खुद को सताया है देर तक

एक शख़्श मुझको मेरी औकात का… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on May 2, 2015 at 2:00pm — 10 Comments

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