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सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता

बह्र- 1222×4

ज़मीं भाती नहीं और आसमाँ अच्छा नहीं लगता
कहाँ ले जाएँ दिल को ये जहाँ अच्छा नहीं लगता[1]

मेरा दम शहर में घुटता है  कुछ दुख गाँव में भी हैं
यहाँ अच्छा नहीं लगता वहाँ अच्छा नहीं लगता [2]

वो अपने हाथ से जुगनू  नहीं ऊपर उड़ाता तो
सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता [3]

हमारे घर में भी ख़ुशियाँ सभी मौजूद हैं लेकिन
हमें बरसात में अपना मकाँ अच्छा नहीं लगता [4]

नहीं हो हम-सफ़र जब साथ उस तन्हा मुसाफ़िर को
सड़क से हर गुज़रता कारवाँ अच्छा नहीं लगता [5]

किसी की चाह में जब से हुए बर्बाद हमको 'मीत'
यकीं अच्छा नहीं लगता गुमाँ अच्छा नहीं लगता [6]

-रूपम कुमार 'मीत'

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Rupam kumar -'मीत' on August 7, 2020 at 9:12am

आदरणीय लक्ष्मण साहिब, आदाब। बहुत नवाज़िश साहब और बहुत शुक्रिया हौसला अफजाई का।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on August 6, 2020 at 11:07pm

जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, आल-ए-अहमद सुरूर साहिब की ज़मीन में अच्छी ग़ज़ल कही है आपने शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। फ़ीचर ब्लॉग में ग़ज़ल शामिल होने की मुबारकबाद अलग से पेश है। 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on August 6, 2020 at 1:44pm

आदरणीय Rupam kumar -'मीत' साहिब, बढ़िया ग़ज़ल हुई है, मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएँ! चौथे शे'र में 'हमारे' से बिंदु हटा लीजिए, और 'ख़ुशियों' में नुक़्ता लगा लीजिये। और आख़िरी शे'र में 'यारों' को 'यारो' कर लीजिएगा।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 6, 2020 at 10:12am

आ. भाई रूपम जी, बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Rupam kumar -'मीत' on August 5, 2020 at 2:44pm

आदरणीय आशीष यादव जी, बहुत नवाज़िश हौसला अफजाई का। 

Comment by आशीष यादव on August 5, 2020 at 1:40pm

यह ग़ज़ल पढ़कर बहुत अच्छा लगा। बेहतरीन ग़ज़ल बनी है। बधाई स्वीकारें।

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